हाल ही में भारत जापान को पीछे छोड़ दुनिया का चौथा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। गौरतलब है कि वर्ष 2014 में भारत डॉलर बाजार मूल्य के आधार पर जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की दृष्टि से दुनिया की 10वीं बड़ी अर्थव्यवस्था था, और मात्र 10 सालों में ही यह चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की हालिया रिपोर्ट के वर्ष 2030 तक भारत की जीडीपी जर्मनी को पछाड़ते हुए विश्व में तीसरे स्थान पर पहुंच जायेगी।
भारत की जीडीपी , डॉलर के बाजार मूल्य के आधार पर अब 4.19 खरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। इस संबंध में कुछ लोग भारत की इस उपलब्धि को यह कहकर खारिज करने का प्रयास करते हैं कि जिस जापान को पछाड़ कर हम विश्व में जीडीपी की दृष्टि से चौथे स्थान पर पहुंचने की बात करते हैं, उसकी प्रति व्यक्ति आय 33960 डॉलर है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र 2878 डॉलर ही है। यह सत्य है कि डॉलर में जीडीपी बढ़ने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से हम अभी भी इन देशों से कहीं पीछे हैं, लेकिन विश्व में जीडीपी की तुलना की बात करें, तो विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विभिन्न देशों के लिए क्रय शक्ति समता के आधार पर जीडीपी के आंकड़े प्रकाशित करते हैं।
इस संबंध में यदि इन आंकड़ों को देखते हैं तो पता चलता है कि क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत की जीडीपी 4.19 खरब डॉलर से कहीं अधिक, वास्तव में 17.65 खरब डॉलर है। डॉलर के बाजार मूल्य के आधार पर प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से जहां भारत का स्थान दुनिया के 189 देशों में 136वें स्थान पर है, लेकिन क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत की प्रति व्यक्ति आय 12132 डॉलर दुनिया में 119वें स्थान पर है। इन आंकड़ों को देखें तो ध्यान में आता है कि जहां डॉलर के बाजार मूल्य के आधार पर अमेरिका की जीडीपी, भारत की जीडीपी से 7.2 गुणा अधिक है और अमेरिकी प्रति व्यक्ति आय भारत की तुलना में 23.6 गुणा अधिक है। क्रय शक्ति समता के आधार पर अमेरिका की जीडीपी 1.72 गुणा ही अधिक है, जबकि अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय मात्र 5.6 गुणा ही अधिक है। डॉलर के बाजार मूल्य के आधार पर अमेरिका, चीन और जर्मनी ही भारत से आगे हैं।
संकट में जर्मन अर्थव्यवस्था
जर्मनी की अर्थव्यवस्था संकट में है। हालांकि जर्मनी में मौद्रिक आय 2021 में 4.36 ट्रिलियन डॉलर से बढ़ती हुई 2025 में 5.0 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है, लेकिन यह वृद्धि केवल मौद्रिक वृद्धि ही है। इसलिए बढ़ती हुई जीडीपी जर्मनी की मजबूत आर्थिक सेहत की ओर संकेत नहीं करती। गौरतलब है कि बढ़ती लागतें और मुद्रा स्फीति की वजह से मौद्रिक जीडीपी तो बढ़ रही है लेकिन स्थिर कीमतों के आधार पर जर्मनी की जीडीपी वास्तव में 3.6 से 3.7 ट्रिलियन डॉलर पर स्थिर है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जर्मनी में जीडीपी ग्रोथ लगभग शून्य के स्तर पर चल रही है। चूंकि मौद्रिक जीडीपी डॉलर के मुकाबले यूरो के मजबूत होने के कारण अभी भी डॉलर में बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। पिछले 10 सालों में जर्मनी की जीडीपी कुल 9.4 प्रतिशत ही बढ़ी है।
थम रही बड़ी अर्थव्यवस्थाएं
जापान की जनसंख्या वृद्धि दर 1975 में 1.12 प्रतिशत थी, जो 2010 में घटकर 0.21 प्रतिशत और 2025 में -0.52 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका मतलब है कि 2010 के बाद से जापान की जनसंख्या अब घटने लगी है। इसके साथ ही साथ जापान में वृद्धों की संख्या लगातार बढ़ रही है और जनसंख्या की औसत आयु जो 1955 में मात्र 22.7 वर्ष थी, अब बढ़कर 49.8 वर्ष हो गई है। आसानी से समझ सकते हैं कि जापान में काम करने वाले हाथ घट रहे हैं और निर्भर जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। इसी प्रकार जर्मनी की जनसंख्या भी लगातार वृद्ध होती जा रही है। 1955 में जर्मन जनसंख्या की औसत आयु 33 वर्ष थी, जो कि अब बढ़कर 46 वर्ष पहुंच गई है। वर्ष 1972 से जर्मनी की जनसंख्या लगातार घट रही है। ऐसे में जर्मनी की घटती वास्तविक जीडीपी कोई आश्चर्य का विषय नहीं है।
