भारतीय सनातन परंपरा में चार तिथियां “अबूझ (नित्य) मुहुर्त” मानी गयी हैं। इन तिथियों में किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ये ज्योतिषीय और खगोलीय दृष्टि से स्वमेव श्रेष्ठ, शुद्ध, बुद्ध और सिद्ध मानी गई हैं। ये अक्षय तृतीया, ‘वसंत पंचमी, देव उठनी ग्यारस और भड़ली नवमीं हैं, परंतु इनमें अक्षय तृतीया विलक्षण तिथि है।
अक्षय तृतीया क्यों है खास
भविष्य पुराण, पद्म पुराण और अन्य ग्रंथों के आलोक में अक्षय तृतीया- मां लक्ष्मी और गणेश पूजन की विशेष तिथि, मां अन्नपूर्णा देवी के अवतरण की तिथि, भगवान विष्णु के “हयग्रीव” के रूप में अवतरण की तिथि, भगवान विष्णु का नर-नारायण के रूप में अवतरण की तिथि, भगवान विष्णु का परशुराम के रूप में अवतरण की तिथि, प्रथम तीर्थंकर स्वामी भगवान् ऋषभदेव के 400 दिनों के महाव्रत (13 माह 10 दिन के महाव्रत) के उपरांत श्रेयांस के द्वारा पारायण के अनुग्रह इक्षु ग्रहण करने की तिथि, वेद व्यास और गणपति जी के द्वारा महाभारत के लेखन की शुभारंभ तिथि, भगीरथ सफल हुए, मां गंगा के अवतरण की तिथि, सतयुग और त्रेता युग के आरंभ एवं द्वापर के अवसान की तिथि के रुप में शिरोधार्य है। यह शोध आलेख भगवान् विष्णु के अवतार भगवान् परशुराम पर केंद्रित है। भगवान् परशुराम (भगवान् विष्णु के छठवें रुद्र रुप अवतार, भगवान् शिव के अनन्य शिष्य ) के संबंध में विविध तथ्यों पर प्रकाश डालना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक प्रासंगिक है।
वामपंथियों और कथित सेक्युलरों का षड्यंत्र
भारत में विभेद उत्पन्न कराने वाले पाश्चात्य विद्वानों, वामपंथी और तथाकथित सेक्यूलर इतिहासकारों तथा लेखकों ने षडयंत्रपूर्वक आर्य-द्रविड़ सिद्धांतों की कूट रचना कर उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार की और कर रहे हैं। अतः इनके शमन के लिए, एकत्व भाव से न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में महर्षि अगस्त्य और भगवान परशुराम के अविस्मरणीय बहुआयामी योगदान और इतिहास को रेखांकित कर लोकव्यापी करना होगा। इस संदर्भ में भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एक भारत, श्रेष्ठ भारत के आलोक में “काशी तमिल संगमम्’ कार्यक्रम मील का पत्थर साबित हुआ है।
परशुराम को क्षत्रिय विनाशक के रूप में दिखाना गलत
यह अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि सामाजिक समरसता, जल संरक्षण, भूमि सुधार आंदोलन के पुरोधा भगवान परशुराम को सदैव क्षत्रियों के विनाशक के रूप में दिखाया जाता है और उनके व्यापक कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर चर्चा ही नहीं होती है। प्रकारान्तर से तथाकथित सेक्युलर, वामपंथी, दलित राजनीति की रोटी सेंकने वाले नेता गण भारत के प्राचीन पराक्रमी महानायकों की संहारपूर्ण हिंसक घटनाओं के आख्यान खूब सुनाते हैं, लेकिन उनके बहुआयामी कार्यों को विलुप्त कर देते हैं। भगवान परशुराम के साथ भी यही हुआ है। उनके आक्रोश और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने की घटना को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित करके वैमनस्यता फैलाने का उपक्रम किया जाता रहा है।
क्षत्रियों के शत्रु नहीं थे भगवान परशुराम
