पश्चिम बंगाल के चुनाव में सवाल केवल यह नहीं रहता कि सत्ता पुराने लोगों के हाथ में रहेगी या नए के हाथ में जाएगी। यह हमेशा एक बड़े राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक संघर्ष का मंच बन जाता है। इस बार भी तस्वीर ऐसी ही है, लेकिन परिस्थितियां कहीं अधिक जटिल। एक ओर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस है, जिसने पिछले एक दशक में अपनी जड़ों को गहराई तक फैलाया है; दूसरी ओर भाजपा है, जिसने 2019 के बाद से राज्य में खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया और इस बार सत्ता में आने का खम ठोक रही है; और तीसरी ओर कांग्रेस-वाम गठबंधन है, जो अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है।
लेकिन इस चुनाव को समझने के लिए केवल दलों की स्थिति देखना काफी नहीं। विश्लेषकों की समझ और आम लोगों के अनुभवों से जो संकेत उभर रहे हैं, वे पश्चिम बंगाल में बड़े बदलाव का आभास दे रहे हैं और इसके पीछे कई कारक हैं। यदि इन कारकों की प्रभावशीलता मतदान तक बनी रही, तो चुनाव नतीजे ऐतिहासिक हो सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक एक ऐसे “साफ-सुथरे गणित” पर टिकी रही, जिसे समझना जितना आसान था, तोड़ना उतना ही मुश्किल। यह गणित कहता था- अगर किसी दल को मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा एकमुश्त मिल जाए और उसमें सीमित मात्रा में हिन्दू वोटों का समर्थन जुड़ जाए, तो सत्ता की राह लगभग सुनिश्चित हो जाती है। 2011 में वाम शासन को हटाकर सत्ता में आई ममता बनर्जी ने इस फार्मूले को न केवल समझा, बल्कि उसे बेहद कुशलता से लागू भी किया और इसी कारण वह चुनाव के बाद चुनाव जीतती चली गईं।
लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले के राजनीतिक संकेत बता रहे हैं कि यह गणित अब पहले जैसा “स्थिर” नहीं रह गया है। दरअसल, पिछले एक दशक के चुनावी आंकड़ों, उपचुनावों और हालिया लोकसभा परिणामों को जोड़कर देखें तो एक नई तस्वीर उभरती है जहां वोटों का ध्रुवीकरण अब एकतरफा नहीं रहा, बल्कि बहुस्तरीय और प्रतिस्पर्धी हो गया है।
यह बदलाव तीन स्तरों पर दिखाई देता है-मुस्लिम वोटों में दरार, कांग्रेस की वापसी की कोशिश, और हिन्दू वोटों का प्रति-ध्रुवीकरण। ये तीनों कारक इस बार ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति को जटिल बना रहे हैं।
वैसे तो चुनाव आयोग धर्म के आधार पर मतदाता सूची प्रकाशित नहीं करता, इसलिए मतदाताओं का धार्मिक प्रतिशत जनगणना आधारित अनुमान से लिया जाता है और 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी तब 27 प्रतिशत और हिन्दू आबादी 70.5 प्रतिशत थी। 2024-25 के अनुमानों के अनुसार राज्य की मुस्लिम आबादी 28-29 प्रतिशत और हिन्दू आबादी 69-70 प्रतिशत है। 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने 38.93 % वोट पाकर 184 सीटें, 2016 में 45% वोट पाकर 211 सीटें और 2021 में 48% वोट पाकर 213 सीटें जीतीं।
स्पष्ट है, सत्ता पाने का जो आसान समीकरण बनता है, उसमें मुस्लिम वोट सबसे महत्वपूर्ण कारक हो जाता है क्योंकि समुदाय में एकमुश्त वोट डालने की प्रवृत्ति रही है जबकि हिन्दू वोट खंडित रहे। यही कारण है कि प्रदेश सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं से लेकर ममता के व्यक्तिगत आचरण तक में मुस्लिम वोट बैंक प्राथमिकता पाता रहा। और तो और, ममता इस वोट बैंक को लेकर इतनी आश्वस्त हो चुकी थीं कि उन्होंने मान लिया था कि मुसलमानों के पास राजनीतिक तौर पर कोई और विकल्प नहीं। लेकिन हाल के वर्षों में जो संकेत मिल रहे हैं, वह बताते हैं कि मुस्लिमों के वोट डालने की प्रकृति में बदलाव आ रहा है।
मुस्लिम वोट बैंक में दरार
बंगाल की राजनीति में कांग्रेस लंबे समय से हाशिए पर रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 2.93% तक सिमट गया और वह एक भी सीट नहीं जीत सकी। लेकिन राजनीति में रिक्त स्थान कभी स्थायी नहीं रहते।
