इस्लामाबाद में हाल ही में सम्पन्न हुई अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष वार्ता शुरुआत से ही विफलता की ओर अग्रसर दिख रही थी। दोनों पक्ष अपनी कठोर और परस्पर विरोधी स्थितियों के साथ बातचीत में शामिल हुए, जिससे किसी सार्थक समझौते की संभावना लगभग समाप्त हो गई।
अमेरिका का रुख: स्पष्ट लेकिन कठोर
इस्लामाबाद रवाना होने से पहले अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने अपनी शर्तें स्पष्ट कर दी थीं। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करे, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस का निर्बाध आवागमन सुनिश्चित करे, हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे संगठनों को समर्थन बंद करे, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम रोक दे। हालांकि, अमेरिका ने शासन परिवर्तन की मांग को नरम किया, जो व्यावहारिक दृष्टिकोण का संकेत था।
ईरान की प्रतिक्रिया: रणनीतिक प्रतिरोध
ईरान ने शुरुआत से ही वार्ता में कम रुचि दिखाई। प्रतिनिधिमंडल एक दिन देरी से पहुंचा। परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम छोड़ने से इनकार किया। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की योजना जताई। ईरान इन क्षमताओं को अपनी सुरक्षा और प्रभाव के लिए आवश्यक मानता है।
बाहरी शक्तियों की भूमिका: चीन और पाकिस्तान
रिपोर्ट्स के अनुसार चीन ईरान को आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली प्रदान कर सकता है। उपग्रह खुफिया जानकारी साझा की गई। सैन्य सहायता की भी आशंका है। यदि यह सही है, तो पाकिस्तान की मध्यस्थता पर प्रश्न उठते हैं।
संघर्ष विराम या रणनीतिक विराम?
दो सप्ताह का संघर्ष विराम कूटनीति का अवसर बताया गया, लेकिन यह संभव है कि इसका उपयोग सैन्य तैयारी के लिए किया गया हो। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
वार्ता की विफलता के कारण
- मूल मुद्दों पर असहमति
- विश्वास की कमी
- बाहरी हस्तक्षेप
दोनों पक्ष समझौते के बजाय अपने रुख को मजबूत करने आए थे।
आगे का रास्ता: रूस की भूमिका
रूस, ईरान पर प्रभाव रखने के कारण, एक प्रभावी मध्यस्थ बन सकता है। यदि दोनों पक्ष सहमत हों, तो यह एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है। इस्लामाबाद वार्ता ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिना लचीलापन, विश्वास और प्रभावी मध्यस्थता के, शांति की दिशा में प्रगति संभव नहीं है।
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