जम्मू-कश्मीर पुलिस की हालिया कार्रवाई में लश्कर-ए-तैयबा के खतरनाक नेटवर्क का एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों को भी हैरान कर दिया है। 16 साल तक भारत में छिपकर रहने वाला एक पाकिस्तानी आतंकी कभी प्लंबर बना, तो कभी ढाबे पर रसोइया और अंत में वह शेयर ट्रेडिंग के जरिए लोगों का पैसा निवेश करवा रहा था। देशभर में अपने खतरनाक मंसूबों के साथ घूम रहे ऐसे दो आतंकियों को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पंजाब के मलेरकोटला से गिरफ्तार किया है।
पकड़े गए लश्कर-ए-तैयबा के इन दो पाकिस्तानी आतंकियों के नाम है अबू हुरैरा और खुबैब। इनसे को पूछताछ में जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं हैं। हुरैरा पिछले 16 वर्षों से भारत में सक्रिय था और सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए उसने अपनी पहचान को पूरी तरह बदल लिया था।
भेष बदलकर रहता था
आतंकी हुरैरा ने स्वीकार किया कि उसने पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ करने से पहले ही प्लंबिंग का काम सीखा था। कश्मीर और पंजाब में रहने के दौरान वह कभी लोगों के घरों में प्लंबर बनकर जाता, तो कभी होटलों में रसोइये और वेटर के रूप में काम करता था। जिस समय उसे गिरफ्तार किया गया, वह मलेरकोटला में एक शेयर ट्रेडर के रूप में सक्रिय था। वह न केवल खुद शेयर बाजार में पैसा लगा रहा था, बल्कि स्थानीय लोगों का पैसा भी निवेश करवा रहा था ताकि समाज में उसकी पहचान एक सम्मानित व्यवसायी की बन सके।
फर्जी पहचान और नेटवर्क का विस्तार
लश्कर का मकसद केवल कश्मीर तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि वह देश के अन्य हिस्सों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हुरैरा ने बताया कि अपने स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स की मदद से जाली पैन कार्ड और अन्य सरकारी पहचान पत्र बनवा लिए थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उसने बैंक में खाता खुलवाया और वित्तीय लेनदेन शुरू किया।
अमृतसर से पहुंचा मलेरकोटला
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का रहने वाला हुरैरा अमृतसर में भी रहा, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता देखकर वह मलेरकोटला शिफ्ट हो गया। वहां वह खुद को भारतीय पंजाब का नागरिक बताकर लोगों के बीच घुल-मिल गया। उसका एक साथी ‘उमर उर्फ खरगोश’ राजस्थान से फर्जी पासपोर्ट बनवाकर इंडोनेशिया के रास्ते सऊदी अरब भागने में सफल रहा। हुरैरा और खुबैब भी विदेश भागने की फिराक में थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें समय रहते दबोच लिया।
पहले भी पकड़े जा चुके हैं ऐसे आतंकवादी
लश्कर-ए-तैयबा की रणनीति हमेशा से छिपकर वार करने की रही है। इसके लिए वे केवल सीमा पार से घुसपैठ नहीं करते, बल्कि भारतीय समाज में इस तरह समा जाते हैं कि उन्हें पहचानना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
अतीत में भी लश्कर के आतंकियों को ऐसे पेशों में पाया गया है जहां उनकी मौजूदगी पर कोई शक न करे। 26/11 मुंबई हमले में शामिल डेविड कोलमैन हेडली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसने एक अमेरिकी नागरिक और इमिग्रेशन सलाहकार बनकर मुंबई में अपना दफ्तर खोला। उसने महीनों तक शहर की रेकी की, ताज होटल और नरीमन हाउस जैसे ठिकानों की तस्वीरें लीं, और किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई कि वह लश्कर के लिए काम कर रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती
आतंकियों का इस तरह आम नागरिकों के बीच घुल-मिल जाना सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी चुनौती है। जब आतंकी वेटर, प्लंबर या शेयर ब्रोकर बनकर रहते हैं, तो उन पर शक करना मुश्किल हो जाता है। पूछताछ में खुलासा हुआ कि हुरैरा के तीन स्थानीय कश्मीरी साथी भी पकड़े गए हैं, जो उसे रसद और पहचान छिपाने में मदद कर रहे थे। यही नहीं अब वो शेयर ट्रेडिंग और बैंकिंग के जरिए आतंकी संगठन अब अपनी फंडिंग को वैध दिखाने की फिराक में है, इसने निपटना भी बड़ी चुनौती है।

