पिता जमदग्नि की आज्ञा पर मां रेणुका का सिर धड़ से अलग करने की घटना को भी एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में एक प्रेरक आख्यान बनाकर सुनाया जाता है। प्रश्न उठता है कि क्या एक व्यक्ति केवल हिंसा के बल पर जन-नायक के रूप में स्थापित होकर भगवान के रूप में शिरोधार्य हो सकता है? क्या केवल हैहय वंश के प्रतापी माहिष्मति नरेश कार्तवीर्य अर्जुन के वंश का समूल नाश करने से पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाई ? रामायण और महाभारत काल में संपूर्ण पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं के राज्य थे। वे ही उनके अधिपति हैं। इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को आशीर्वाद देने वाले, भीष्म पितामह के गुरु, कौरव नरेश धृतराष्ट को पाण्डवों से संधि करने की सलाह देने वाले और तथाकथित सूत-पुत्र कर्ण को शिक्षा – दीक्षा देने वाले परशुराम ही थे। ये सब क्षत्रिय थे। इस दृष्टि से परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं, शुभचिंतक थे। परशुराम जी ने कभी क्षत्रियों का समूल संहार नहीं किया, उन्होंने केवल उन हैहय वंशीय क्षत्रियों का नाश किया, जो अन्यायी थे, जिनसे क्षत्रिय वंश की साख खत्म होती जा रही थी। भगवान परशुराम को जिस दिन श्री राम के रूप में योग्य क्षत्रिय कुलभूषण प्राप्त हो गए, उन्होंने स्वतः अस्त्र-शस्त्र राम के हाथ में सौंप दिए और महेंद्रगिरी पर्वत चले गए।
पुनः उस षड्यंत्र को मुखर कर दूं, जो भगवान् परशुराम को लेकर रचा गया है, तथा जो भविष्य में ब्राह्मण और क्षत्रियों तथा समूल हैहयवंशियों के मध्य वैमनस्यता और विवाद का कारण बन सकता है? तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों और वामपंथी इतिहासकारों ने अर्थ का अनर्थ लगाकर जनश्रुति में भी प्रचारित कर दिया है कि भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया है परंतु वास्तविकता तो कुछ और ही है? जिसे इस आलेख में स्पष्ट किया गया है! सोशल मीडिया और उत्सवों में तथा आक्रोश में ऐसे कथन से भगवान परशुराम केवल एक वर्ग विशेष के लिए पूजनीय हो जाते हैं जबकि दूसरे वर्ग के लिए चुनौती बन जाते हैं और आस्थायें दरकने लगती हैं, जबकि भगवान परशुराम सर्वव्यापी हैं और सबके हैं!भगवान परशुराम ही थे जिन्होंने कर्म के सिद्धांत को वर्ण का आधार बनाया।
सूर्यवंशी क्षत्रियों ने भगवान परशुराम का सदैव साथ दिया
सच तो यह है कि सुदर्शन चक्र के अवतार, हैहय वंशी (चंद्रवंशी) क्षत्रिय राजा सहस्त्रार्जुन (कार्त्तवीर्य अर्जुन) से बखेड़ा खड़ा हुआ और उसके बाद इन्हीं से संबंधित अहंकारी और अत्याचारी क्षत्रियों राजाओं से पृथ्वी को 21 बार रहित किया और धर्म की स्थापना की। इसमें सूर्यवंशी क्षत्रियों ने भगवान परशुराम का सदैव साथ दिया। यह विचारणीय है कि यदि सभी क्षत्रियों का समूल विनाश किया होता तो अयोध्या के रघुकुल से भी उनका संघर्ष हुआ होता, परंतु ऐसा कभी नहीं हुआ अन्य और भी उदाहरण हैं, जिसके संदर्भ में पृथक से लिखा जाना अपेक्षित है।
