लेखन को साधना मानने वाले बलबीर पुंज का निधन विचारधारा की एक बड़ी क्षति
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लेखन को साधना मानने वाले बलबीर पुंज का निधन विचारधारा की एक बड़ी क्षति

पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज नहीं रहे! मस्तिष्क इसे मान भी ले तो हृदय मानने को तैयार नहीं है। क्या लिखा जाय, कैसे लिखा जाय, कहाँ से शुरुआत किया जाय और कहाँ समाप्त, यह तय कर पाना आज बड़ा कठिन हो रहा है।

Written byप्रणय कुमारप्रणय कुमार — edited by Mahak Singh
Apr 21, 2026, 04:55 pm IST
in भारत
बलबीर पुंज जी नहीं रहे

बलबीर पुंज जी नहीं रहे

प्रख्यात चिंतक, लेखक, स्तंभकार और पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज नहीं रहे! मस्तिष्क इसे मान भी ले तो हृदय मानने को तैयार नहीं है। क्या लिखा जाय, कैसे लिखा जाय, कहाँ से शुरुआत किया जाय और कहाँ समाप्त, यह तय कर पाना आज बड़ा कठिन हो रहा है। कभी-कभी किसी विराट व्यक्तित्व के जाने से ऐसी रिक्तता पैदा होती है, जिसे भर पाना कदाचित संभव नहीं होता! बालवीर पुंज जी का जाना ऐसा ही है।

साहित्यकारों के प्रेरणास्रोत और सादगी के प्रतीक

वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो सदैव लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति को प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहते थे। राष्ट्रीय धारा के लेखकों-स्तंभकारों-पत्रकारों के किसी अच्छे लेख पर अपनी टिप्पणी देते थे, मार्गदर्शन देते थे और उसे पढ़ने के लिए अपने मित्रों-परिचितों के साथ साझा करते थे। प्रायः कॉल कर उस लेखक को बताते थे कि उसके लेख में क्या खूबियाँ और क्या कमियाँ हैं, यह भी कि लिखे गए विषय पर उसे अन्य किन-किन लेखकों को पढ़ना चाहिए। है न दुर्लभ बात! जो व्यक्ति स्वयं बहुत बड़ा लेखक हो, दो-दो बार राज्यसभा का सदस्य रहा हो, अटल-अडवाणी युग में भाजपा के बौद्धिक रणनीतिकारों में प्रमुख रहा हो, कई राज्यों का भाजपा का प्रभारी रह चुका हो, राष्ट्रीय स्तर के एक दल का उपाध्यक्ष रह चुका हो, उस व्यक्ति की ऐसी सादगी, सरलता, सहजता, सर्व सुलभता, निस्पृहता और निरहंकारिता प्रभावित ही नहीं करती थी, बल्कि अविश्वसनीय लगती थी। और यदि कोई लेखक-पत्रकार-स्तंभकार स्वास्थ्य संबंधी समस्या या अन्य किसी परेशानी से गुजर रहा हो तो वे कॉल कर उसका कुशल-क्षेम लेना कभी नहीं भूलते थे। संपर्क-सूत्र उपलब्ध नहीं होने पर अपने किसी परिचित से उनका मोबाइल नंबर लेकर वे उनका दुःख-दर्द साझा करते थे। किसी के प्रति ऐसी सदाशयता आज के दौर में संभवतः नाते-रिश्तेदार, मित्र-परिजन भी शायद ही रखते हों!

