आस्था और अनुशासन का अनूठा संगम
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आस्था और अनुशासन का अनूठा संगम

ओंकारेश्वर के नर्मदा तट पर शंकराचार्य जयंती के पावन अवसर पर जुटे युवाओं का अनुशासित समूह केवल आस्था ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की एक जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कर गया। ‘शंकर दूतों’ की यह पहल भारत की सनातन चेतना को नई पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त प्रयास बनकर उभरी

Written byविजय मनोहर तिवारीविजय मनोहर तिवारी
Apr 28, 2026, 03:55 pm IST
inविश्लेषण, धर्म-संस्कृति, मध्य प्रदेश
नर्मदा तट पर देश -विदेश के युवा ‘शंकरदूत’ के रूप में हुए दीक्षित

नर्मदा तट पर देश -विदेश के युवा ‘शंकरदूत’ के रूप में हुए दीक्षित

21 अप्रैल 2026, प्रात: 6.45 बजे। मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में नर्मदा के तट पर कुंभ जैसी स्थिति रही, जब 500 से अधिक युवाओं का एक अनुशासित समूह सूर्योदय की पवित्र बेला में डुबकी लगाने नर्मदा में उतरा। वैशाख शुक्ल पंचमी का यह दिन विशेष था। आचार्य शंकर की जयंती का प्रसंग। इन युवाओं का नेतृत्व कर रहे सनातन के प्रख्यात वक्ता जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि आचार्य शंकर की वैचारिक कुल परंपरा के एक सम्मानित वाहक की भूमिका में एक ऋ षि की भांति आगे दिखाई दे रहे थे।

मंधाता की सुंदर पर्वतीय श्रृंखला पर निर्माणाधीन एकात्म धाम पर 108 फुट ऊंची आचार्य शंकर की बहुधातुई प्रतिमा के समक्ष पांच दिन के एकात्म पर्व में शामिल होने लोग दूर-दूर से आए। स्वामीजी ने कहा, “अब तक हम अपने धर्म और दर्शन का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार नहीं कर सके परंतु अब सीमाएं तोड़ने का समय है। आज ऐसे प्रकल्पों की आवश्यकता है, जो आदि शंकराचार्य के विचारों को विश्व भर में प्रसारित कर सकें। युवाओं के ऐसे समूह इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।”

सांस्कृतिक पुनर्जागरण

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की एक अनूठी पहल ने देश-विदेश के जिज्ञासु युवाओं को एक ऐसे सूत्र में बांध दिया है, जो भारत की सनातन जड़ों से जोड़ने वाला है। इसके अंतर्गत बीते पांच वर्षों में हुए 48 शिविरों में 25 प्रदेशों के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और अमेरिका के उच्च शिक्षित युवाओं ने भागीदारी की। दस दिन के इन शिविरों को देश के कोने-कोने में अद्वैत वेदांत के प्रतिष्ठित आचार्यों के मार्गदर्शन में उनके ही गुरुकुलों और केंद्रों पर आयोजित किया गया। ओंकारेश्वर में एकजुट हुए ये युवा इन्हीं शिविरों से निकले हुए ‘शंकर दूत’ हैं।

न्यास के सहायक निदेशक डॉ. शुभम चौहान ने कहा, ‘‘कॅरिअर केंद्रित शिक्षा प्रणाली में शुरू से आखिर तक भारत की सांस्कृतिक परंपराओं का स्थान लगभग शून्य है। जबकि अपने स्वरूप को जाने बिना जीवन की यात्रा अधूरी है।’’ ये शिविर अद्वैत वेदांत की मूल शिक्षाओं पर आधारित हैं। साल भर चलने वाले इन शिविरों की सफलता चौंकाने वाली है। मीडिया, प्रबंधन, प्रौद्योगिकी, एआई, विज्ञान, कला और कानून की पढ़ाई करने वाले युवाओं ने इन शिविरों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। अगले एक साल के शिविरों की हमारी तैयारियां हैं। शिविरों से निकले युवा विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं और अद्वैत ने उन्हें एक दूसरे के साथ भी गहरा जोड़ दिया है।

पुनर्जागरण जैसी यह लहर ओंकारेश्वर से ही उठी। आचार्य शंकर के जीवन में ओंकारेश्वर का विशेष स्थान है। आचार्य शंकर की स्मृति ओंकारेश्वर की पवित्र भूमि पर संस्कृति की एक ठहरी हुई पुकार है। भारत की सांस्कृतिक एकता के महान् अग्रदूत शंकर सदियों पहले आठ वर्ष की आयु में दूर दक्षिण से चलकर नर्मदा के इस सुरम्य तट पर आए थे। तब भगवान शिव के एक ज्योतिर्लिंग से जगमगाती यह पर्वतीय भूमि अद्वैत वेदांत की शिक्षाओं का एक प्रभावशाली केंद्र रही होगी, जिसकी ख्याति समुद्रपर्यंत केरल तक जनमानस में प्रसारित रही होगी। वरना अपनी पूज्य मां से आज्ञा लेकर एक बालक क्यों दो हजार किलोमीटर दूर यहां पहुंचता।

जेएनयू के प्रोफेसर रामनाथ झा ने कहा, “अद्वैत वेदांत की शिक्षाओं ने गुरुकुलों में भारत की प्राचीन धरोहरों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है। भारत में कभी कोई अंधेरा युग नहीं रहा। जिसे अंधेरा युग कहते हैं, तब भी ब्रह्मसूत्र पर 10 भाष्य लिखे गए। तुलसी, कबीर, रैदास, नामदेव और ज्ञानेश्वर जैसे संत-कवियों ने अद्वैत का ही दर्शन आगे बढ़ाया। वनों में, आश्रमों में भारत का मूल विचार और दर्शन हमेशा जीवित रहा। यह आज की पीढ़ी को ज्ञात होना चाहिए और इसीलिए शंकर दूतों की यह पहल अनूठी और प्रभावी है।”