युवा हमारी ताकत
दूसरी तरफ, भारत दुनिया का सबसे अधिक युवा देश कहा जाता है। भारत की जनसंख्या की औसत आयु अभी भी काफी नीचे है (28.8 वर्ष)। वर्ष 2100, यानी इस शताब्दी के अंत तक भी यह औसत आयु जापान की वर्तमान औसत आयु से कम 47.8 वर्ष रहने की उम्मीद है। देश में बढ़ती युवा जनसंख्या भारत की जीडीपी को आगे बढ़ाने का काम कर रही है। नीति आयोग के अनुसार, 2013-14 और 2022-23 के बीच भारत में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से मुक्त हुए हैं। बहुआयामी गरीबी दर 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत हो गई है।
दरअसल भारतीय रुपए की क्रय शक्ति दूसरे देशों (विशेष तौर पर विकसित देशों) की तुलना में अधिक होने के कारण, समान प्रकार के कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च दूसरे देशों से कहीं कम होता है। उदाहरण के लिए, भारत सरकार द्वारा लागू आयुष्मान भारत कार्यक्रम पर केंद्र सरकार द्वारा इस पर कुल खर्च मात्र 9406 करोड़ रुपए ही है। राज्य सरकारों के खर्च को भी यदि शामिल किया जाए तो आयुष्मान भारत पर कुल खर्च 15700 करोड़ रुपए ही है। आयुष्मान भारत के कुल लाभार्थी (आयुष्मान भारत कार्ड धारक) संख्या 39.6 करोड़ बताए जाते हैं। लेकिन यदि इंग्लैंड सरीखे विकसित देशों की सरकारों पर, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाओं के वित्तपोषण पर खर्च लगभग 3800 पाउंड बैठता है। यदि वहां के लोग निजी स्वास्थ्य बीमा लेते हैं तो उस पर भी खर्च काफी अधिक होता है। यानी आयुष्मान भारत कार्ड पर खर्च, विकसित देशों में इस प्रकार की सुविधाओं पर खर्च लगभग 1000 गुणा कम होता है।
उसी प्रकार से सरकार द्वारा मात्र 5 लाख करोड़ रुपए की सहायता राशि से मदद से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के घरों का बड़ी संख्या (4 करोड़) में निर्माण हुआ है। यानी गृह निर्माण में प्रति गृह निर्माण पर सरकारी सहायता 1.26 लाख रुपए ही हुआ है। अलग-अलग क्षेत्रों में भी सरकारी सहायता राशि अलग-अलग दी गई है। लेकिन भारत में गृह निर्माण की लागत कम होने से, कहीं कम लागत खर्च से कहीं अधिक सामाजिक कल्याण संभव हो पाया है।
औद्योगिक क्रांति 4.0 की तैयारी
भारत आदिकाल से उद्यमशीलता का देश रहा है। वर्तमान युग के औद्योगिक देशों में जब उद्योग का नामोनिशान नहीं था, तब भारत दुनिया का सर्वोत्तम औद्योगिक देश था। भारत लगभग सभी वस्तुओं का उत्पादन ही नहीं करता था, बल्कि भारतीय उत्पाद दुनिया में सबसे उत्कृष्ट थे। भारत से पूरी दुनिया के देशों को निर्यात किया जाता था। भारत से निर्यातों के बदले में सोने का आयात होता था। इतिहासकार एंगस मैडिसन ने अपनी पुस्तक में लिखा है, ”ईसा के जन्म से लेकर 15वीं शताब्दी तक भारत दुनिया की जीडीपी के एक तिहाई से ज्यादा उत्पादन करता था। यह सब बिना उन्नत प्रौद्योगिकी के संभव नहीं था। दुनिया का बेहतरीन कपड़ा, हस्तशिल्प, नक्काशी, भवन निर्माण, शस्त्र निर्माण सभी में भारत को महारत हासिल थी। लेकिन 15वीं शताब्दी के बाद देश की औद्योगिक प्रगति धीमी हो गई। अंग्रेजी शासन आने के बाद तो भारत विऔद्योगीकरण यानी डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन का शिकार हो गया। जब अंग्रेज भारत से गए तो जो देश 15वीं शताब्दी तक दुनिया की जीडीपी का एक तिहाई पैदा करता था, उसका हिस्सा घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह गया।”
भारत दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से पहली तीन औद्योगिक क्रांतियों में पिछड़ गया था। औद्योगिक क्रांति 1.0 में, उत्पादन को पानी और भाप से यंत्रीकृत किया गया था, विदेशी शासन के कारण हम इससे चूक गए। दूसरी औद्योगिक क्रांति, जिसने बिजली से चलने वाले मशीनीकरण का उपयोग शुरू किया, को सार्वजनिक क्षेत्र की प्रबलता और नवाचारों के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं होने के कारण भारत में ज्यादा सफलता नहीं मिली। इसके अन्य कारण थे देश में बिजली की कमी और अनुसंधान और विकास का अभाव। सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स की तीसरी औद्योगिक क्रांति, हम इससे भी चूक गए क्योंकि जब इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग तेजी से बढ़ रहा था और चीन दुनिया में इन उत्पादों के लिए विनिर्माण का केंद्र बन रहा था, देश में नवाचार की कमी और तत्कालीन कांग्रेस सरकार के उदासीन रवैये ने देश में आईटी से संबंधित उत्पादों के उत्पादन में बाधा उत्पन्न की।