अंतिम समय तक सक्रिय चिंतनशील लेखन-साधक

आयु के आठवें दशक में भी लेखन, चिंतन व विमर्श के स्तर पर वे जितने सक्रिय थे, शायद ही कोई और रह पाता हो! दर्जनों व्हाट्सएप समूह पर न केवल अपने लिखे लेख, बल्कि देश, समाज व मनुष्यता से जुड़े तमाम विषयों पर वे खुलकर लिखते थे। न केवल अपना लेख साझा करते थे, बल्कि उन समूहों पर साझा होने वाले लेखों-टिप्पणियों को ध्यानपूर्वक पढ़ते थे, उन पर अपनी टिप्पणी व मार्गदर्शन देते थे। कभी-कभी कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण लेख साझा कर उसे पढ़ने के लिए शेष सभी को प्रेरित करते थे। अपने देहावसान के ठीक तीन-चार दिनों पूर्व, 16 अप्रैल को उन्होंने द पायनियर, पंजाब केसरी और स्वदेश ज्योति के लिए बड़ा ज्वलंत, सारगर्भित एवं संदेशप्रद लेख लिखा था। शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता हो, जब वे अपने समय व समाज के किसी-न-किसी गंभीर, महत्त्वपूर्ण, प्रासंगिक एवं सार्थक मुद्दों पर लिखते न रहे हों! उनका कहना था कि राम जी की कृपा से कुछ लिख पाने का सामर्थ्य मिला है, तो उस लेखनी का उपयोग देश, धर्म व संस्कृति के लिए करना चाहिए। इसी में वे जीवन की धन्यता एवं सार्थकता की अनुभूति करते थे। वे कहा करते थे कि लेखकों-पत्रकारों-स्तंभकारों-संपादकों को लेखन को ही अपना सबसे सशक्त उपकरण बनाना चाहिए। उन्हें कार्यक्रमों, आयोजनों या समारोहों की तुलना में लेखन को अधिक महत्त्वपूर्ण मानना चाहिए। लेखन एक प्रकार की साधना है, जिससे लेखक को स्वयंमेव सिद्धि व प्रसिद्धि मिलती है। इस क्रम में वे प्रायः सीताराम गोयल, राम स्वरूप एवं धर्मपाल जी से प्रेरणा लेने की पैरवी करते थे। उनका मानना था कि सच्चा लेखक सधी हुई लेखनी के बल पर ही समय के शिलालेख पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है। उसे किसी अन्य उपक्रम-आयोजन की आवश्यकता नहीं होती।

भारतीय विमर्श के गहन मनीषी और तर्कनिष्ठ विचारक

किसी भी मुद्दे पर उनकी समझ बहुत गहरी थी। वह भारत और भारतीयता के सच्चे उद्गाता थे।  भारतीय विमर्श (नैरेटिव्स) की जितनी गहरी समझ उनमें थी, वह अन्यत्र दुर्लभ दिखाई देती है। इस संदर्भ में प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित उनकी पुस्तक “नैरेटिव्स का मायाजाल” पठनीय ही नहीं, वरन संदर्भ के लिए बारंबार देखे और उद्धृत किए जाने योग्य है। समकालीन लेखकों, स्तंभकारों, विचारकों, मनीषियों में वे एक ऐसे नाम थे, जिनकी समझ केवल घटनाओं के घात-प्रतिघात, क्रिया-प्रतिक्रिया, तात्कालिकता एवं सामयिकता आदि पर ही केंद्रित नहीं थी। वे सभ्यताओं के संघर्ष के मूल तक जाते थे और मूल तक जाकर समस्या को पहचानने व उसका समाधान सुझाने का प्रयास करते थे। उन्होंने हिंदुत्व व सनातन सांस्कृतिक धारा का तो आत्मसातीकरण किया ही था, उसके अतीत व इतिहास में भी बहुत गहरे उतरे थे, साथ ही उन्होंने अब्राहमिक सभ्यताओं का भी बड़ा सूक्ष्म एवं विशद अध्ययन किया था। इसलिए अपने छोटे-से लेख में भी वे विश्व स्तर पर चल रहे सभ्यतागत संघर्ष का अत्यंत यथार्थ निरूपण कर पाते थे। उनके लेखों में लिजलिजी-पिलपिली भावुकता के लिए रंचमात्र भी स्थान नहीं होता था। वे तर्कों को स्पष्टता और तथ्यों को बड़ी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते थे। ये इतने अकाट्य होते थे कि उनके विरोधी भी उनकी बातों के खंडन का सहसा साहस नहीं जुटा पाते थे।

