फिलहाल युद्ध विराम तो हो गया है। दरअसल, ईरान की हुकूमत ने लेबनान में युद्धविराम की मांग की थी, उसका कहना था कि इसके बिना अमेरिका के साथ बातचीत आगे नहीं बढ़ सकती। बहरहाल युद्ध विराम पर सहमति तो बनी हुई है, लेकिन यदि आगे युद्ध जारी रहता है तो यह वैश्विक व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। विश्व बैंक के भारतीय मूल के अध्यक्ष अजय बांगा ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच यदि अब भी युद्ध जारी रहा और मध्य पूर्व में तनाव बना रहा तो यह वैश्विक व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। इसके चलते दुनिया को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
कुछ सप्ताह पहले मूडीज के मुख्य अर्थशास्त्री मार्क जेंडी ने कहा कि 2026 के प्रारंभ से ही अमेरिका में मंदी शुरू होने के संकेत हैं। मूडीज के इस अर्थशास्त्री का कहना है कि आर्थिक गिरावट, जिसकी वॉल स्ट्रीट के स्तर पर आशंका थी, शायद शुरू हो चुकी है। श्रम बाजार संकेतक इस ओर इशारा कर रहे हैं। रोजगार ग्रोथ कमजोर हुई है और श्रम की भागीदारी कम हुई है। खर्चे में कमी आ रही है, जो सीधे तौर पर मंदी की ओर संकेत कर रहे हैं। नतीजा, 2025 की चौथी तिमाही में ग्रोथ लचर होती हुई मात्र 0.5 प्रतिशत ही रह गई है।
ऐसे में अजय बांगा का हालिया बयान और अधिक चिंता बढ़ाने वाला है, जिसमें उन्होंने संभावित वैश्विक मंदी की ओर संकेत किया है। विश्व बैंक अध्यक्ष ने कहा है कि वैश्विक ग्रोथ एक प्रतिशत कम हो सकती है। मध्य पूर्व देशों की विकास दर, जो पहले 4% थी, अब घटकर 1.8% रहने का अनुमान है। तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है, और ईंधन महंगा होने से परिवहन और खेती की लागत बढ़ सकती है, जिससे खाद्य संकट बढ़ सकता है और महंगाई भी बढ़ सकती है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से 20% कच्चा तेल गुजरता है, के अवरोध से ऊर्जा बाजार पूरी तरह से चरमरा सकता है।

बढ़ जाएंगी कीमतें
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के एक अनुमान के अनुसार, मध्य पूर्व में सैन्य तनाव बढ़ने से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 97 अरब डॉलर से लेकर 299 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसकी मुख्य वजह परिवहन, बिजली और भोजन की बढ़ती कीमतें होंगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नुकसान क्षेत्रीय जीडीपी का लगभग 0.3% से 0.8% होगा। यूएनडीपी ने यह भी अनुमान लगाया है कि इस युद्ध के कारण दुनिया भर में 3.2 करोड़ लोगों के गरीबी की चपेट में आने का खतरा पैदा हो गया है, जिनमें से 88 लाख लोग एशिया-प्रशांत क्षेत्र के हैं।
यह सही है कि विश्व के सभी देश एक-दूसरे से जुड़े हैं। वैश्विक संघर्षों के कारण मार्ग अवरुद्ध होने से तेल तो महंगा होगा ही, साथ ही ग्लोबल वैल्यू चेन भी बाधित हो सकती है। यही नहीं, वैश्विक व्यापार बाधित होने से निर्यात घट सकता है, जिससे वैश्विक उत्पादन घट सकता है। ऐसी सभी अर्थव्यवस्थाएं, जो निर्यात आधारित हैं, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है। हालांकि एक मार्ग बंद होने से दूसरे मार्गों से माल की आवाजाही हो सकती है, लेकिन लंबे रास्तों के कारण परिवहन लागत बढ़ जाएगी, जिसके कारण प्रतिस्पर्धा शक्ति कम हो सकती है।
यह भी संभव है कि दूसरे दूर स्थान से माल की आवाजाही बढ़ने के कारण देश अपने आसपास के क्षेत्र से सामान अधिक मंगाएं। यही नहीं, वे पहले से अधिक अंतर्मुखी हो जाएंगे। इसके अलावा बीमा लागत भी बढ़ सकती है।
