वे कहती हैं कि धरती के इस छोर से लेकर उस छोर तक बहनापे को लेकर वे साथ हैं। उन्हें सुदूर ईरान की उन लड़कियों का हिजाब का आदर्श दिखाई देता है। जो हिजाब और नकाब में अमेरिका का विरोध कर रही हैं, वे उनकी नायिकाएं हैं। हिजाब पहने महिलाएं उनकी आदर्श हैं। तो फिर यह बहनापा इतना सिलेक्टिव क्यों है? उन्हें यह दिखाई नहीं देता कि हिन्दू लड़कियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है? आज तक कोई भी कविता ईरान की उन बहादुर महिलाओं के लिए नहीं लिखी, जिन्होंने मजहबी कट्टरता के सामने झुकने से इंकार कर दिया।
जिन्होंने सच में इसे कहा कि “बोल कि लब आजाद हैं तेरे” और वे फांसी पर झूल भी रही हैं, मगर अपनी आजादी से समझौता नहीं कर रहीं। ऐसी ही असंख्य लड़कियां यूरोप में हैं जो पाकिस्तान मूल के ग्रूमिंग जिहाद से जूझ रही हैं, वे लड़ रही हैं अपनी आजादी के लिए, अपने अस्तित्व के लिए हरसंभव कदम उठा रही हैं, परंतु भारत में सिलेक्टिव बहनापे वाला गैंग कितना उन लड़कियों के पक्ष में आया, यह भी एक प्रश्न है! कितनी कविताएं लिखी होंगी उस गैंग ने, यह भी एक प्रश्न है! शायद उन्हें यह पता ही नहीं होगा कि ऐसा कुछ होता भी है या हुआ भी है।
ऐसी ही भारत में भी असंख्य महिलाएं है, जो मजहबी कट्टरता के सामने झुकने से इनकार कर देती हैं। वे अपनी आजादी बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करती है और कानून से लेकर मीडिया तक अपनी बात कहती हैं। मगर क्या कभी कोई भी फेमिनिस्ट जो ईरान की बुर्के पहनने वाली और खामनेई की मौत पर शोक मनाती हुई महिलाओं को साहस की प्रतिमूर्तियां बताती हैं, भारत की इन लड़कियों और युवतियों के साथ खड़ी होती हैं?
टीसीएस नासिक के मामले में हैरतअंगेज चुप्पी
टीसीएस नासिक में जो हुआ है, उसने पूरे भारत को ही नहीं बल्कि विश्व को हिलाकर रख दिया है। इस घटना ने बताया कि कैसे टेक्निकल क्षेत्र में भी जाकर मजहब की पहचान के आधार पर लड़कियों को निशाना बनाया जा सकता है। कैसे कथित पढ़ाई के बाद भी कट्टरता का कीड़ा दिमाग से हटता नहीं है और काफिरों को मजहब में लाना ही एकमात्र उद्देश्य उनका रहता है।
इस मामले ने उन तहों को खोलकर रख दिया है, जिसके तले यह भ्रम छिपा हुआ था कि पढ़ाई से कट्टरता कम होती है। ऐसा माना जाता था कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपनी मजहबी कट्टरता को छोड़ सकता है। और हमारी फेमिनिस्ट महिलाएं भी ऐसा ही मानती थीं। परंतु आज तक किसी भी फेमिनिस्ट औरत ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि यदि यह सब प्यार होता है तो हमेशा लड़की का ही मजहब क्यों बदला जाता है? और उसके बच्चों की पहचान एक मजहब की पहचान ही क्यों रह जाती है?
इससे इतर, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि टीसीएस नासिक में शफी शेख (34), आसिफ अंसारी (22), तौसिफ अत्तर (36), शाहरुख कुरैशी (34), रजा मेमन (35), दानिश शेख (34) और आश्विनी चैनानी और निदा खान द्वारा किये गए जघन्य कुकृत्य पर ये फेमिनिस्ट महिलाएं कुछ बोल क्यों नहीं रही हैं?
क्यों इनकी सोशल मीडिया की वॉल एकदम रिक्त है और यदि है भी तो किसी न किसी किताब की बात! क्या किताबों की बातें उन तमाम महिलाओं की पीड़ा से बढ़कर हैं, जिनका शोषण इन लोगों ने बरसों तक किया?
क्या यह कल्पना की जा सकती है कि एक लड़की जिसने अपने जीजान से जुटकर एक तकनीकी डिग्री हासिल की, और जिसने यह सुनिश्चित किया कि वह अपने सपनों को पूरा करे, अपने हिस्से के आसमान को अपने रंगों से भरे, उसे लड़की के सपने एक प्रतिष्ठित कंपनी में आकर टूट जाएं? धाराशायी हो जाएं? और वह भी किसलिए क्योंकि किसी को अपने मजहब की संख्या बढ़ानी है और काफिरों को ईमान में लाना है! क्या इस कारण लड़कियों के सपनों को कोई चकनाचूर कर दे और ईरान की बुर्कानशीं महिलाओं के पक्ष में कविता लिखने वाला फेमिनिस्ट समूह इन महिलाओं के सपनों के टूटे जाने की पीड़ा पर मौन रह जाए, यह कितना बड़ा विरोधाभास है? यही विरोधाभास या कहें कि सिलेक्टिव फेमिनिज़्म ही इन महिलाओं की पहचान है। इन्हें मजहबी पीड़ा दिखाई नहीं देती है।
अमरावती में हिन्दू लड़कियों के साथ हुए यौन उत्पीड़न पर भी मौन
ऐसा नहीं है कि नासिक में ही हिन्दू लड़कियों के साथ हुए यौन उत्पीड़न और कन्वर्जन को लेकर फेमिनिस्ट महिलाएं मौन हैं। अमरावती में अयान अहमद और उजेर खान द्वारा सैकड़ों लड़कियों के उत्पीड़न पर भी मौन हैं। जो मामला पहले कुछ वायरल वीडियो को लेकर था, तो वहीं अब यह मामला बहुत बड़ा होता जा रहा है। यह एक बड़ा नेटवर्क बनता जा रहा है।
क्या फेमिनिस्ट महिलाओं ने कभी भी सुनियोजित धर्मांतरण के लिए यौन अपराधों पर कुछ लिखा है? क्या उन मासूम लड़कियों के लिए इन फेमिनिस्ट महिलाओं का दिल नहीं पसीजता, जो अयान अहमद और उजेर खान, जैसे लड़कों की यौन हिंसा का शिकार होती हैं? ये दोनों ही मामलों पर फेमिनिस्ट वर्ग की चुप्पी क्या कहलाती है? तो अब इनके बहनापे का क्या हुआ?

















