खाड़ी युद्ध के चलते पूरी दुनिया की तेल और गैस सप्लाई बुरा असर है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। इसी क्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बात को स्वीकार किया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कोई रुकावट या दिक्कत भारत की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर सीधा असर डालती है। उन्होंने यह बात जर्मनी में एक संसदीय समिति को संबोधित करते हुए कही।
ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और इसमें खाड़ी देशों के बाहर से बड़ा हिस्सा आता है। यह तेल ज्यादातर होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। दुनिया भर में समुद्री रास्ते से जो कच्चा तेल और एलएनजी आता-जाता है, उसका करीब पांचवां हिस्सा भी इसी रास्ते से निकलता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर जैसे देश अपने तेल के निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर रहते हैं।
राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत जैसे विकासशील देश के लिए होर्मुज में कोई व्यवधान कोई दूर की घटना नहीं है। यह हमारी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर सीधा प्रभाव डालने वाली गंभीर वास्तविकता है।” उन्होंने यह भी बताया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए पश्चिम एशिया पर काफी हद तक निर्भर है।
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जर्मनी यात्रा के दौरान दिया बयान
यह बयान राजनाथ सिंह की जर्मनी की तीन दिवसीय यात्रा के पहले दिन दिया गया। वे वहां रक्षा और सुरक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति को संबोधित कर रहे थे। मंत्री ने कहा कि आज की दुनिया नए-नए सुरक्षा खतरों का सामना कर रही है। तकनीकी बदलावों ने सुरक्षा की स्थिति को काफी जटिल और आपस में जुड़ा हुआ बना दिया है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि बदलते माहौल के साथ खुद को ढालने की जरूरत है और नई सोच अपनानी होगी। यात्रा का मुख्य मकसद भारत और जर्मनी के बीच रक्षा औद्योगिक सहयोग का रोडमैप तैयार करना है। दोनों देश मिलकर सैन्य उपकरण बनाने का ढांचा बनाएंगे।
बर्लिन में राजनाथ सिंह अपने जर्मन समकक्ष बोरिस पिस्टोरियस और अन्य वरिष्ठ नेताओं से विस्तार से बात करेंगे। रक्षा मंत्रालय ने पहले ही बताया था कि चर्चा में रक्षा औद्योगिक सहयोग बढ़ाने, सैन्य संबंध मजबूत करने और साइबर सुरक्षा, ड्रोन जैसे नए क्षेत्रों में मौके तलाशने पर फोकस रहेगा।
भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग पर जोर
राजनाथ सिंह ने भारत और जर्मनी के रक्षा औद्योगिक तंत्रों के बीच और ज्यादा सहयोग की बात कही। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यह यात्रा उस समय हो रही है जब पश्चिम एशिया में 50 दिनों से ज्यादा समय से संघर्ष चल रहा है और इसके असर पूरे विश्व पर दिख रहे हैं।

















