नई दिल्ली के झंडेवाला स्थित केशव कुंज में चिकित्सक के रूप में हर किसी की सेवा करने वाले डॉ. योगेंद्र सिंह नहीं रहे। गत 4 अप्रैल की सुबह पौने पांच बजे उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अंतिम सांस ली। एक दिन पहले अचानक कम दिखार्द देने लगा तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। दवा चली तो ठीक भी हो गए। अस्पताल में जाकर अनेक कार्यकर्ता उनसे मिले भी। सबसे उन्होंने बातचीत की और एक ही प्रश्न पूछा कि शनिवार और रविवार की बैठक की क्या तैयारी है! इसी बीच वे बैठे-बैठे झुक गए। उन्हें तुरंत आईसीयू में ले जाया गया, लेकिन भगवान की इच्छा के सामने सारे प्रयास विफल हो गए और वे इस दुनिया से चल बसे।
डॉ. योगेंद्र का पूरा जीवन सेवा में बीता, लेकिन उन्होंने कभी किसी की सेवा नहीं ली। वे जितने मृदुभाषी थे, उतने ही व्यावहारिक भी। जो भी एक बार उनसे मिलता था, उनका हो जाता था। उनके व्यवहार ने उन्हें अजातशत्रु बना दिया था।
कुरुक्षेत्र से बी.ए.एम.एस. की पढ़ाई करते समय वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने थे। 1981 में वे हिसार में डेढ़ वर्ष विस्तारक भी रहे। उन दिनों दिल्ली और हरियाणा एक ही प्रांत में थे और प्रांत प्रचारक थे श्री अशोक सिंहल। उन्होंने ही उन्हें संघ कार्यालय, झंडेवाला आने को कहा। इसके बाद वे पूरे जीवन झंडेवाला में ही रहे। वे लंबे समय तक झंडेवाला देवी मंदिर गली में सपरिवार रहे। कुछ वर्ष से वे जोशी रोड, करोलबाग में रह रहे थे।
डॉ. योगेंद्र और झंडेवाला कार्यालय मानो एक-दूसरे के पूरक थे। कार्यालय में आने-जाने वाले कार्यकर्ताओं को जब कभी किसी चिकित्सकीय जरूरत होती थी तो डॉ. योगेंद्र 24 घंटे हाजिर रहते थे। कार्यालय में चलने वाले चिकित्सालय में आसपास में रहने वाले लोग भी आते हैं। डॉ. योगेंद्र उन सबकी सेवा करते थे। वे प्रतिदिन 100 से अधिक मरीजों को देखते थे और उन्हें चिकित्सकीय परामर्श के साथ दवाई भी देते थे। प्रवास पर रहने वाले प्रचारक और कार्यकर्ता को कभी कोई समस्या होती थी, तो वे लोग डॉ. योगेंद्र को फोन से संपर्क करते थे और वे उन्हें आवश्यक सुझाव और परहेज की सलाह देकर दवाइयों के नाम भेज देते थे। इससे उन्हें प्राथमिक उपचार मिल जाता था।
डॉ. योगेंद्र एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनके दिल्ली के सरकारी और निजी अस्पतालों के चिकित्सकों से प्रगाढ़ संबंध थे। जब भी किसी कार्यकर्ता को दिल्ली में डॉक्टर की जरूरत होती थी, तो डॉ. योगेंद्र किसी न किसी अस्पताल में उसकी व्यवस्था कर देते थे।
डॉ. योगेंद्र केवल चिकित्सक ही नहीं थे, वे संघ कार्य को भी समर्पित थे। वे वर्षों तक शाखा कार्यवाह रहे। अभी उनके पास डॉ. कृष्ण गोपाल जी के मार्गदर्शन में धर्म जागरण आयाम का भी दायित्व था। उनका पूरा परिवार संघ कार्य से जुड़ा है। उनके दोनों पुत्र सिद्धार्थ और हिमांशु भी लंबे समय तक मुख्य शिक्षक रहे। अब ये दोनों जीविका के लिए नौकरी करने के साथ ही संघ कार्य भी कर रहे हैं। उनके पौत्र पार्थ भी उनकी मदद करता रहा। दरअसल, डॉ. योगेंद्र अपने घर से स्कूटर से कार्यालय आया करते थे। आयु अधिक होने के कारण वे स्कूटर चलाने से बचते थे। इस स्थिति में पार्थ उन्हें कार्यालय छोड़ जाता था और ले जाता था।
डॉ. योगेंद्र ने काफी दिनों तक ‘पाञ्चजन्य’ के स्वास्थ्य स्तंभ के लिए लेख भी लिखे। 2000 के दशक में ‘पाञ्चजन्य’ के पाठक पत्रों के माध्यम से स्वास्थ्य संबंधी प्रश्न पूछते थे। उनके उत्तर डॉ. योगेंद्र दिया करते थे और उन उत्तरों को प्रकाशित किया जाता था। इससे पाठक लाभान्वित होते थे। यानी उन्होंने ‘पाञ्चजन्य’ को भी समृद्ध करने में सहयोग किया। ऐसे सेवाभावी स्व. योगेंद्र सिंह को ‘पाञ्चजन्य’ परिवार की भावभीनी श्रद्धांजलि।

