पुराणों, धर्मेतर ग्रंथों पुरातत्वीय स्रोतों और ऐतिहासिक संदर्भों के आलोक में त्रेतायुग में भगवान् विष्णु के 2 महत्वपूर्ण अवतार हुए प्रथम भगवान् परशुराम – जिन्होंने हैहयवंशी सहस्त्रार्जुन (रावण जिससे भयाक्रांत रहता था) वध किया। हैहयवंशियों में यह तथ्य भी पूर्णरुपेण स्वीकार नहीं है, सच तो ये है कि युद्ध में सहस्त्रार्जुन मरणासन्न हो गए थे, इसलिए वे महेश्वर में शिव में समाहित हो गए। जिसकी पुष्टि महेश्वर में स्थित भगवान सहस्त्रार्जुन के प्राचीन मंदिर से होती है। भगवान विष्णु का द्वितीय अवतार भगवान श्रीराम के रुप में हुआ,जिन्होंने रावण का वध किया और धर्म की स्थापना की।
जाबालिपुरम और भृगुक्षेत्र
आरम्भ यदि पारिवारिक पृष्ठभूमि और जाबालिपुरम से नहीं किया तो भगवान परशुराम के अवतरण की कथा और इतिहास अधूरा रह जायेगा। इसलिए महर्षि भृगु (परशुराम के परदादा) से प्रारंभ करना ही उचित होगा। माँ नर्मदा के किनारे जाबालिपुरम का क्षेत्र जाबालि ऋषि और भेड़ाघाट से भड़ौंच तक का क्षेत्र महर्षि भृगु के नाम से भृगुक्षेत्र कहलाता था। भेड़ाघाट में महर्षि भृगु की तपोस्थली एवं आश्रम था। उस पर माहिष्मती के महान हैहयवंशी (चंद्रवंशी) राजाओं का राज्य फैला था जिसके राजगुरु – महर्षि भृगु थे, महर्षि भृगु के यहाँ महर्षि ऋचीक (ऋचिका) का अवतरण हुआ था, इनकी पत्नी सत्यवती से महर्षि जमदग्नि का अवतरण हुआ था। महर्षि ऋचीक भी हैहयवंशियों के राजगुरु थे। उन दिनों हैहयवंश में सुदर्शन चक्र के अवतार सहस्त्रार्जुन का भी जन्म हो चुका था।
सहस्त्रार्जुन माहिष्मती के राजा बने और महर्षि जमदग्नि उसके राजगुरु बने। महर्षि जमदग्नि का विवाह कन्नौज नरेश गाधि (प्रसेनजित) की सुपुत्री – रेणुका से हुआ। उधर सहस्त्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) असीम शक्ति अर्जित कर साम्राज्य को विशाल बना दिया, वह किसी से पराजित नहीं हुए इसलिए भी मदांध हो गए थे। अतः महर्षि जमदग्नि से नहीं बनी, महर्षि जमदग्नि ने राजगुरु का पद त्याग दिया और अपने आश्रम आ गये।
माता रेणुका ने अपने 5वें पुत्र के लिए महादेव की उपासना की और भगवान परशुराम का अवतरण हुआ। सहस्त्रार्जुन भगवान परशुराम का मौसा थे। भगवान परशुराम की प्रारंभिक शिक्षा महर्षि ऋचीक और मामा विश्वामित्र के सानिध्य में हुई। भृगु वंशी होने के नाते भगवान परशुराम का जबलपुर से गहरा नाता रहा है।
भगवान परशुराम की विशाल प्रतिमा
जबलपुर के रांझी क्षेत्र से लगे खमरिया के निकट मटामर में भगवान परशुराम की 31 फीट की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित है। जिसका नाम गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल है। परशुराम कुंड के समीप प्राचीन परशुराम मंदिर है, जिस स्थान पर प्रतिमा है उसके पास ही परशुराम पर्वत शिखर है अनादिकाल से स्थापित भगवान परशुराम के चरण चिन्ह और अन्य साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि परशुराम जी यहां वर्षों तक तपस्यारत थे। परशुराम कुंड में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही मां नर्मदा का प्राकट्य हुआ था। जनश्रुति के अनुसार भगवान परशुराम प्रतिदिन स्नान करने नर्मदा जाते थे। एक दिन मां नर्मदा प्रकट होकर बोलीं कि स्नान करने आने से आपका समय व्यर्थ होता है। अत: आप कल सुबह तपस्थली में जहां पहला कदम रखेंगे वहीं मैं प्रकट हो जाऊंगी। दूसरे दिन भगवान परशुराम ने जहां पहला कदम रखा वहीं मां नर्मदा जलराशि के रूप में प्रकट हो गईं।
