आम आदमी पार्टी के पंजाब के छह और दिल्ली के एक राज्यसभा सांसद ने पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल को कह दिया है कि ‘‘हम ‘आप’ के ‘सात’ नहीं’’। सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल समेत आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में जाने का फैसला इस दल और साथ केजरीवाल के लिए एक बड़ा झटका है।
आप के इन तीन राज्यसभा सदस्यों के अतिरिक्त क्रिकेटर हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत साहनी और स्वाति मालीवाल का अभी भाजपा में शामिल होना शेष है, पर पार्टी से अलग होने की उनकी सहमति यही बता रही कि अब औपचारिकता ही शेष है। आप के कुल दस राज्यसभा सदस्यों में से जो सात सदस्य टूटे, उनमें राघव चड्ढा को हाल में राज्यसभा के उपनेता पद से हटाया गया था। इसके बाद यह साफ हो गया था कि स्वाति मालीवाल की तरह उनका भी पार्टी में कोई भविष्य नहीं है।
चड्ढा को सस्ते समोसे वाला नेता बताकर किया बदनाम
राघव चड्ढा के बारे आप नेता कहते रहे हैं कि वे संसद में आम लोगों के मुद्दे न उठा कर समोसों की बात करते रहे हैं और इसी कारण उन्हें उनके पद से दूर किया गया। इसी तरह आप नेता कह सकते हैं कि अशोक मित्तल के दल त्याग के पीछे ईडी की छापेमारी की भूमिका रही, पर उनके साथ संदीप पाठक का पार्टी छोड़ना बहुत ही आश्चर्यजनक है। वे तो केजरीवाल के भरोसेमंद साथी थे और उनकी गिनती पार्टी के रणनीतिकारों में भी होती थी। फिर इन्होंने पार्टी क्यों छोड़ी ?
पार्टी छोड़ने वाले वरिष्ठों की सूची लम्बी
यह पहली बार नहीं, जब आप के ऐसे नेताओं ने पार्टी छोड़ी हो या फिर उन्हें बाहर जाने को बाध्य किया गया हो, जो केजरीवाल के उन दिनों के साथी रहे, जब पार्टी का गठन भी नहीं हुआ था। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार, शाजिया इल्मी, कुमार विश्वास, मयंक गांधी, राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल जैसे न जाने कितने ऐसे नेता हैं, जिन्होंने केजरीवाल का साथ छोड़ा या फिर उन्हें जबरन किनारे किया गया। इनमें से कई आप के संस्थापक सदस्य थे। इसका सीधा अर्थ है कि समस्या केजरीवाल के नेतृत्व और उनकी रीति-नीति में है। केजरीवाल और उनके साथियों के लिए यह कहना तो आसान है कि भाजपा ने कथित ऑपरेशन कमल के जरिये उसके सांसदों को तोड़ लिया, पर अच्छा होगा कि वे इस पर आत्मचिंतन करें कि उनके घनिष्ठ सहयोगी एक-एक करके उनका साथ क्यों छोड़ रहे हैं?
आप भी बनी कुनबापरस्त व व्यक्तिवादी दल
यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं कि आप ने अपने उदय के साथ नई तरह की और साफ-सुथरी राजनीति करने का जो वादा किया था, वह न जाने कहां गुम हो गया। समय के साथ पार्टी की प्राथमिकताएं बदल गईं और उसने जो आशाएं जगाई थीं, वे भी विलीन हो गईं। नि:संदेह वह दिल्ली के बाद पंजाब में भी सरकार बनाने में सफल रही और फिर राष्ट्रीय दल का दर्जा पाने में भी, पर इसी के साथ उसकी छवि कांग्रेस, सपा, बसपा जैसे परिवारवादी व व्यक्तिवादी दलों जैसी बन गई है, जिनका उद्देश्य जनकल्याण के बजाय कुनबाकल्याण है।
आर्थिक हित की दुहाई कितनी उचित
आप को छोड़ कर गए सांसद लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर अशोक मित्तल और व्यवसायी राजेंद्र गुप्ता के बारे में पंजाब के नेता कह रहे हैं कि अपने आर्थिक हितों के चलते वे पार्टी छोड़ कर गए हैं। ऐसा कहने वाले लोग भूल रहे हैं कि व्यवसायी सदैव सत्ताधारी दल के साथ रहना पसंद करते हैं और वर्तमान में सत्ता आम आदमी पार्टी के पास है। अगर इन नेताओं के पार्टी छोड़ने का कारण आर्थिक होता तो वह सत्ताधारी पार्टी का साथ नहीं छोड़ते क्योंकि आज पंजाब में आप की सरकार है न कि भाजपा की। दल त्याग के आर्थिक कारण बताने वाले क्या जवाब देंगे कि राज्यसभा का टिकट देते हुए क्या इनकी पार्टी के प्रति कोई सेवा देखी गई थी ? क्या वो उस समय पार्टी के सदस्य थे ? क्या इन धनपतियों को टिकट आर्थिक कारणों के चलते नहीं दी गई थी ?
पंजाब की जीत के शिल्पकार राघव चड्ढा व संदीप
आप का साथ छोड़ने वाले सांसदों में राघव चड्ढा व संदीप पाठक पंजाब में 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के शिल्पकारों में बताए जाते हैं। बताते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद इनकी अनदेखी की जाने लगी थी। पंजाब में अगले दस महीनों में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में रणनीतिकारों की अनुपस्थिति का पार्टी को नुक्सान हो सकता है। पूछा जा रहा है कि ‘आप’ का क्या होगा जनाब-ए-आली?

