विकासशील देशों पर इस युद्ध का प्रभाव और अधिक पड़ सकता है। स्पष्ट है कि विकासशील देशों पर इस युद्ध का असर विकसित देशों से भी ज्यादा पड़ेगा। सर्वप्रथम, ये देश अन्य देशों पर तेल-गैस, खाद्य पदार्थ और उर्वरकों के लिए निर्भर होते हैं। तेल-गैस, उर्वरक और खाद्य महंगाई के कारण उनका व्यापार घाटा बढ़ेगा और उन्हें भुगतान संतुलन के संकट का सामना करना पड़ेगा, और उनकी करेंसी का अवमूल्यन हो सकता है। भारत जैसे देश भी इस प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके कारण नागरिक जीवन अस्त-व्यस्त हो सकता है और आम आदमी का जीवन संकट में आ सकता है।
वित्तीय बाजारों का संकट
वित्तीय बाजार वैश्विक परिवर्तन और उथल-पुथल के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। भारत जैसे विकासशील देश, जहां पिछले लंबे समय से आर्थिक संवृद्धि के साथ वित्तीय बाजारों का भी विकास हुआ है। गौरतलब है कि भारत के शेयर बाजारों में पिछले लगभग 35 वर्षों में भारी उछाल आया है। भारतीय शेयर मार्केट का कुल बाजार पूंजीकरण, जो 1991 में मात्र 3 लाख करोड़ रुपए से भी कम था, युद्ध के प्रारंभ होने तक 430 लाख करोड़ रुपए पहुंच चुका था। मुंबई का संवेदी सूचकांक, जो जुलाई 1991 में 1200 अंकों पर ही था, मार्च 2026 तक बढ़ता हुआ 80000 तक पहुंच चुका था।
संवेदी सूचकांक में 1000 अंकों की गिरावट बाजार पूंजीकरण को लगभग 10 लाख करोड़ रुपए कम कर देती है। यानी जो मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक युद्ध से पहले 80000 था, वह अब घटकर 76847 तक पहुंच चुका है। इसका असर यह हुआ कि जो बाजार पूंजीकरण मार्च 2026 को 430 लाख करोड़ रुपए था, 13 अप्रैल 2026 तक ₹390 से 400 लाख करोड़ रुपए रह गया है।
शेयर बाजारों में गिरावट का कारण देश में निवेश वातावरण में कमी नहीं, बल्कि विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार से भारी बिकवाली रहा। गौरतलब है कि 28 फरवरी से 14 अप्रैल 2026 के बीच विदेशी निवेशकों ने भारत से 1.36 लाख करोड़ रुपए की निवल बिकवाली की, यानी 14.7 अरब डॉलर।
जिसका सीधे असर शेयर बाजारों पर पड़ रहा है। हालांकि इस बीच बड़ी मात्रा में घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भी भारी खरीद की है। गौरतलब है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली की वजह भारतीय अर्थव्यवस्था में कमी नहीं, बल्कि उनकी अपनी मजबूरी है, जिसका कारण यह है कि जिन स्थानों को वे सुरक्षित मानते हैं, वहां अपना धन स्थानांतरित कर देते हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली का असर केवल शेयर बाजारों में गिरावट के रूप में नहीं, बल्कि रुपए के मूल्य के रूप में भी दिखाई देता है, क्योंकि इस दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगभग 15 अरब डॉलर भारत से बाहर भेजे हैं। इसके कारण रुपए की विनिमय दर भी 91.5 रुपए प्रति डॉलर से 93 रुपए प्रति डॉलर के आसपास पहुंच चुकी है। यानी कहा जा सकता है कि युद्ध का असर शेयर बाजारों और विदेशी मुद्रा बाजारों सहित विभिन्न वित्तीय बाजारों पर पड़ता है, जो देश में निवेश वातावरण बिगाड़ सकता है और रुपए के अवमूल्यन से महंगाई की आशंका भी बढ़ जाती है।
क्या है समाधान
वास्तविकता यह है कि जहां विकसित और विकासशील देश दोनों ही इस युद्ध और संघर्षों से प्रभावित हो रहे हैं। अमेरिका ही नहीं, समस्त विश्व पर मंदी के बादल छा रहे हैं। ऐसे में क्या इससे बचने का कोई तरीका हो सकता है? स्वाभाविक ही है कि सभी देश अपने-अपने तरीके से इस संकट से बचने के लिए प्रयास करेंगे ही। ऐसे में भारत के समक्ष क्या विकल्प है, इसे जानना जरूरी है।
आपदा में अवसर
यह सही है कि युद्ध और संघर्षों के कारण पूरे विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में भारी संकट व्याप्त है। अधिकांश विकासशील देशों में व्यापार संतुलन और भुगतान संतुलन में असंतुलन बढ़ रहा है। उनकी मुद्राओं में अवमूल्यन हो रहा है। तेल, खाद्य और उर्वरकों की महंगाई के चलते, मुद्रास्फीति के अलावा खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक उत्पादन सभी प्रभावित हो रहे हैं। हमें विचार करना होगा कि कैसे भारत न केवल इस संकट से उबर पाए, बल्कि वर्तमान परिस्थितियों से लाभ उठाते हुए ग्रोथ प्रक्रिया को बरकरार रखा जाए।
