नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में विजय स्वामी जी ने “विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन- भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण” विषय पर अपने विचार साझा किए। आज आमतौर पर यह माना जाता है कि जनजातीय समाज “पिछड़ा” है और उसे “विकसित” करने की जरूरत है। लेकिन इस सोच में एक बड़ी कमी है। असली समस्या यह नहीं है कि जनजातीय समाज पीछे है, बल्कि यह है कि हमने उनके भीतर आत्मगौरव की भावना को मजबूत नहीं किया। हमने उन्हें यह महसूस नहीं कराया कि उनकी परंपराएँ, संस्कृति और जीवनशैली आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी पहले थीं।
जनजातीय ज्ञान: आधुनिक समस्याओं का पारंपरिक समाधान- दरअसल, जनजातीय समाज के पास ऐसे कई ज्ञान और परंपराएँ हैं, जो आज की आधुनिक दुनिया की बड़ी समस्याओं का समाधान दे सकती हैं। आज पूरी दुनिया सस्टेनेबल डेवलपमेंट, फूड सिक्योरिटी और हेल्दी लाइफस्टाइल की बात कर रही है। लेकिन जो समाधान खोजे जा रहे हैं, वे पहले से ही जनजातीय जीवन में मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ समय पहले तक जेनेटिकली मॉडिफाइड फूड को बहुत बढ़ावा दिया गया। लेकिन बाद में यह समझ आया कि यह स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इसके बाद दुनिया फिर से ऑर्गेनिक खेती और पारंपरिक तरीकों की ओर लौटने लगी। यह वही तरीके हैं, जिन्हें जनजातीय समुदाय सदियों से अपनाते आ रहे हैं।
मानवीय मूल्यों की सच्ची मिसाल- जनजातीय समाज की सबसे बड़ी ताकत उनके मानवीय मूल्य हैं। वहाँ परिवार और समाज के बीच गहरा संबंध होता है। माता-पिता को भगवान के समान माना जाता है, लेकिन इसके लिए किसी विशेष शिक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। यह भावना उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा होती है। अगर किसी व्यक्ति को बीमारी हो जाती है, तो पूरा समुदाय उसकी मदद के लिए खड़ा हो जाता है। अगर किसी का घर बनाना हो, तो लोग मिलकर उसे तैयार करते हैं। यह सहयोग और अपनापन आज के शहरी जीवन में बहुत कम देखने को मिलता है। आज हम खुद को आधुनिक और सभ्य कहते हैं, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या हम वास्तव में इन मूल्यों को अपने जीवन में जी रहे हैं? शायद नहीं। यही कारण है कि हमें जनजातीय जीवन से सीखने की जरूरत है, न कि केवल उन्हें बदलने की।
संस्कृति संरक्षण और लागू शोध की पहल- इसी सोच के साथ अब जनजातीय संस्कृति और परंपराओं पर शोध की दिशा में काम शुरू किया गया है। इस काम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है- डॉक्यूमेंटेशन। पहले जब विदेशी यात्री भारत के जनजातीय क्षेत्रों में आए, तो उन्होंने जो देखा और लिखा, वही हमारे इतिहास का हिस्सा बन गया। क्योंकि हमारे पास अपने दस्तावेज नहीं थे। अब समय आ गया है कि हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को खुद समझें और उन्हें सही तरीके से रिकॉर्ड करें। इसके लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। ऑडियो-विज़ुअल डॉक्यूमेंटेशन के माध्यम से लोकगीत, मंत्र, नृत्य और अन्य परंपराओं को रिकॉर्ड किया जा रहा है। साथ ही, बुनाई, कला और शिल्प को भी सुरक्षित रखा जा रहा है। इसके अलावा, डिजिटल डेटा बैंक तैयार किया जा रहा है, जिससे यह जानकारी लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। एथ्नोग्राफिक और वर्चुअल म्यूज़ियम के माध्यम से आम लोग भी इन परंपराओं को देख और समझ सकते हैं। इससे जनजातीय संस्कृति को पहचान और सम्मान मिल रहा है। लेकिन केवल शोध और डॉक्यूमेंटेशन करना ही काफी नहीं है। सबसे जरूरी है कि इस ज्ञान को जनजातीय समुदायों के जीवन में लागू किया जाए। इसे ही “लागू शोध” कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि जनजातीय लोगों को उनकी अपनी परंपराओं के माध्यम से बेहतर जीवन मिले।
