विद्वान श्री के. एम. मुंशी ने अपनी कृति ‘भगवान् परशुराम’ में नर्मदा के किनारे भृगु वंश के इतिहास पर समुचित प्रकाश डाला है।
जहां एक ओर जबलपुर में खमरिया के पास मटामर में भगवान् परशुराम की तपस्या के प्रमाण मिले हैं तो वहीं दूसरी ओर परशुराम की किशोरावस्था में अघोर तंत्र की शिक्षा प्राप्त करने के प्रमाण भी मिलते हैं। मां नर्मदा के लम्हेटा के उस पार लम्हेटी गांव के पास डडवारा नामक ग्राम में अघोर तंत्र की शिक्षा का केंद्र था, अघोर तंत्र के आचार्य डड्डनाथ वहां कुलाधिपति थे , अघोर तंत्र की शिक्षा भगवान परशुराम ने उन्हीं से प्राप्त की थी।
भगवान शिव से सीखी “कलारिपायट्टू” युद्धकला
ऋचीक ने “सारंग” नामक धनुष प्रदान किया। ब्रम्हर्षि कश्यप ने वैष्णव मंत्र दिये। तदुपरांत परशुराम ने कैलाश गिरिश्रंग जाकर महादेव से शिक्षा प्राप्त की। महादेव ने परशुराम को “विद्युदभि” परशु एवं “विजया” धनुष कमान दिया और साथ ही महान् युद्धकला “कलारिपायट्टू” भी सिखाया।
एक दिन माता रेणुका चित्ररथ गंधर्व पर मानसिक रुप से विचलित हो गयीं, जिसे जमदग्नि ने जान लिया और अपने पुत्रों को रेणुका को मारने आदेश दिया जिसे परशुराम पूर्ण किया परंतु अपने पिता जमदग्नि के वरदान से सभी को पुनर्जीवित भी किया।
परशुराम और सहस्त्रार्जुन के बीच महासंग्राम
इस प्रकरण की आड़ में सहस्त्रार्जुन अपनी सेना समेत महर्षि जमदग्नि से मिलने आए और कामधेनु गाय कपिला के चमत्कार देखकर मोहित हो गए। एक दिन मौका देखकर महर्षि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़कर कपिला को ले गए। फलस्वरूप सहस्त्रार्जुन और परशुराम का महायुद्ध हुआ, जिसमें परशुराम ने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया, जिसका बदला सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने महर्षि जमदग्नि की हत्या करके लिया। माता रेणुका भी सती हो गयीं।
यहीं से आरंभ हुआ महासंग्राम जिसमें हैहयवंशी (चंद्रवंशी) राजा जो सहस्त्रार्जुन के समर्थन में उतरे उनका 21 बार पृथ्वी से विनाश किया गया। परशुराम ने सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से अपने पिता का तर्पण किया, परंतु इस महासंग्राम (लगभग 16300 वर्ष पूर्व एक गणना के अनुसार) में सूर्यवंशी क्षत्रियों और शेष चंद्रवंशी राजाओं ने परशुराम का समर्थन किया।
कौन किसके साथ था
परशुराम के साथ अवन्ति नरेश, आर्यावर्त के सम्राट सुदास, विदर्भ नरेश, पंचनद नरेश, गांधार नरेश मांधाता, मेरु नरेश, आर्योण (ईरान), अविस्थान (अफगानिस्तान), श्री(सीरिया), सप्तसिंधु नरेश, कन्नौज के गाधिचंद्रवंशी प्रमुख थे। जबकि विरोध में माहिष्मती, चेदि नरेश, कौशिक, रेवत, तुर्वस, अनूप, रोचमान, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के अन्य हैहयवंशी राजा थे। इसलिए ये कहना कि 21 बार पृथ्वी समूल क्षत्रिय विहीन हुई सर्वथा असत्य है। अत:भगवान् परशुराम पर आरोप लगाना अनुचित है, उन्होंने कभी शासन नहीं किया वरन् दान किया। महर्षि ऋचीक के कहने पर युद्ध और संहार बंद किया। श्रीराम के अवतरण के उपरांत उनका तेजोहरण हुआ। हनुमान जी से घोर युद्ध के उपरांत परशुराम ने पश्चाताप स्वरुप उनके द्वारा मारे गये क्षत्रिय राजाओं के लिए तर्पण किया और द्वापर में उनके कृतित्व को सभी जानते हैं, बताने की आवश्यकता नहीं है। कलयुग में भी कल्कि के रुप में उन्हीं का प्रतिरुप होगा।
कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था
भगवान् परशुराम के उन विलक्षण कार्यों पर भी प्रकाश डाला जाना चाहिए जो श्लाघनीय हैं। भगवान् परशुराम ने कर्म के सिद्धांत पर वर्ण व्यवस्था को साकार किया उन्होंने शूद्रों को पढ़ाया और बड़ी संख्या में उन्हें ब्राम्हण बनाया, दक्षिण भारत में सर्वाधिक संख्या थी। इसलिए दक्षिण में भी वे पूजनीय हैं,सामूहिक विवाह भी कराये। इसलिए भगवान् परशुराम सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं।
जनकल्याण के लिए सिद्ध हुआ परशु
भगवान परशुराम का शस्त्र परशु केवल युद्ध के लिए ही नहीं वरन् जन कल्याण के लिए भी युगांतकारी सिद्ध हुआ। युद्ध के उपरांत भगवान परशुराम ने समाज सुधार व कृषि के कार्य हाथ में लिए। केरल, कोंकण मालाबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी, जिसमें कश्यप ऋषि और इन्द्र ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। भगवान परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया।परशुराम का कार्य क्षेत्र गोमांतक (गोवा) भी रहा है।
शूद्र माने जाने वाले लोगों को उन्होंने परशु के माध्यम से वन काटने में लगाया और उपजाऊ भूमि तैयार करके धान की पैदावार शुरु कराई। इन्हीं शूद्रों को परशुराम ने शिक्षित व दीक्षित करके ब्राह्मण बनाया, इन्हें जनेऊ धारण कराए। वहीं दूसरी ओर उस समय जो दुराचारी व आचरणहीन ब्राम्हण थे, उन्हें शूद्र घोषित किया। परशुराम के अंत्योदय के कार्य अनूठे व अनुकरणीय हैं। इन्हें रेखांकित किए जाने की जरूरत है।
भूमि सुधार और जल संरक्षण के प्रणेता
भगवान् परशुराम दक्षिण भारत के भूमि सुधार आंदोलन के पुरोधा एवं जल संरक्षण के प्रणेता थे। भारत में जल शोधन तकनीक के साथ जल संरक्षण हेतु बाँध के निर्माण की तकनीक सिखाने का श्रेय भगवान् परशुराम को ही है।
भगवान परशुराम ने ही सामूहिक विवाह परम्परा का शुभारम्भ कराया था। अक्षय तृतीया के दिन ही उन्होंने एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा। परशुराम द्वारा अक्षय तृतीया के दिन सामूहिक विवाह किए जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूर्त के शुभ मुहूर्त माना जाता है। दक्षिण का यही वह क्षेत्र हैं, जहां परशुराम के सबसे ज्यादा मंदिर मिलते हैं और उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रुप में पूजते हैं।
केरल को परशुराम क्षेत्रम भी कहते हैं
केरल को परशुराम क्षेत्रम भी कहा गया है। यहाँ थिरुवल्लम श्री परशुराम स्वामी मंदिर दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है । यह तिरुवनंतपुरम के थिरुवल्लम के पास करमना नदी के तट पर स्थित है । यह केरल का एकमात्र मंदिर है जो भगवान परशुराम को समर्पित है। इसी मंदिर में भगवान शिव की भी समान महत्व के साथ पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार केरल में परशुराम ने 108 शिव मंदिरों की स्थापना कराई थी।मान्यता यह भी है कि परशुराम ने अपनी कुल्हाड़ी(फरसा)समुद्र में फेंककर केरल की भूमि का निर्माण किया था, इसलिए पूरे केरल को “परशुराम क्षेत्रम ” कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, परशुराम ने इस नई भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए नाग राजा वासुकी का आह्वान किया था।
