एमपी हाईकोर्ट: मुस्लिम पर्सनल लॉ में दूसरी शादी अमान्य नहीं, इसलिए धारा 494 लागू नहीं होगी
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एमपी हाईकोर्ट: मुस्लिम पर्सनल लॉ में दूसरी शादी अमान्य नहीं, इसलिए धारा 494 लागू नहीं होगी

आरोपी के वकील ने दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पांचवीं शादी होने पर ही धारा 494 लागू हो सकती है, क्योंकि चार शादियां करना कानूनी रूप से मान्य है। इसी केस की सुनवाई हाईकोर्ट में हो रही थी।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता
Apr 9, 2026, 11:05 pm IST
in भारत
कोर्ट का फैसला

कोर्ट का फैसला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और भारतीय दंड संहिता (IPC) के बीच के कानूनी तालमेल को लेकर फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह (पॉलीगैमी) को मान्यता प्राप्त होने के कारण, एक मुस्लिम पुरुष पर पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करने के लिए द्विविवाह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

जस्टिस बीपी शर्मा की एकल पीठ ने एक मुस्लिम पति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 494 (द्विविवाह) केवल उन स्थितियों में लागू होती है, जहां पहली शादी के रहते हुए की गई दूसरी शादी कानून की नजर में ‘अमान्य’ हो।

कोर्ट का तर्क

चूंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक पुरुष को एक से अधिक (चार तक) पत्नियां रखने की अनुमति देता है, इसलिए दूसरी शादी स्वतः अमान्य नहीं मानी जा सकती। बेंच ने कहा कि जब तक दूसरी शादी कानूनन अवैध न हो, तब तक द्विविवाह का अपराध नहीं बनता। इस आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 494 के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

क्रूरता और धमकी के आरोपों पर चलेगा मुकदमा 

हाईकोर्ट ने पति को पूरी तरह दोषमुक्त नहीं किया है। कोर्ट ने माना कि भले ही द्विविवाह का मामला न बनता हो, लेकिन आरोपी की पत्नी ने जो अन्य आरोप लगाए हैं जैसे मारपीट (धारा 323), क्रूरता (धारा 498-A), बंधक बनाना (धारा 342) और आपराधिक धमकी (धारा 506) प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं। इसलिए इनका मुकदमा चलेगा।

क्या है पूरा मामला

शिकायतकर्ता पत्नी ने पुलिस को बताया था कि उसकी शादी 2002 में हुई थी। बच्चा न होने के कारण उसका पति उसके साथ लगातार मारपीट करता था। मई 2022 में पति ने दूसरी शादी कर ली और उस पर ‘खुला’ (आपसी सहमति से तलाक) देने के लिए दबाव बनाया।

आरोपी के वकील ने दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पांचवीं शादी होने पर ही धारा 494 लागू हो सकती है, क्योंकि चार शादियां करना कानूनी रूप से मान्य है। इसी केस की सुनवाई हाईकोर्ट में हो रही थी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले तक पहुंचने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और पर्सनल लॉ के प्रावधानों का सहारा लिया। सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह की स्थिति में द्विविवाह के कानून की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए।

एक अन्य केस (खुर्शीद अहमद खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2015) का हवाला देते हुए कोर्ट ने नोट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह को मान्यता प्राप्त है।

कोर्ट ने कहा कि धारा 494 के तहत सजा तभी हो सकती है जब दूसरी शादी उस व्यक्ति के ‘पर्सनल लॉ’ के तहत अवैध हो। हिंदुओं में दूसरी शादी अमान्य है, इसलिए उन पर यह लागू होती है, लेकिन मुस्लिमों के लिए स्थिति अलग है।

विपक्ष की दलील और कोर्ट का रुख

शिकायतकर्ता पत्नी के वकील ने तर्क दिया था कि जब तक शरिया एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के तहत औपचारिक घोषणा जमा नहीं की जाती, तब तक पति चार शादियों का हकदार नहीं है। हालांकि, बेंच ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि मुस्लिम समाज में बहुविवाह की पारंपरिक और कानूनी मान्यता सर्वोपरि है।

हाईकोर्ट का फैसला और निर्देश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि धारा 494 के तहत मुकदमा जारी रखना ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’ होगा। इसलिए द्विविवाह के आरोप को हटा दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह क्रूरता (498-A) और अन्य मारपीट से संबंधित धाराओं की स्वतंत्र रूप से जांच करे और साक्ष्यों के आधार पर कानून के हिसाब से फैसला सुनाए।

Topics: Muslim Personal LawMP High CourtShariat LawSection 494 IPCBigamy CasePolygamy In IndiaHigh Court Verdict
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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