भारत में यह बात छुपी हुई नहीं है कि अंग्रेजी-दां हिंदू अपनी संस्कृति, संस्कार, तीज-त्योहार के प्रति हीन-भावना रखते हैं। यही नहीं, हिंदुओं पर हो रहे हमलों के प्रति भी ऐसे लोग चुप रहते हैं। अपवाद हो सकते हैं, लेकिन इस बात में दम है। यह अनुभव आम हिंदू ही नहीं कर रहा है, बल्कि मारिया विर्थ, फ्रांस्वा गोतिए जैसे विदेशी विचारक और लेखक भी करते हैं। जर्मन लेखिका मारिया विर्थ अपने इन अनुभवों को लिपिबद्ध भी करती रही हैं।
उन्होंने अपने उन लेखों को ‘व्हाय हिंदू धर्म इज अंडर अटैक बाय मुस्लिम, क्रिश्चियन एंड दी लेफ्ट’ नामक पुस्तक में संकलित किया है। कुल 43 अध्याय में बंटी इस पुस्तक में इस्लामी कट्टरवाद, माओवाद-नक्सलवाद से लेकर विस्तारवादी चर्च के कारनामों को भी उदाहरणों के साथ बताने का प्रयास किया गया है। कह सकते हैं कि पुस्तक में हिंदू धर्म के प्रति कथित हमलों की प्रकृति, कारण और प्रभाव को समझाने का प्रयत्न किया गया है।
प्रारंभ के कुछ अध्यायों में हिंदू धर्म की विशेषताओं, भारतीय ज्ञान और हिंदुओं के मूल स्वभाव की चर्चा की गई है। अध्याय दो का शीर्षक है-बेसिक आफ वैदिक विसडम। इसमेें उन्होंने अपने बारे में बताया है कि कैसे वे भारतीय संस्कृति की ओर झुकीं। लिखती हैं, ”संयोग से मुझे 1980 में हरिद्वार के कुंभ मेले में आने का अवसर मिला। वहां श्री आनंदमयी मां, देवराहा बाबा जैसे संतों का सान्निध्य मिला। उनकी प्रेरणा से भगवद्गीता का अध्ययन शुरू किया। फिर योग क्रिया में भाग लेने लगी। इन सबने मुझे हिंदू धर्म को समझने का अवसर दिया।”
अध्याय चार ‘दी मिसअंडरस्टैंडिंग दैट किल्ड’ में लेखिका ने बताया है कि हिंदू धर्म के प्रति उनकी जो गलतफहमियां थीं, वे कैसे दूर हुईं। अध्याय 15 ‘ए विक्ट्री फार हिंदूज आफ्टर 500 इयर्स आफ स्ट्रगल’ में उन्होंने अयोध्या के श्रीराम मंदिर को लेकर हिंदुओं ने जो संघर्ष किया है, उसे बताया है। इसके साथ ही उन्होंने 22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में हुई मूर्ति प्राण—प्रतिष्ठा के महत्व और उसके प्रभाव को बताया है।
223 पन्नों की इस पुस्तक के शुरुआती अध्यायों में हिंदू धर्म की विशेषताओं, हिंदुओं के संघर्ष, ज्ञान, हिंदू संत के बारे में बताया गया है। इसके बाद के अध्यायों में हिंदुओं पर हो रहे हमलों, हिंदुओं की हत्या आदि को प्रमुखता से उठाया गया है। अध्याय 31 ‘अटैक्स् आन हिंदुत्व हैव एन एजेंडा’ में लेखिका ने बताया है कि आए दिन पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिंदुओं की बेइज्जती की जाती है, अपहरण किया जाता है, हत्या की जाती है, लेकिन विदेशी मीडिया चुप्पी साध लेता है। लेखिका ने कट्टरवादी तत्वों द्वारा भारत में हो रही हिंदुओं और साधुओं की हत्या को भी चिंतनीय माना है।
इसी अध्याय में उन्होंने लिखा है कि यदि कोई हिंदू यूवक किसी मुसलमान लड़की के साथ विवाह करता है, तो उसकी निर्दयता के साथ हत्या कर दी जाती है। कह सकते हैं कि इसके माध्यम से उन्होंने लव जिहाद के मुद्दे को भी उठाने का प्रयास किया है। इसी अध्याय में 2020 में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान जिस तरह की धमकियां हिंदुओं को दी गईं, उन्हें भी शामिल किया गया है। इसी अध्याय में उन्होंने कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन की भी चर्चा की है।
लिखती हैं कि लगभग 4,00,000 हिंदू कश्मीर घाटी से पलायन को मजबूर हुए। उनके इस पलायन पर किसी ने आंसू नहीं बहाया, लेकिन मार्च, 2022 में जब फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुए अन्याय को दिखाया गया तो एक बड़े वर्ग ने इसे ‘दुष्प्रचार’ बताने में देर नहीं की। पुस्तक का मूल तर्क यह है कि हिंदू धर्म, जो मूलतः सहिष्णु, बहुलतावादी और उदार है, उसे अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है-विशेषकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया, अकादमिक जगत और कुछ भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा। लेखिका मानती हैं कि यह आलोचना कई बार तथ्यों से अधिक विचारधारा पर आधारित होती है।
पुस्तक के तीन सार हैं-पहला, यह पश्चिमी दृष्टिकोण की आलोचना करती है, जिसमें हिंदू धर्म को ‘पिछड़ा’ या ‘अंधविश्वासी’ बताया जाता है। दूसरा, यह भारतीय समाज के भीतर मौजूद आत्म-संदेह और अपनी परंपराओं से दूरी को रेखांकित करती है। तीसरा, यह बताती है कि कैसे राजनीतिक और वैचारिक कारणों से हिंदू पहचान को कमजोर करने का प्रयास किया जाता है।

