सभ्यतागत दृष्टि और हिंदू समाज की एकता पर उनका चिंतन

वे इस्लाम की कुफ़्र-काफ़िर पर आधारित सभ्यतागत वास्तविकता या मज़हबी कट्टरता के यथार्थ चितेरे थे। उन्होंने इस्लाम व ईसाइयत की वास्तविकता को उसके मूल स्वरूप में पहचाना था। इसलिए वे उनकी सीमाओं, संकीर्णताओं एवं नियम-निषेध आदि को अक्षरशः उकेर पाए थे। वहीं वे हिंदुत्व की उदारता, बहुलता, समन्वय एवं सह-अस्तित्व की शक्ति व संस्कृति को भी बखूबी पहचानते थे। विश्व के कल्याण के लिए उसके अस्तित्व व विस्तार को आवश्यक एवं अनिवार्य मानते थे। पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं था कि हिंदुत्व की उदारता के गुणगान में वे इतने मुग्ध थे कि सनातन संस्कृति के समक्ष उपस्थित वर्तमान एवं संभावित संकटों से वे  अनजान थे। उन्होंने अपने हर लेख में उन संकटों के प्रति पाठकों को सचेत एवं सजग किया। वे जानते थे कि खंड-खंड में बंटा हिंदू समाज वामी-जिहादी-यूरोपंथी गठजोड़ से अकेले नहीं लड़ पाएगा। इसलिए उन्होंने अपना पूरा जीवन संगठित हिंदू समाज के सत्य व महत्त्व को समझने-समझाने में लगा दिया।

संगठननिष्ठ दृष्टि और विचारधारात्मक संतुलन का संदेश

अकेले में चर्चा करने पर वे सांगठनिक स्तर पर सुधार के बिंदुओं का उल्लेख अवश्य करते थे, परंतु सार्वजनिक रूप से उन्होंने हमेशा संगठन की मान-मर्यादा को सर्वोपरि रखा। वे हमेशा इस बात के प्रति सजग रहे कि किसी बड़े ध्येय को साधने के लिए ध्येयनिष्ठ बनना पड़ता है, व्यक्तिगत आकांक्षाओं का परित्याग करना पड़ता है और धर्म, राष्ट्र व संस्कृति को सर्वोपरि रखना पड़ता है। सार्वजनिक जीवन में अनुशासन के पालन व संगठननिष्ठ आचरण की महत्ता को वे भली-भाँति समझते थे। वे संघ के निकट थे। संघ विचारों में उनका दृढ़ विश्वास था। वे मानते थे कि हर स्वयंसेवक साधक के समान होता है। उनका मानना था कि स्वयंसेवकों की साधना से उत्पन्न सिद्धि के बल पर ही आज भारतवर्ष में सनातन संस्कृति के प्रति अनुकूल वातावरण निर्मित हुआ है और  धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति आम नागरिकों में गौरव-बोध का संचार हुआ है। पर वे इस बात से दुःखी थे कि अनुकूल वातावरण, सत्ता-परिवर्तन के बावजूद सार्वजनिक जीवन में, विशेष रूप से बौद्धिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में वामपंथ का प्रभाव बना हुआ है। वे कहते थे कि राजनीतिक क्षेत्र से लेकर हिंदी मीडिया जगत में 2014 के बाद व्यापक परिवर्तन हुआ है, पर सत्ता-प्रतिष्ठानों एवं अंग्रेजी मीडिया में अभी भी वामपंथी वर्चस्व कायम है। उनका मानना था कि इक्कीसवीं शताब्दी की मुख्य मोर्चाबंदी नैरेटिव्स के धरातल पर ही होनी तय है, जो नैरेटिव्स की लड़ाई जीतेगा, अंततः उसी की जीत होगी। इसलिए उनकी अपेक्षा थी कि स्वयंसेवकों को पढ़ने-लिखने में और रुचि बढ़ानी चाहिए। पढ़ने-लिखने के लिए समय निकालना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले कार्यकर्त्ताओं-अधिकारियों या सामाजिक कार्यों से जुड़े व्यक्तित्वों को कभी अपने ऊपर अहंकार हावी नहीं होने देना चाहिए। इससे अनगिनत लोगों की साधना से प्राप्त सिद्धि का क्षय होता है। वे व्यक्तिगत बातचीत में कभी-कभी कहा करते थे कि जिन्होंने सब सुख-सुविधाओं को त्याग दिया, उन्हें अहंकार का परित्याग तो निश्चित करना चाहिए।

