सुशिक्षित जैब जुबेर अंसारी ने महाराष्ट्र में जिन दो सिक्योरिटी गार्डों पर धर्म पूछने के बाद चाकू से हमला किया,वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं है। अभी तक सामने आए तथ्यों के आधार पर इसे आसानी से खारिज करना गलत होगा। आरोपी के पास से आईएसआईएस, जिहाद और गाजा जैसे शब्दों से जुड़ा नोट मिलना और हमला करने से पहले धर्म पूछना, यह संकेत देते हैं कि मामला महज व्यक्तिगत विवाद या अचानक उपजी हिंसा का नहीं हो सकता।
हालांकि जांच अभी जारी है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन प्रारंभिक संकेतों को नजरअंदाज करना भी खतरनाक है। इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू उसका पैटर्न है। पहले धार्मिक पहचान पूछना, फिर पुष्टि करने की कोशिश और अस्वीकार होने पर जानलेवा हमला। यह व्यवहार अचानक नहीं, बल्कि सोच समझ कर अपनाई गई प्रक्रिया जैसा है।

दुनिया भर में किसी कट्टर विचारधारा से प्रभावित होकर होने वाले हमलों में इसी तरह की मानसिकता देखी जाती है, जहां व्यक्ति किसी नेटवर्क का हिस्सा न होते हुए भी हिंसा को अंजाम देता है। सिक्योरिटी गार्डों पर हुआ घातक हमला भारत में पिछले वर्ष हुए एक बड़े घटना की याद कराता है,जब 2025 में कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों की हत्या की गई, जिसमें कथित रूप से धर्म पूछकर लोगों को निशाना बनाया गया। तरीका अलग हो सकता है, पैमाना छोटा या बड़ा हो सकता है, लेकिन मर्म एक ही है, पहले पहचान तय करो, फिर जीवन का मूल्य तय करो। महाराष्ट्र में मीरा रोड की घटना उसी सोच का छोटा,लेकिन स्पष्ट उदाहरण है। अगर इसे केवल अलग-थलग घटना कहकर छोड़ दिया जाए, तो यह धोखे से ज्यादा कुछ नहीं होगा। इसी तरह, बैंगलुरु में बुजुर्ग दंपति के साथ बदसलूकी हो या कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, हर बार एक ही गलती दोहराई जाती है, घटनाओं को अलग-अलग खानों में बांटकर उनकी गंभीरता कम करने का प्रयास होता है।
इसी का परिणाम है कि समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचा जाता। दूसरी तरफ, हाल के वर्षों में कॉरपोरेट जगत से जुड़े विवाद भी नई बहस को जन्म दे रहे हैं। लेंसकार्ट,जोमैटो,एयर इंडिया, इन्फोसिस और टीसीएस जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में भी धार्मिक प्रतीकों कलावा,सिंदूर,मंगलसूत्र और तिलक को लेकर विवाद सामने आते हैं। समस्या यह है कि समाज और व्यवस्था दोनों ही चयनात्मक प्रतिक्रिया के जाल में फंसे हैं। जब पीड़ित हमारी सुविधा के अनुसार होता है, तब संवेदनशीलता दिखती है, और जब नहीं होता, तब चुप्पी छा जाती है। यही दोहरा मापदंड धीरे धीरे अविश्वास और विभाजन को गहरा करता है। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जब बैंगलुरु की घटना पर नजर गई तो उसे विचलित करने वाली घटना कहा गया था,लेकिन सोशल मीडिया के अलग अलग प्लेटफार्म पर जो लोग बुजुर्ग दंपती के शब्दों से विचलित हुए थे,वे दो सिक्योरिटी गार्ड का धर्म पूछ कर हमला करने वाले जुबेर के कृत्य से विचलित नहीं हुए। वे निंदा के दो शब्द तक ना लिख सके,शायद वह शब्द भविष्य में चयनात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए पिटारे में बंद हों। खैर,शासन प्रशासन को चाहिये की हर ऐसी घटना की बिना किसी पूर्वाग्रह के, तथ्यों के आधार पर कठोर और पारदर्शी जांच कराये। अगर आतंकी या वैचारिक कनेक्शन साबित होता है, तो बिना किसी हिचकिचाहट के सख्त कार्रवाई होनी चाहिये। मीरा रोड की घटना भले ही पैमाने में छोटी हो, लेकिन उसका संकेत बड़ा है। अगर समाज अब भी इसे समझने से इंकार करता है, तो समस्या घटनाओं में नहीं, नजरिये में है।