बात बहुत पुरानी नहीं है। वर्ष 2020 में जब विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा था, तो भारत ने विदेशों पर निर्भरता कम करते हुए आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया था। दुनिया में सबसे पहले वैक्सीन विकसित करने और उस वैक्सीन को समस्त जनता को उपलब्ध कराने का काम भारत ने किया था। जहां अमेरिका द्वारा इस्तेमाल की गई फाइजर कंपनी की वैक्सीन अभी भी संदेह के घेरे में है, भारत महामारी से पार पाते हुए विकास के मार्ग पर अग्रसर हो गया। आज भारत के समक्ष पेट्रोलियम आधारित इंधन की कमी सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
एक तरफ भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव है, तो दूसरी तरफ मार्ग अवरुद्ध होने के कारण भारत को शेष दुनिया से अधिक महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है। युद्ध के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक शेयर बाजारों में लगाया गया पैसा वापस ले जाने की फिराक में हैं। ऐसे में एक तरफ तेल महंगा होने के कारण विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन हो रहा है, तो दूसरी तरफ विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भी भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर भेजी जा रही है। हालांकि विभिन्न उपाय अपनाकर भारतीय रिजर्व बैंक रुपए में स्थिरता लाने का प्रयास कर रहा है, फिर भी युद्ध के शुरू होने से लेकर अब तक रुपए में लगभग 1 प्रतिशत का अवमूल्यन हो
चुका है।
आत्मनिर्भरता ही है विकल्प
सर्वप्रथम, भारत को विदेशी इंधन पर अपनी निर्भरता घटानी होगी। ध्यातव्य है कि भारत परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन और घरेलू ईंधन-सबके लिए विदेशों से आने वाले कच्चे तेल और गैस पर भारी रूप से निर्भर है। आज कच्चे तेल के लिए हमारी विदेशों पर निर्भरता लगभग 85 से 88 प्रतिशत है। गैस के संबंध में हमारी निर्भरता विदेशों पर लगभग 45 से 50 प्रतिशत है। विदेशों से आने वाले तेल और गैस में सबसे ज्यादा उपयोग परिवहन पर, उससे कम उद्योगों, रसोई ईंधन और बिजली उत्पादन के लिए होता है।एक तरफ कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं, साथ ही आपूर्ति अवरुद्ध होने पर हमारी परिवहन व्यवस्था, सामान्य जन-जीवन और औद्योगिक उत्पादन सभी प्रभावित हो सकते हैं। यह सच है कि आगे आने वाले कुछ समय तक भारत की निर्भरता आयातित तेल और गैस पर जारी रहेगी, लेकिन उसे क्रमशः घटाने की आवश्यकता होगी।
इस संदर्भ में बैटरी आधारित विद्युत वाहन (कार, दोपहिया, ट्रक, टेम्पो, बस इत्यादि) के अधिकाधिक उपयोग की ओर आगे बढ़ना होगा। देश में अधिकांश ऑटोमोबाइल कंपनियां बड़ी संख्या में विद्युत वाहन बना रही हैं और धीरे-धीरे वे लोगों द्वारा इस्तेमाल भी किए जा रहे हैं। इसकी गति को बढ़ाना होगा।
साथ ही नवीकरणीय एवं वैकल्पिक स्रोतों जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, न्यूक्लियर ऊर्जा-सभी का उत्पादन बढ़ाना होगा और आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी होगी। हाल ही में न्यूक्लियर ऊर्जा के संबंध में देश में सराहनीय प्रयास हो रहे हैं, उन्हें और अधिक तेज करने की जरूरत है। सौर ऊर्जा में भारत लगभग 20 प्रतिशत ही आत्मनिर्भर है, जबकि पवन ऊर्जा में हमारी आत्मनिर्भरता 45 प्रतिशत के आसपास है। हमें इन सभी में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी होगी।
युद्ध और संघर्षों के कारण उत्पन्न यह स्थिति भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने की दिशा में प्रेरणा का काम कर सकती है।
