जनसांख्यिकी चेतना और ऐतिहासिक यथार्थ पर उनकी गहन दृष्टि

जनसंख्या की तेजी से बदलती स्थिति (डेमोग्राफी) व असंतुलन से वे बहुत चिंतित थे। इस विषय पर वे विगत 1 वर्ष से एक पुस्तक लिख रहे थे। उसे लिखने के क्रम में वे 300 से अधिक पुस्तकों का अध्ययन संदर्भ-ग्रंथों के रूप में कर चुके थे। उल्लेखनीय है कि उनका चिंतन वायवीय अथवा निराधार नहीं होता था। वे यथार्थ के धरातल पर विचार करते थे। अखंड भारत के बंटने की पीड़ा उनकी सामान्य बातों व लेखों में भी झलकती थी। वे इस बात से क्षुब्ध व असंतुष्ट थे कि भारत के बंटने की जैसी पीड़ा आम जनमानस में, विशेष रूप से हिंदू-समाज में होनी चाहिए, वैसी प्रायः दिखाई नहीं देती। विभाजन के दंशों पर उन्होंने खूब लिखा, उसके कारणों की गहन पड़ताल की, तत्कालीन नेतृत्व की कमजोरियों को भी उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से उजागर किया। उनका कहना था कि इस देश के मूल समाज यानी हिंदू-समाज की सद्गुण-विकृति एक बड़ी समस्या है। उसका शत्रु-मित्र का बोध यथार्थ पर आधारित नहीं है। विगत 78 वर्षों से पिलाई जा रही सेकुलरिज्म की घुट्टी से वह और कमजोर हुआ है। जबकि हमारे पूर्वजों के शत्रु-मित्र का बोध यथार्थजन्य था। राष्ट्रीय धारा में भी अनेक ऐसे लेखक, चिंतक, प्रबुद्धजन हैं, जो हिंदुत्व की उदार एवं समावेशी संस्कृति का उद्घोष करते हुए यह कहते नहीं थकते कि हजारों वर्षों से यदि हिंदू समाज का अस्तित्व अक्षुण्ण है तो आज ऐसी क्या आपदा आ गई कि अनस्तित्व के संकट, मतांतरण व घटती जनसंख्या का शोर मचाया जा रहा है? या सभ्यताओं के संघर्ष का भय दिखाया जा रहा है? ऐसे सब लोगों को सावधान करते हुए बलबीर जी कहा करते थे कि हमारे देखते-देखते भारतमाता के तीन टुकड़े हो गए, उसका बहुत बड़ा भूभाग उससे विलग कर दिया गया, भूभाग के अनुपात में जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं किया गया, विभाजन के बाद भारत की वर्तमान सीमाओं के पार रह गए सनातनियों की संख्या नगण्य हो गई और भारत के अनेक जिले की डेमोग्राफी भयावह रूप से बदल गई, क्या ये उदाहरण पर्याप्त नहीं हैं कि हमने बहुत कुछ विगत एक-दो शताब्दियों में ही खो दिया है और अब भी नहीं जगे तो आगे और भी बहुत कुछ खो देंगें।

राष्ट्रनिष्ठ वैचारिक प्रहरी की अमर स्मृति

आज जब बलबीर पुंज जी हमारे बीच नहीं हैं, तब यह अनुभूति और भी तीव्र हो उठती है कि राष्ट्र ने एक सजग, निर्भीक, सत्यदर्शी एवं राष्ट्रनिष्ठ वैचारिक प्रहरी खो दिया है। उनका जीवन हमें यह स्मरण कराता रहेगा कि ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा और धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सच्ची सार्थकता प्रदान करते हैं। जिस दौर में हिंदुत्व, राष्ट्रीय विचारों और सनातन संस्कृति के अनुकूल लेखन करना तथाकथित बौद्धिक जगत में सहज स्वीकार्य नहीं था, बल्कि अनेक बार अनादृत भी था, उस दौर में उन्होंने धूमकेतु की तरह चमकने की क्षमता होते हुए भी ध्येयनिष्ठा का मार्ग चुना, राष्ट्र का पक्ष चुना और जीवन-पर्यंत उसी पर अडिग रहे। निःसंदेह, बलबीर जी की स्मृतियाँ और उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों को ध्येयनिष्ठा, साहस और राष्ट्रनिष्ठ चिंतन की प्रेरणा देता रहेगा।

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