तमिलनाडु में चेन्नई के पास चेंगलपट्टू जिले के मुल्लीपक्कम (मुलिपाक्कम) में स्थित श्री परशुराम मंदिर प्रमुख है। यह एक प्राचीन मंदिर है,जहाँ परशुराम जी की पूजा की जाती है। इसके अतिरिक्त, चेन्नई के अयनवरम में भी एक परशुरामलिंगेश्वर मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव और परशुराम से संबंधित है। मान्यता है कि इस प्राचीन मंदिर में परशुराम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की गयी थी।
नारी उत्थान की नींव रखी
भगवान परशुराम के स्त्रियोद्धार के लिए किए गए कार्य सदैव अविस्मरणीय रहेंगे। भगवान परशुराम ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अत्याचार और अनाचार को समाप्त कर, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘नारी उत्थान’और उनके सशक्तिकरण की नींव रखी थी। उन्होंने महिलाओं का अपमान करने वाले अहंकारी शासकों का अंत किया और उन्हें निर्भय वातावरण प्रदान किया। भगवान परशुराम ने महर्षि अत्रि की धर्म पत्नी “अनुसूइया” और अगस्त्य ऋषि की पत्नी “लोपामुद्रा के साथ मिलकर, नारी जागृति और उत्थान के लिए श्लाघनीय कार्य किये।
न्याय प्रिय योद्धा परशुराम
भगवान परशुराम महान न्याय प्रिय योद्धा थे, वो सदैव न्याय के लिए युद्ध करते रहे, कभी भी अन्याय को बर्दाश्त नहीं किया। न्याय के प्रति उनका समर्पण इतना अधिक था,कि उन्होंने हमेशा अन्यायी को स्वयं ही दण्डित भी किया और स्वयं भी प्रायश्चित किया। कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें कल्प के अंत तक भूलोक पर रहने का वर दिया। पौराणिक सन्दर्भों में जिन सात महान विभूतियों को अजर अमर माना गया है, उनमें परशुराम एक हैं। यह सर्वश्रुत है,कि श्रीराम की विनयशीलता, शौर्य, पराक्रम और धर्मनिष्ठा को देख कर वे महेन्द्रगिरी पर्वत चले गए थे। उन्होंने बुद्धिजीवियों और धर्मपुरुषों की रक्षा के लिए उठाया परशु त्याग दिया।
महेंद्रगिरी पर्वत पर निवास
परशुराम चिरंजीवी हैं, इसलिए माना जाता है कि आज भी सशरीर वे रात्रि में महेंद्रगिरी पर्वत पर और दिन में हिमालय के किन्हीं अगम्य क्षेत्रों में निवास करते हैं। श्रीराम से साक्षात्कार होने और उन्हें अवतार के रूप में पहचानने के बाद वे महेंद्रगिरी पर्वत ( उड़ीसा के गजपति जिले में स्थित) चले गए। इस पर्वत पर भगवान परशुराम की उपस्थिति आज भी महसूस की जाती है। ऋषि धर्म के विपरीत शस्त्र उठाने का प्रायश्चित करने के लिए कहते हैं कि भगवान परशुराम ने हिमालय को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। सूर्योदय के साथ ही भगवान परशुराम महेंद्रगिरी पर्वत छोड़कर, हिमालय पर्वत चले जाते हैं और उसे पल्लवित और पुष्पित करते चले आते हैं। सूर्यास्त के साथ पुनः महेंद्र गिरी पर्वत पर वापस आ जाते हैं।
एतदर्थ भगवान् परशुराम भारत में सामाजिक समरसता,अंत्योदय,स्त्रियोद्धार,भूमि सुधार आंदोलन और जल प्रबंधन सहित अन्य नवाचारों के प्रणेता के रुप सदैव पूजनीय और स्मरणीय रहेंगे। भगवान परशुराम भारतीय ज्ञान परम्परा के ऐंसे शक्ति पुंज हैं,जिन्होंने शास्त्र के साथ शस्त्र के ज्ञान को अपरिहार्य बताया तथा उसकी उपादेयता पर बल दिया,जो आज हिन्दुओं के लिए सर्वाधिक मार्गदर्शी और अनुकरणीय हैं।

















