बहरीन ने 69 लोगों की नागरिकता छीन ली है। ऐसा कदम उसने इसलिए उठाया क्योंकि इन लोगों ने ईरान के दुश्मनीपूर्ण कदमों का समर्थन किया था। विदेशी संस्थाओं के साथ भी इनके संबंध थे।
बहरीन के आंतरिक मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि कुल 69 लोग हैं और इनमें परिजन भी शामिल हैं। ये सभी गैर-बहरीनी मूल के हैं। मंत्रालय ने कहा कि उसने उन लोगों के नागरिकता अधिकार छीन लिया है, जो ईरान के आपराधिक कृत्यों का लगातार समर्थन कर रहे थे। यह प्रश्न भी उठता है कि क्या कारण हैं कि बहरीन से लेकर अन्य मुस्लिम मुल्क मुस्लिम नागरिकों की नागरिकता छीन रहे हैं?
ईरान मुस्लिम मुल्क है, बहरीन और कुवैत भी। फिर भी ऐसा कुछ है कि जिसके कारण ये तीनों ही परस्पर दुश्मन हैं। बहरीन और कुवैत दोनों पर ही ईरान की सरकार ने युद्ध के दौरान हमले किये थे।
कुवैत ने लगभग 2000 लोगों की नागरिकता छीनी है। हालांकि इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि ऐसे नागरिकों की नागरिकता को रद्द किया जा रहा है, जो कुवैत के नहीं थे। हालांकि इन्होंने कुवैत के नागरिकों से शादी की थी।
कुवैत ने 30 हजार लोगों की नागरिकता छीनी
इससे पहले पिछले ही वर्ष कुवैत ने एक ही झटके में 30,000 से अधिक लोगों की नागरिकता छीन ली थी। कुवैत ने अभी जो कदम उठाया है, उसके पीछे कारण ईरान और उसके समर्थकों पर निशाना बताया जा रहा है। इस कदम में कई खास लोगों की नागरिकता भी गई है, जिनमें फुटबॉलर नवाफ अल खालदी और सालेह अल शेख जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। ऐसा दावा किया जा रहा है कि कुवैत की सरकार ने यह निर्णय ईरान समर्थक नारे लगाने, देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश, और नागरिकता कानूनों में सुधार के बाद लिया गया।
क्या ईरान रचता है तख्तापलट की साजिश
इसी के बाद बहरीन जोकि एक सुन्नी मुल्क है, और ईरान का पड़ोसी है, उसने भी कड़े कदम उठाते हुए 69 लोगों की नागरिकता समाप्त कर दी है। यह भी दावा किया जाता है कि बहरीन मे शासन तो सुन्नी अल खलीफा परिवार के हाथों में है, परंतु वहां पर 60% के लगभग शिया आबादी है, जिसके कारण वहां लगातार तनाव रहता है। वहां की सरकार का यह भी आरोप रहता है कि ईरान अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए शिया समुदाय का प्रयोग करता है और उनका इस्तेमाल करके तख्तापलट की साजिश रच रहा है।
अमेरिका-ईरान के युद्ध के बीच बहरीन में आंतरिक अस्थिरता
28 फरवरी 2026 के बाद जब ईरान और अमेरिका के बीच जंग शुरू हुई थी, तो बहरीन पर एक तरफ तो ईरान हमले कर रहा था, जिसमें उसकी रीफाइनरी भी शामिल थी। और इसके साथ ही बहरीन में भी शिया समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए थे। फरवरी-मार्च में ही सरकार को इन विरोध प्रदर्शनों पर कड़ी कार्यवाही करनी पड़ी थी और सैकड़ों लोगों को सरकार ने जेल में डाला था।
यह भी दावा किया जा रहा है कि काफी संख्या मे शिया समुदाय के लोग ईरान के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उसने अपने देश में अमेरिकी ठिकानों पर हमलों का समर्थन भी किया था। मीडिया में ये रिपोर्ट्स तक चलने लगी थीं कि युद्ध के बाद हो सकता है कि बहरीन में तख्तापलट हो जाए। उस समय जो गिरफ्तारियां हुई थीं, उसका विरोध मानवाधिकर संगठनों ने किया था। लोगों ने कहा था कि शिया समुदाय के लोगों के बीच डर और आतंक का माहौल है। उन पर ईरान के कदमों का महिमामंडन करने के आरोप लगाए गए थे।
इसी बीच यह भी रिपोर्ट्स कुछ संगठनों ने चलाना आरंभ किया कि कैसे ईरान युद्ध नागरिकता के हथियार की वापसी कर रहा है। इसमें यह आरोप लगाया गया कि ईरान युद्ध के बहाने लोगों की नागरिकता छीनी जा रही है। स्थानीय लोगों को आतंकी करार दिया जा रहा है और साथ ही उनसे विरोध प्रदर्शन का अधिकार छीना जा रहा है। अब यहां पर एक और बात उभरकर आती है कि ये विरोध प्रदर्शन क्या देश की सुरक्षा से बढ़कर होते हैं? क्या किसी भी देश के नागरिकों को यह अधिकार हो सकता है कि वह अपने ही देश का विरोध तब करे, जब वह संकट में है?
बहरीन ने जो कदम उठाया है, वह सुल्तान हामिद बिन इस अल खलीफा से शाही हुकुम के अनुसार उठाया है जो कि बहरीन के राष्ट्रीयता कानून की धारा 10/3 के अनुपालन में है। यह धारा यह अधिकार देती है कि उन लोगों का अधिकार छीना जा सकता है, यदि वे राज्य के हितों को हानि पहुंचाते हैं या फिर इस तरीके से काम करते हैं जो उनकी वफादारी के उलट हो।
पांच लोगों को जेल भेजा
अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार बहरीन में पांच लोगों को ईरान के साथ मिलकर आतंकी और शत्रुतापूर्ण कदम उठाने के कारण दोषी पाए जाने पर उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। इनमें दो अफगानी नागरिक और तीन बहरीन के नागरिक थे। इसी से जुड़े एक घटनाक्रम में, 25 अन्य लोगों को कथित तौर पर सुल्तान के खिलाफ ईरान से जुड़ी गतिविधियों का समर्थन करने के आरोप में 10 साल तक की जेल की सज़ा सुनाई गई।