अद्वैत की परंपरा और आधुनिक संदर्भ

अखंड भारत की तीन परिक्रमाएं, चार कोनों पर चार मठ संस्थानों की स्थापना, दसनाम संन्यास परम्परा और पंचदेव पूजन की परंपरा के अलावा ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिषद भाष्यों की रचना कुल 32 वर्ष की आयु के एक महान् आचार्य का एक प्राचीन राष्ट्र के लिए अपना सर्वोत्कृष्ट योगदान है। ओंकारेश्वर की भूमि पर एकात्म पर्व उसी इतिहास पुरुष के प्रति नतमस्तक भाव से कृतज्ञता ज्ञापन का प्रसंग है। पांच दिनों तक चले इस पर्व में 5 विमर्श और 5 संवाद के सत्र हुए, जिनमें देश भर के 40 से अधिक विषय विशेषज्ञ आए।

अयोध्या के प्रसिद्ध आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण ने भारत की संन्यास परंपरा की एक अनूठी विभूति उड़िया बाबा के बारे में कहा कि वे ऐसे थे, जिन्होंने संसार से ही संन्यास नहीं लिया, संन्यास से भी संन्यास ले लिया। वहीं चेन्नई में सर्वम् एआई के संस्थापक डॉ. प्रत्यूष ने कहा, ‘‘जहां पूरा विश्व एआई के दुष्प्रभावों को लेकर भयग्रस्त है वहीं भारत अकेला देश है, जो इस मायावी तकनीक के प्रति सकारात्मकता और आशा से भरा हुआ है। इसका कारण भारत की चेतना में गहरी बैठी दार्शनिक पृष्ठभूमि है। अद्वैत उसका आधार है।

शंकर के पास समय रेत के कण बराबर था और जो उन्हें करना था वह पर्वत जैसी चुनौती थी। उनके समय तक भारत एक महान सांस्कृतिक विरासत संचित कर चुका था और सदियों के दोष भी किसी गंभीर रोग की तरह भारत की चेतना में जा समाए थे। यह हजारों वर्ष की सभ्यता और संस्कृति के अस्तित्व का प्रश्न था। सब कुछ बिखरा हुआ था। यह भयंकर भटकाव का समय था। शंकर को राष्ट्र की सोई हुई शक्ति को जागृत भी करना था और संगठित भी।’’

संस्कृति की सनातन ध्वनि की कोई महागूंज अवश्य ही यहां गहरी व्याप्त रही होगी, जिसने एक संवेदनशील बालक को आकर्षित किया और एक कठिन भूमिका के निर्वहन के लिए उसे तैयार किया। भविष्य के भारत को अपने ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करने के लिए शंकर ने पहला पग यहीं से आगे बढ़ाया था। एकात्म पर्व का प्रसंग उसी पवित्र सनातन पुकार को ध्यानपूर्वक सुनने का संयोग है। शंकर दूत विनम्र तिवारी का अनुभव है कि यह संभवत: विश्व की ऐसी पहली आध्यात्मिक परियोजना है, जिसमें जाति, धर्म और क्षेत्र की भौगोलिक सीमाएं धुंधला गई हैं। अपने स्वरूप को जानने की जिज्ञासा हर दिशा से युवाओं को आकर्षित कर रही है।

सनातन चेतना का प्रवाह

नर्मदा के जल की हर बूंद जब ओंकारेश्वर के तटों को छूकर गुजरती है तो आचार्य शंकर की विराट ऊर्जा का अनुभव आज भी करती है। नर्मदा के दोनों ओर शांत भाव से खड़े ओंकारेश्वर के पर्वत अगर बोल पाते तो अवश्य ही कहते कि वे आचार्य शंकर ही थे, जिन्होंने अद्वैत दर्शन को अमृत कुंड की तरह राष्ट्र के ह्दय में सदा के लिए प्रतिष्ठित कर दिया।

सदियां बीत गईं। शंकर की देह अपने हिस्से की भूमिका पूरी करके अनंत में लीन हो गई। युगों के प्रवाह में 32 साल का अंतराल बूंद बराबर भी नहीं है। इतना ही जीवन था उनका। उसका भी एक छोटा सा हिस्सा गुरू की तलाश में यहां बीता था। मगर नर्मदा ने उनकी उज्जवल स्मृतियों पर कभी समय की धूल नहीं चढ़ने दी। अपने जल से उनकी स्मृतियों का अभिषेक निरंतर किया। एक संकल्प सबको सुनाई दे रहा है-’आदि गुरु शंकराचार्य की पवित्र स्मृति को साक्षी मानकर…हम मन, वचन और कर्म से…एक श्रेष्ठ नागरिक, आदर्श समाज, उन्नत राष्ट्र और मंगलमय विश्व के निर्माण के लिए…जीव, जगत और ईश्वर के मूलभूत एकात्म भाव को आत्मसात करेंगे।’

शंकर दूतों ने यह सिद्ध किया कि भारत एक जीवंत परंपराओं वाला गहरी सांस्कृतिक जड़ों वाला देश है। यहां की संस्कृति हमारी रक्त शिराओं में बहती है। उसे पुरातन मानकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता, वह सनातन है, जो भविष्य की दिशाएं तय करने के लिए अपने महान अतीत से प्रेरणा लेता है।

Topics: ओंकारेश्वरपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक पुनर्जागरणसनातन चेतनाअद्वैत वेदांतशंकर दूतनर्मदा तटआदि शंकराचार्यमंधाता पर्वतएकात्म पर्वसांस्कृतिक एकता'सशक्त भारत'
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