ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच जब पारंपरिक कूटनीतिक प्रयास लगभग निष्फल होते दिख रहे हैं, तब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जो रणनीतिक होने के साथ-साथ प्रतीकात्मक भी है। रूस द्वारा ईरान के संवर्धित यूरेनियम को अपने पास रखने का प्रस्ताव केवल तकनीकी समाधान नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति में अपनी भूमिका को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।
इस प्रस्ताव का उद्देश्य सबसे बड़े विवाद-ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम-को हटाकर उसे रूसी निगरानी में रखना है। इससे एक ओर पश्चिम की चिंताओं को कम किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर ईरान को अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम का अधिकार बनाए रखने का अवसर मिलता है।
तेहरान पर प्रभाव
रूस का प्रभाव केवल अनुमान नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का अमेरिका के बजाय सेंट पीटर्सबर्ग जाकर वार्ता करना इस प्रभाव का प्रमाण है।नरूस को ईरान एक दबाव डालने वाले देश के रूप में नहीं, बल्कि एक सहयोगी के रूप में देखता है। यही कारण है कि पुतिन के आश्वासन अधिक विश्वसनीय प्रतीत होते हैं।
अमेरिका-रूस सहयोग की संभावना
यदि इस प्रस्ताव को गंभीरता से लिया जाए, तो यह अमेरिका और रूस के बीच सहयोग का एक नया रास्ता खोल सकता है। यूक्रेन युद्ध के बावजूद, दोनों देशों के बीच एक साझा चिंता है-परमाणु प्रसार को रोकना। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पुतिन के साथ अच्छे संबंधों के दावे इस दिशा में संभावनाएं पैदा करते हैं। एक संयुक्त ढांचा, जिसमें रूस यूरेनियम की निगरानी करे और अमेरिका प्रतिबंधों में राहत दे, एक व्यवहारिक समाधान हो सकता है।
ईरान परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी गतिरोध
विरोधाभासी स्थितियां
रूस के प्रस्ताव के बावजूद, मूल विवाद अभी भी कायम है। अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह संवर्धन बंद करे, जबकि ईरान इसे अपना अधिकार मानता है। ईरान ने 60% यूरेनियम को कम करने का संकेत दिया है, लेकिन संवर्धन समाप्त करने को तैयार नहीं है। यही अंतर समाधान में सबसे बड़ी बाधा है।
अमेरिकी प्रभाव में कमी
अमेरिका की स्थिति भी कमजोर होती दिख रही है। उसने पहले ही शासन परिवर्तन की मांग छोड़ दी है, जो पहले उसका मुख्य उद्देश्य था। अब स्थिति यह है कि अमेरिका बातचीत के लिए अधिक इच्छुक दिखता है, जबकि ईरान टालमटोल कर रहा है। इससे संतुलन ईरान के पक्ष में जाता दिख रहा है।
परमाणु निगरानी एजेंसी की चेतावनी
राफेल ग्रॉसी के अनुसार, ईरान के पास कई परमाणु हथियार बनाने लायक सामग्री है, हालांकि हथियार निर्माण की पुष्टि नहीं हुई है। उनका मानना है कि केवल कूटनीति ही समाधान है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भविष्य में ईरान अपनी क्षमता फिर से विकसित कर सकता है।
अन्य पक्ष और कूटनीतिक संकेत
पाकिस्तान की भूमिका
पाकिस्तान की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। वह केवल एक मंच प्रदान कर रहा है या वास्तविक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है-यह स्पष्ट नहीं है। अमेरिका द्वारा उसे महत्व देना यह दर्शाता है कि कूटनीति में प्रतीकात्मकता भी महत्वपूर्ण हो गई है।
अवसर या भ्रम
पुतिन का प्रस्ताव एक ठोस समाधान का आधार प्रदान करता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित देश अपने कठोर रुख से बाहर निकलने को तैयार हैं या नहीं। यदि लचीलापन नहीं दिखाया गया, तो यह प्रयास भी एक और कूटनीतिक मृगतृष्णा बनकर रह जाएगा।

