2023 में मुर्शिदाबाद जिले की सागरदिघी विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस के सुब्रता साहा के निधन के कारण उपचुनाव हुआ। यहां 64% मुस्लिम मतदाता हैं और 2011 से लगातार तीन बार तृणमूल यह सीट बड़े अंतर से जीत रही थी। मगर 2023 के उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी के बायरन बिस्वास ने सबको चौंकाते हुए इस सीट पर जीत दर्ज किया। यह ममता बनर्जी के लिए 2021 में नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी के हाथों मिली हार की तरह ही बड़ा झटका था। बेशक ममता ने बायरन बिस्वास को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया, लेकिन सागरदिघी सीट के उपचुनाव ने एक बड़ा संदेश दिया कि ममता यह मानकर नहीं चल सकतीं कि मुस्लिमों के पास कोई विकल्प नहीं और वे उनकी पार्टी को ही वोट देंगे।
सागरदिघी में मिली पराजय का एक अर्थ यह भी है कि ममता को मुस्लिम बहुल सीटों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना होगा जबकि लोकनीति-सीएसडीएम के 2021 के चुनाव बाद समीक्षा के अनुसार ममता ने चुनाव प्रचार रणनीति में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की तुलना में हिन्दू बहुल क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दिया। तृणमूल के चुनाव सेल के आंकड़ों के अनुसार भी ममता ने मुस्लिम बहुल दक्षिण 24 परगना में 15 रैलियां और जनसभाएं कीं जबकि हिन्दू बहुल हुगली और मेदनीपुर में 25 रैलियां और रोड-शो किए। यानी, ममता मानकर चलती थीं कि मुस्लिम वोट तो उन्हें मिलेंगे ही, इसलिए हिन्दू बहुल क्षेत्रों में प्रचार ज्यादा करती रहीं। लेकिन क्या अब भी वह ऐसा ही कर पाएंगी?
इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव के संकेत ममता बनर्जी के लिए चिंताजनक हैं। कारण, चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम बहुल 11 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे ज्यादा वोट पाए। मालदा दक्षिण कांग्रेस की जीत का मुख्य केंद्र रहा जहां उसने सुजापुर, मोथाबारी, बैष्णवनगर विधानसभा क्षेत्रों में तृणमूल से ज्यादा वोट पाए। हालांकि मालदा उत्तर से त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा के खगेन मुर्मू ने जीत हासिल की, लेकिन कांग्रेस के मुश्ताक आलम ने चांचल, हरिश्चंद्रपुर, मालतीपुर और रतवा में अच्छा-खासा मत हासिल किया।
इसके अलावा 14 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही। सीएसडीएस-लोकनीति के अनुसार प्रदेश में 100-110 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है। यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस की “एकला चलो” रणनीति को समझना जरूरी हो जाता है। 2026 के चुनाव में सभी 294 सीटों पर लड़ने का उसका फैसला केवल संगठनात्मक विस्तार नहीं है; यह एक रणनीतिक हस्तक्षेप है। राजनीतिक टिप्पणीकार सुधीर पनिक्कर इस स्थिति की व्याख्या इस तरह करते हैः
“बहुकोणीय मुकाबले में तीसरा दल सत्ता नहीं जीतता, लेकिन वह जरूर तय करता है कि कौन हारेगा और यही उसकी असली ताकत होती है।”
यहां दिल्ली का संदर्भ प्रासंगिक हो जाता है, जहां विपक्षी वोटों के बिखराव ने परिणामों को प्रभावित किया। बंगाल में भी अगर कांग्रेस मुस्लिम वोटों का 10-20% हिस्सा काट लेती है, तो यह सीधे-सीधे तृणमूल कांग्रेस को नुकसान और भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचा सकता है।
वैसे ही, 2024 में मुर्शिदाबाद सीट का मुकाबला भी दिलचस्प रहा जहां बेशक तृणमूल के अबू ताहिर खान को 6.18 लाख वोट मिले और कांग्रेस समर्थित माकपा उम्मीदवार मोहम्मद सलीम को 5.18 लाख, लेकिन रानीनगर जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में माकपा की बढ़त संकेत है कि विधानसभा चुनाव में मुर्शिदाबाद की सीटों को तृणमूल सुरक्षित नहीं मान सकती।
