कॉर्पोरेट ड्रेस कोड विवाद : सिंदूर-बिंदी से दूरी फिर हिजाब क्यों जरूरी?
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कॉर्पोरेट ड्रेस कोड विवाद : सिंदूर-बिंदी से दूरी फिर हिजाब क्यों जरूरी? सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के मन में प्रश्न

क्या भारतीय कॉर्पोरेट्स में हिंदू धार्मिक प्रतीकों के प्रति भेदभाव हो रहा है? लेंसकार्ट और इंडिगो एयरलाइंस की ग्रूमिंग पॉलिसी में बिंदी-सिंदूर बनाम हिजाब को लेकर छिड़ी बहस। जानिए क्यों सोशल मीडिया पर उठ रहे हैं तीखे सवाल और क्या है कंपनियों की सफाई।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Apr 29, 2026, 05:07 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मत अभिमत, सोशल मीडिया
Lenskart Indigo Dress Code Controversy Bindi vs Hijab

कॉर्पोरेट ड्रेस कोड विवाद: सिंदूर-बिंदी और हिजाब बहस

भारतीय कॉर्पोरेट्स इन दिनों चर्चा में है। यह सब शुरू हुआ था, टीसीएस में घटी एक घटना से, जिससे पता चला कि कैसे कॉर्पोरेट स्तर पर भी जिहाद हो सकता है और उसके बाद एकदम से ही ऐसे कई कॉर्पोरेट्स की नीतियाँ सामने निकलकर आने लगीं, जिन्हें भारत के लोग बहुत ही अच्छा मानते थे या फिर यह कहा जाए कि जहां काम करने का लगभग सभी का सपना रहता था। ये नीतियाँ ऐसी थीं, जिनपर सहज विश्वास ही नहीं हो सकता था। जिनपर यकीन करना लगभग नामुमकिन ही था।

हिंदू प्रतीकों को लेकर सवाल

मगर ये सब सच था। और यह ऐसा सच था, जो न ही दबा छिपा था, न ही परदे में था, सामने ही था, मगर उस पर सहज ध्यान नहीं था। वह सच था हिन्दू प्रतीकों से दिल से नफरत! हिन्दू धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों से जो नफरत थी, वह अब खुलकर सतह ओर आ गई। जबकि हिजाब जैसे प्रतीक उनके लिए गर्व का विषय है।

समानता के सिद्धांत पर बहस

हिजाब पर गर्व करना या न करना एक अलग बात है, उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, बशर्ते यही गर्व का भाव हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों को भी प्राप्त हो।

ड्रेस कोड में असमानता के आरोप

दुर्भाग्य की बात यह है कि एक तरफ हिन्दू प्रतीक जैसे कि बिंदी, सिंदूर, कलावा आदि को नीतियों में शामिल नहीं किया जाता है तो वहीं हिजाब, जिसकी अनिवार्यता को लेकर मुस्लिम देशों की महिलाएं आंदोलन कर रही हैं, उस पर कोई रोक नहीं है। ऐसा क्यों कि लेंसकार्ट से लेकर इंडिगो एयरलाइंस में हिजाब और पगड़ी जैसे प्रतीक तो स्थान पा रहे हैं, परंतु बिंदी या सिंदूर और कलावा नहीं? हिन्दू प्रतीकों को लेकर इस सीमा तक नकार का कारण क्या है, यह भी सहज समझ में नहीं आता है।

लेंसकार्ट विवाद की शुरुआत

टीसीएस में हुए कॉर्पोरेट जिहाद के बीच चश्मे और धूप के चश्मे एवं कान्टैक्ट लेंस वाली भारतीय कंपनी लेंसकार्ट के ड्रेस कोड को लेकर यह विवाद पहली बार सामने आया। यह प्रश्न पहली बार सामने आया कि आखिर बिंदी क्यों यूनिफ़ॉर्म में गैर जरूरी हो गई और हिजाब पर कोई रोकटोक नहीं?

अंतर्राष्ट्रीय मानकों का तर्क

इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय मानकों का तर्क दिया जाता है। परंतु अंतर्राष्ट्रीय मानक भारतीय बाजार पर क्यों लागू होंगे और वह भी ड्रेस के मामले में? बाजार स्थानीय लोक के लिए होता है, स्थानीय लोक के अनुसार होता है और स्थानीय लोक के कारण होता है। देखा जाए तो लेंसकार्ट जैसे ब्रांडस के सबसे बड़े ग्राहक हिन्दू ही होते हैं। मगर बिंदी या सिंदूर वाले माथे के साथ लेंसकार्ट के चश्मे का विज्ञापन ही नहीं आता।

विज्ञापनों में धार्मिक प्रतीकों की अनुपस्थिति

नो बिंदी, नो बिजनिस के बाद कुछ-कुछ ब्रांडस बिंदी तो कभी कभी अपने विज्ञापनों में प्रयोग करने लगे हैं, परंतु शेष प्रतीक जैसे कि सिंदूर तो लगभग हर उत्पाद के विज्ञापनों से गायब है। क्या यह समझा जाए कि जो भी ब्रांडस हैं, वे बिंदी और सिंदूर लगाने वाली महिलाओं को ध्यान में रखकर उत्पाद बनाते ही नहीं हैं?

लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया

हालांकि लेंसकार्ट ने माफी मांगते हुए नई ड्रेस कोड जारी कर दी, मगर उससे खास फर्क नहीं पड़ा है, क्योंकि असलियत जाहिर हो चुकी है।

इंडिगो एयरलाइंस : हिजाब वाली पायलट स्वीकार, मगर बिंदी और सिंदूर नहीं

लेंसकार्ट का विवाद जहां अभी जारी है, वहीं सोशल मीडिया पर भारत की दो मुख्य एयरलाइंस की गाइडलाइंस भी सामने आईं। जिनमें हिन्दू महिलाओं के धार्मिक प्रतीकों को लेकर वही नकार का भाव था, जो लेंसकार्ट में देखा गया था या फिर जो अमूनन अधिकांश भारतीय कॉर्पोरेट्स में देखा जाता है।

बात एयर इंडिया की, जिसके मैन्युअल को लेकर विवाद हुआ था। यह कहा गया था कि एयर इंडिया में बिंदी पर रोक है। इस पर एयर इंडिया की तरफ से सफाई आई थी कि वह पुराना मैन्युअल था और एयर इंडिया में बिंदी पर कोई रोक नहीं है। हाँ, बिंदी का एक आकार तय है और इंडो-वेस्टर्न ड्रेस पर बिंदी की अनुमति नहीं।

हिजाब और पायलट का मामला

और अब इंडिगो एयरलाइंस की एक ऐसी खबर सामने आई है, जिससे एक बार फिर से यह सामने आया है कि हिन्दू धर्म के सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों के प्रति दृष्टि कहीं न कहीं संकुचित है! इंडिगो एयरलाइंस को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसा दावा किया जा रहा है कि बिंदी और सिंदूर नहीं पहन सकते हैं, मगर वर्ष 2025 में इंडिगो में सलवा फातिमा (Salwa Fatima) पहली ऐसी पायलट बनी, जिसकी पहचान यह बनी कि वह पहली हिजाब पहनने वाली पायलट है।

कॉर्पोरेट सफाई और सवाल

इंडिगो एयरलाइंस का कहना है कि वे सभी अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार करते हैं। अब ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि विश्व में कई इस्लामिक मुल्क हैं, जहां पर लड़कियों को हिजाब न पहनने के कारण मौत के घाट तक उतार दिया जाता है। जहां पर हिजाब की आड़ में लड़कियों को घरों में ही कैद कर दिया गया है, ऐसे में जब मीडिया भी इस बात को गर्व से कहता है कि पहली हिजाब पहनने वाली महिला पायलट, तो क्या ऐसे में वह उन लाखों लड़कियों के संघर्ष और घावो पर नमक नहीं बुरक रहा है, जो अनिवार्य हिजाब के नियम के चलते जान तक गंवा रही हैं? या फिर वह खुद ही ग्लैमराइज़ नहीं कर रहा है?

पेशेवर लुक बनाम धार्मिक पहचान

और इंडिगो एयरलाइंस ने अपनी सफाई में यह कहा है कि उसकी ग्रूमिंग पॉलिसी का उद्देश्य केवल पेशेवर लुक बनाए रखना है, न कि किसी धार्मिक पहचान को दबाना!

तो फिर यह भी प्रश्न उठता है कि बिंदी और सिंदूर या कलावा या मंगलसूत्र से कैसे पेशेवर लुक खराब हो सकता है और कैसे बिंदी, सिंदूर, कलावा या मंगलसूत्र से सुरक्षा को खतरा हो सकता है?

कॉर्पोरेट नीतियों पर व्यापक बहस

खैर! ये तो बानगी है, परंतु कई कॉर्पोरेट्स में ग्रूमिंग पॉलिसी के नाम पर ऐसे तमाम नियम हैं, जो कहीं न कहीं हिन्दू आस्थाओं को चोट पहुंचाते हैं, जैसे कि इन मामलों के बाद स्क्रीन शॉट्स वायरल हुए थे। अब ऐसा क्यों है, इस पर चर्चा आवश्यक है कि क्यों बिंदी, सिंदूर और कलावा कॉर्पोरेट्स के लिए अस्वीकार्य होते जा रहे हैं?

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