नोएडा की सड़कों पर जो आगजनी और पथराव हुआ, उसे ‘मजदूरों का गुस्सा’ कहना न केवल मूर्खता है, बल्कि यह उन अपराधियों को क्लीन चिट देने जैसा होगा, जो भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। यह हिंसा कोई आकस्मिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि पीएम मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ और योगी आदित्यनाथ के ‘ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी’ के विजन को बाधित करने की सोची-समझी साजिश है।
जांच में एक कड़वा सच सामने आया, गिरफ्तार किए गए दंगाइयों में से आधे से ज्यादा का किसी फैक्ट्री और मजदूरों से कोई लेना-देना नहीं था। ये मजदूरों के भेष में वामपंथी गुंडे थे, जिन्हें विशेष रूप से आग लगाने और पुलिस पर हमला करने के लिए ट्रेनिंग देकर भेजा गया था। यह सीधे तौर पर अर्बन नक्सल नेटवर्क की साजिश है, जो जंगलों से गृह मंत्री अमित शाह द्वारा सफाया करने के बाद अब दिल्ली-एनसीआर के औद्योगिक केंद्रों को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। यूपी एसटीएफ अब इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। उसके हाथ कुछ ऐसे सुराग लगे हैं, जिससे पता चलता है कि यह हिंसक घटना अचानक नहीं हुई थी। प्रशासनिक जांच में सामने आ रहा है कि कुछ ईसाई मिशनरियों और जिहादी संगठनों ने पूरी योजना के साथ नोएडा में हुई हिंसा को अंजाम दिया।
जब नोएडा जल रहा था, तब इसके तार सरहद पार पाकिस्तान से जुड़े थे। साइबर सेल की जांच में यह भी तथ्य सामने आया है कि पाकिस्तान के कुछ सोशल मीडिया हैंडल्स ने ‘पुलिस फायरिंग’ की झूठी खबरें फैलाईं। मोदी-विरोधी ताकतें और उनके विदेशी आका अच्छी तरह से जानते हैं कि वे चुनावी मैदान में मोदी को नहीं पछाड़ सकते, इसलिए वे अब सड़कों पर खून बहाकर भारत को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं।
मिशनरियों और मुस्लिम जिहादी संगठनों की सुनियोजित साजिश एक आंदोलन की शक्ल में देश में सांप्रदायिक दंगा करवाने की रही। जांच के मुताबिक छत्तीसगढ़, झारखंड सहित कई राज्यों के ईसाई मिशनरी इस समय नोएडा में सक्रिय हैं। इस तरह के षड्यंत्र में घरों में काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं। ईसाई मिशनरी एजेंट फैक्ट्री और घरों में काम करने वाली महिलाओं के साथ मिलकर एक गिरोह के रूप में काम करते हैं। ये ईसाई एजेंट इन लोगों से कमाई करते हैं, और इसका बड़ा हिस्सा सीधे चर्च में भेजते हैं, जिसका उपयोग मिशनरियां कन्वर्जन के लिए करती हैं।
देश में कुछ तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ और ‘मोदी-विरोधी (वैचारिक जहर फैलाने वाले)’ इसे अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं। क्या हजारों करोड़ों की संपत्ति को खाक कर देना ‘अधिकार’ है? इन दंगाइयों का मकसद वेतन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत के निवेश को डराना था, ताकि विदेशी कंपनियां चीन छोड़कर भारत न आएं। यह सीधे तौर पर आर्थिक आतंकवाद है।
किन्तु साजिशकर्ता शायद यह भूल गए कि यह 2014 से पहले का भारत नहीं है। उत्तर प्रदेश में कानून का शासन है। उपद्रवियों के पोस्टर अब चौराहों पर लगेंगे और उनकी सात पीढ़ियां मिलकर इस नुकसान की भरपाई करेंगी। जो लोग तरक्की के रास्ते में पत्थर और पेट्रोल बम लेकर खड़े होंगे, उन्हें कुचलना प्रशासन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
नोएडा की यह आग उन लोगों के लिए आखिरी चेतावनी है, जो लोकतंत्र की आड़ में देश को जलाना चाहते हैं। मोदी-विरोधी होना आपका राजनीतिक अधिकार हो सकता है, लेकिन देश-विरोधी होना आपकी मौत का वारंट है। अब समय आ गया है कि इन ‘स्लीपर सेल्स’ और उनके पीछे बैठे सफेदपोश गद्दारों को बेनकाब कर कालकोठरी में डाला जाए।
