हाल के वर्षों में, विशेषकर 2023 के बाद कांग्रेस की रणनीति में बड़ा बदलाव दिखा है। पार्टी ने कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के आगे ‘जूनियर पार्टनर’ बनने या उनके लिए जमीन छोड़ने की नीति के बजाय अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए ‘अकेले लड़ने’ या गठबंधन में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाने पर जोर दिया है। इसका उदाहरण मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनाव रहे। वैसे ही, कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है।
प्रति-ध्रुवीकरण
किंग्स कॉलेज, लंदन में फ्रांसीसी मूल के प्रोफेसर हैं क्रिस्टोफ जाफलो। वह दक्षिण एशियाई राजनीति, विशेषकर भारत में राष्ट्रवाद और चुनावी व्यवहार पर दुनिया के सबसे बड़े विशेषज्ञों में गिने जाते हैं। जाफलो ने भारत, और भारत में भी विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के संदर्भ में ‘प्रति-ध्रुवीकरण’ की व्याख्या करते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मोदीज इंडियाः नेशनलिज्म एंड दि राइज ऑफ एथनिक डेमोक्रेसी’ में कहा हैः
“जब राजनीति में एक विशेष पहचान (जातीय या धार्मिक) का ध्रुवीकरण इतना तीव्र और स्थायी हो जाता है कि वह सत्ता की संरचना को नियंत्रित करने लगता है, तो वह अनिवार्य रूप से उन समूहों के बीच ‘प्रति-ध्रुवीकरण’ को जन्म देता है जो खुद को उस पहचान से बाहर या असुरक्षित महसूस करते हैं। यह प्रति-ध्रुवीकरण अक्सर मूल ध्रुवीकरण से भी अधिक आक्रामक और संगठित होता है।”
जाफलो के इस सिद्धांत को पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। बंगाल के सीमावर्ती जिलों (मालदा, मुर्शिदाबाद) में दशकों से अल्पसंख्यकों का वोट एक विशेष दल (पहले वाम-कांग्रेस, फिर तृणमूल कांग्रेस) के पक्ष में ध्रुवीकृत रहा है। जब यह ध्रुवीकरण ‘स्थायी’ दिखने लगा, तो इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू वोटों का प्रति-ध्रुवीकरण हुआ। परिणाम यह हुआ कि मालदा और उत्तरी दिनाजपुर जैसे जिलों में, जहां 50% से अधिक मुस्लिम आबादी है, वहां भी भाजपा ने क्रमशः 4 और 2 सीटें जीतीं क्योंकि जिले के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में एकमुश्त वोटिंग के पैटर्न को देखते हुए हिन्दू बहुल क्षेत्रों के लोग “प्रति-ध्रुवीकरण” के सिद्धांत के तहत एकमुश्त वोट करने लगे।
मूल मुसलमान खफा
घुसपैठियों को नागरिक बनाने की कथित रणनीति का एक नकारात्मक प्रभाव मूल निवासी मुसलमानों पर पड़ रहा है। इस समुदाय का एक वर्ग अब यह महसूस करने लगा है कि सीमा पार से आने वाले लोगों को बसाने की होड़ में उनके अपने संसाधनों – जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरियों- की हकमारी हो रही है। इसके अतिरिक्त, इस राजनीति ने पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक नकारात्मक नैरेटिव को भी हवा दी है। प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक उदयन बंद्योपाध्याय के अनुसार, “बंगाल के मूल निवासी मुसलमानों में यह सुगबुगाहट है कि सत्ता के खेल में उनकी पहचान को ‘घुसपैठिए’ के साथ मिला दिया गया है, जिसका उन्हें दोहरा नुकसान हो रहा है।
एक ओर तो उनके संसाधनों में हकमारी और दूसरे, सामाजिक तौर पर पूरे समुदाय को संदेह की नजर से देखा जाना।” राजनीतिक विश्लेषक देबाशीष नंदी इसके एक और आयाम की ओर ध्यान दिलाते हैं। वह कहते हैं, “ममता ने घुसपैठियों के वोट पाने के चक्कर में धर्मनिरपेक्ष समुदाय के बड़े वर्ग को अपने खिलाफ कर लिया है। इनमें हिन्दू और मुसलमान, दोनों हैं। इन लोगों को लगता है कि मुस्लिम तुष्टीकरण को हवा देकर ममता ने बंगाल के समाज के मूल चरित्र को बदल दिया है, जिसका खामियाजा पूरे समाज को उठाना पड़ रहा है।”
भाजपा के जाल में फंसीं ममता!
