गत 12 अप्रैल को मध्य प्रदेश के कटनी रेलवे स्टेशन पर पटना-पुणे एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12150) के स्लीपर कोच एस-1, एस-2, एस-3, एस-4 और एस-7 से 165 नाबालिग मुसलमान बच्चों को उतारा गया। यह कार्रवाई जीआरपी, राज्य पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग और बाल संरक्षण इकाई की संयुक्त टीम ने देर रात की। बाल संरक्षण विभाग के अधिकारियों के अनुसार, उन्हें पहले से सूचना मिली थी कि बच्चों को महाराष्ट्र में मजदूरी या अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों में लगाया जा सकता है। इसी आधार पर कार्रवाई की गई। 165 बच्चों में से 84 को जबलपुर बाल गृह और 81 को कटनी बाल गृह भेजा गया है, जहां उनके रहने, खाने और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था की गई है। ये सभी बच्चे बिहार के अररिया जिले के हैं।
इस मामले में सद्दाम हुसैन और अमानुल्लाह सहित आठ लोगों के विरुद्ध बच्चों की तस्करी के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। पूछताछ में बच्चों के साथ मौजूद सद्दाम ने खुद को महाराष्ट्र के लातूर स्थित एक मदरसे का शिक्षक बताया और दावा किया कि वह बच्चों को पढ़ाई के लिए ले जा रहा था। उसने यह भी कहा कि वह पिछले दस वर्ष से इसी तरह बच्चों को ले जाता रहा है। हालांकि जांच में बच्चों के पास वैध दस्तावेजों और पुख्ता टिकट का अभाव पाया गया, जिससे मामला और अधिक संदिग्ध हो गया।
इधर घटना की जानकारी मिलते ही अररिया के जोकीहाट थाने के बाहर उन बच्चों के अभिभावकों ने हंगामा शुरू कर दिया। उनका कहना है कि उनके बच्चे पढ़ाई के लिए ले जाए जा रहे थे, लेकिन संदेह के आधार पर रोक लेने से सभी परिवारों में भय और चिंता का माहौल है।
भले ही बच्चों के परिजन कह रहे हों कि उनके बच्चे पढ़ने के लिए जा रहे थे, लेकिन यह अर्धसत्य है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसी कौन-सी पढ़ाई है, जो अररिया में नहीं होती है! सीधा-सा उत्तर है अररिया में सैकड़ों मदरसे हैं, जहां तालिम दी जाती है। फिर ये लोग अपने बच्चों को हजारों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र और कर्नाटक क्यों भेज रहे थे! इसका उत्तर पाना उतना सरल नहीं है, जितनी सरलता से बच्चों के परिजन अपनी बात कह रहे हैं।
सच तो यह है कि यह घटना न केवल सीमांचल में फैले मानव तस्करी के जाल को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि किस तरह गरीबी और मजबूरी का फायदा उठाकर मासूम बच्चों का भविष्य दांव पर लगाया जा रहा है।
बता दें कि बिहार के सीमांचल क्षेत्र-किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार और अररिया-में मानव तस्करी एक गंभीर और संगठित समस्या के रूप में उभर चुकी है। गरीबी, बेरोजगारी और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे इस इलाके में तस्कर आसानी से अपने पैर पसार रहे हैं। यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, जहां एक ही परिवार में आठ से दस बच्चों का पालन-पोषण करना बड़ी चुनौती है। बाढ़ के कारण साल के चार से पांच महीने खेती-किसानी प्रभावित रहती है, जिससे आमदनी के साधन सीमित हो जाते हैं। ऐसे में घर के पुरुष सदस्य रोजगार की तलाश में बाहर पलायन कर जाते हैं और पीछे छूटे परिवार तस्करों के निशाने पर आ जाते हैं।
तस्कर माता-पिता को झूठे सपने दिखाकर उनके बच्चों को अपने जाल में फंसा लेते हैं। लड़कियों की शादी और लड़कों को रोजगार या शिक्षा दिलाने का झांसा देकर उन्हें बड़े शहरों और महानगरों में भेज दिया जाता है। इसके बाद इन बच्चों को बाल श्रम, भिक्षावृत्ति, घरेलू नौकर, ढाबों और चूड़ी कारखानों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। कई मामलों में लड़कियों को देह व्यापार में धकेल दिया जाता है, जबकि लड़कों को अपराध की दुनिया में झोंक दिया जाता है। पुलिस सूत्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, सीमांचल से गायब होने वाले बच्चों का बड़ा हिस्सा इसी अंधे जाल में फंस जाता है। -सुबोध कुमार साहा, किशनगंज से

