नवऔद्योगिक जागरण
23 अगस्त 2023 को भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग करके इतिहास रच दिया है, जिससे भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला दुनिया का चौथा देश और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बन गया है। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की न तो पहली उपलब्धि है, और न ही आखिरी। लेकिन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह कुशल और लागत प्रभावी है। उदाहरण के लिए, जबकि अन्य देश अपने चंद्रमा मिशनों पर भारी खर्च कर रहे हैं, चंद्रयान अभियान की लागत केवल 615 करोड़ रुपए ही है। उल्लेखनीय है कि पीएसएलवी की 37वीं उड़ान ने सबसे किफायती तरीके से एक साथ 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित कर इतिहास रचा था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अंतरिक्ष कार्यक्रम में सफलता अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भारत की क्षमताओं के बारे में बहुत कुछ बताती है। सच तो यह है कि विश्व के अधिकांश विकसित देश भी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की सहायता से ही अपने उपग्रह प्रक्षेपित करते हैं, क्योंकि ‘इसरो’ जिस मितव्ययता से यह कार्य करने में सक्षम है, उसका मुकाबला कोई भी देश नहीं कर सकता।
भारत की एक और तकनीकी उपलब्धि है, जिसने दुनिया का ध्यान खींचा है, वह है ‘यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस’ (यूपीआई)। गौरतलब है कि साल 2022 में देश में कुल 149.5 लाख करोड़ रुपए का ऑनलाइन लेनदेन हुआ। इनमें 126 लाख करोड़ रुपये के भुगतान सिर्फ यूपीआई के माध्यम से किए गए। पिछले साल देश में कुल मिलाकर लगभग 88 बिलियन ऑनलाइन लेनदेन दर्ज किए गए। दुनिया में होने वाले सभी ऑनलाइन लेनदेन में भारत का हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक है। यूपीआई ने वीजा और मास्टरकार्ड जैसे अंतर्राष्ट्रीय दिग्गजों को पछाड़ कर भारी मात्रा में मुद्रा बचाने का काम किया है।
युवा हमारी ताकत
आज औद्योगिक क्रांति 4.0 का समय है, जो तीव्र तकनीकी विकास से जुड़ा है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रोबोटिक्स, जीन एडिटिंग और तमाम तरह की स्मार्ट टेक्नोलॉजी, मशीन-टू-मशीन कम्युनिकेशन और इंटरनेट ऑफ थिंग्स के जरिए बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। चौथी औद्योगिक क्रांति में भारत दुनिया में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने की क्षमता रखता है। हमारे युवा, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डिजिटल विशेषज्ञ, इंजीनियर, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ—सभी इस प्रयास में लगे हैं कि औद्योगिक क्रांति 4.0 में भारत दुनिया में पहली पंक्ति में खड़ा हो।
भारत ने अंतरिक्ष और भुगतान बुनियादी ढांचे के निर्माण में अपनी प्रतिभा का भरपूर प्रदर्शन किया है। भारत का युवा स्टार्टअप चिकित्सा में रोबोटिक्स, ड्रोन, डिजिटलीकरण समेत कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय और सराहनीय कार्य कर रहा है। नए विचारों वाले लगभग एक लाख स्टार्टअप विभिन्न प्रौद्योगिकियों के विकास और नवाचार में लगे हुए हैं। हमारा अब तक का अनुभव बताता है कि हम अपने नए विचारों, बुद्धिमत्ता और भारतीय युवाओं के कौशल से औद्योगिक क्रांति 4.0 में आसानी से उत्कृष्टता प्राप्त कर सकते हैं।आज का समय भारत के नवजागरण का समय है। अपनी मेधा के आधार पर भारत दुनिया में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना रहा है। पिछले कुछ सालों में भारत दसवीं बड़ी अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ते हुए आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। अगले कुछ सालों में भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।

