भाजपा ने ममता बनर्जी को अपने जाल में उलझा लिया है। भाजपा का प्रयास था की ममता बनर्जी को अपनी ही सीट पर मोर्चाबंदी कर दी जाए जिससे उन्हें अपनी सीट पर भी ज्यादा समय देना पड़े और इसमें वह सफल होती दिख रही है। भाजपा ने इसी रणनीति के तहत तृणमूल कांग्रेस से पहले अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की सूची जारी करके विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी की सीट भबानीपुर से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया।
इससे ममता बनर्जी के लिए भबानीपुर विधानसभा सीट से ही चुनाव लड़ने की मजबूरी हो गई। अगर ममता इस सीट को छोड़कर किसी अन्य सीट से चुनाव लड़तीं तो जनता में संदेश जाता कि ममता सुवेंदु अधिकारी के डर से सीट छोड़कर अन्य सीट पर चली गई हैं और इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं को हौसला कमजोर होता। दूसरा कि ममता सिर्फ एक सीट से ही लड़ने को मजबूर हो गईं। अगर ममती दो सीटों से भी लड़तीं, तो भी जनता में संदेश जाता कि उन्हें सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ जीतने का पक्का भरोसा नहीं।
इस बार ममता के दो सीटों से चुनाव लड़ने की अटकलें थीं और इसका कारण 2024 के लोकसभा के चुनाव में ममता बनर्जी की भबानीपुर विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस का कमतर प्रदर्शन था जब तृणमूल कांग्रेस भाजपा से केवल 8269 मतो से आगे थी और वह भी तब जब माकपा को इस सीट पर 14006 मत मिले थे। कोलकाता में रहने वाले संजीव मोदी बताते हैं कि “जब कोई शीर्ष नेता अपनी सीट को लेकर असुरक्षित महसूस करता है, तो वह पूरे राज्य में आक्रामक प्रचार नहीं कर पाता और इससे चुनावी नैरेटिव बदल जाता है।”
भाजपा की बढ़त
भाजपा का श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि बंगाल को जीतने का सपना रहा है। भाजपा एक लंबे संघर्ष के बाद बंगाल में पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब हुई और पार्टी को 17% मत मिले। हालांकि इतने वोट प्रतिशत के बावजूद भाजपा को सिर्फ दो सीटें ही मिल पाई थीं। इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 10% मत मिला लेकिन सीटें फिर भी केवल तीन।
भाजपा ने पश्चिम बंगाल में असली शक्ति का प्रदर्शन 2019 के लोकसभा चुनाव में किया जब पार्टी को 41% मत मिला और वह 18 सीटें जीतने में कामयाब हुई जबकि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को 40.9 प्रतिशत वोट मिले लेकिन उसकी सीटों की संख्या घटकर 12 हो गई। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 38% मत मिला और 77 सीटें जीतने में कामयाब हुई। भाजपा 201 सीटों पर दूसरे पायदान पर रही थी। भाजपा 2021 के विधानसभा के चुनाव में कुल राज्य के 294 सीटों में 278 सीटों पर सीधे मुकाबले में रही। भाजपा के लिए यह बड़ी सफलता थी क्योंकि सिर्फ 5 साल में पार्टी तीन से बढ़कर 77 सीट जितने में कामयाब हुई। भाजपा 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जहां केवल 10 सीटों पर सीधे मुकाबले में थी वही 2021 में 278 सीटों पर सीधे मुकाबले में आ गई।

















