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नक्सलवाद : बाधा हटी, राह खुली

कई पीढ़ियों तक दर्द, डर और धोखे की कहानी झेलने वाला जनजातीय समाज अब खामोश नहीं है। नक्सलवाद का असली चेहरा सामने आने के बाद वह इसके खिलाफ खड़ा हो चुका है

Written byशोमेन चंद्रशोमेन चंद्र
Apr 7, 2026, 03:02 pm IST
inभारत, विश्लेषण, छत्तीसगढ़
नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण

नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण

दशकों तक जंगलों और जनजातीय इलाकों में भय का पर्याय बना नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है, जनजातीय समाज विकास चाहता है, तरक्की चाहता है। वह अपने बच्चों के हाथों में बंदूक नहीं बल्कि किताबें देखना चाहता है। दशकों तक भारत के विशाल भूभाग को हिंसा और भय से जकड़ने वाला नक्सलवाद आज अपने अंतिम चरण में सिमटता दिखाई दे रहा है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि कभी 12 राज्यों में फैला यह लाल आतंक अब केवल कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमट चुका है। यह केवल एक सुरक्षा सफलता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और विकास मॉडल की ऐतिहासिक विजय है। लेकिन इस पतन की कहानी को समझने के लिए उस रक्तरंजित विचारधारा, उसके पाखंड और उसके विनाशकारी प्रभावों को जानना आवश्यक है।

नक्सलियों ने दशकों तक भारत की आंतरिक सुरक्षा को गंभीर चोट पहुंचाई। नक्सली लगातार देश की संप्रभुता को चुनौती देते थे। वे शत्रु देशों पाकिस्तान और चीन से हथियार प्राप्त करते थे और खालिस्तानी चरमपंथियों के साथ गठजोड़ बनाते थे। नक्सली कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे राष्ट्रीय निर्णयों का कड़ा विरोध करते थे।

विकास के मोर्चे पर नक्सलियों का रवैया अत्यंत क्रूर था। वे जंगलों में नई सड़कों को काट देते थे या उन्हें बम से उड़ा देते थे। वे ग्रामीण इलाकों में स्कूलों और अस्पतालों को नष्ट कर देते थे, ताकि जनजातियों तक कोई बुनियादी सुविधा न पहुंच सके। लोकतंत्र से घृणा करने वाले ये आतंकी हर चुनाव का बहिष्कार करते थे। वे जनता का विश्वास तोड़ने के लिए जनप्रतिनिधियों, यहां तक कि छोटे पंचायत सदस्यों की भी निर्दयता से हत्या कर देना आम बात थी।

जनजातियों के सबसे बड़े दुश्मन

जनजातियों के सबसे बड़े हितैषी होने का झूठा दावा करने वाले नक्सली असल में सबसे अधिक वनवासी समाज का ही शोषण करते थे। वे बच्चों को जबरन अपने संगठन में शामिल कर बंदूक उठाने के लिए विवश करते थे। जन अदालत के नाम पर खूनी कंगारू कोर्ट लगाई जाती थी। बिना कोई दलील सुने निर्दोष वनवासी समाज को पुलिस का मुखबिर घोषित कर उन्हें मौत की सजा दे देते थे। महिला कैडरों के प्रति इन आतंकियों का व्यवहार अत्यंत घिनौना था। शीर्ष नक्सली नेता संगठन में शामिल महिला सदस्यों का लगातार यौन शोषण करते थे।

कभी नक्सली रही शोभा मंडी ने आत्मसमर्पण के बाद स्पष्ट बताया था कि 25 माओवादियों की कमांडर होने के बावजूद बड़े नक्सली नेताओं ने सात वर्षों तक उसके साथ लगातार दुष्कर्म किया था। नक्सली सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति का भी कट्टर विरोध करते थे। उन्होंने बस्तर क्षेत्र में दादूराम कोरेटी, घस्सुराम उसेंडी और रमेश गावड़े जैसे उन सभी नेताओं की हत्या कर दी थी, जो मां दंतेश्वरी की उपासना और हिंदू धर्म का प्रचार कर रहे थे। अंततः ये आतंकी माओ त्से तुंग के हिंसक विचारों का पूर्ण रूप से पालन करते थे। वे डरा-धमकाकर वसूली करते थे और अपना पूरा साम्राज्य चलाते थे।

गरीबी का भ्रम और वैचारिक रणनीति

दशकों तक वामपंथी विचारक और कुछ बुद्धिजीवी नक्सलवाद को गरीबी और विकास की विफलता का परिणाम बताते रहे। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में इस झूठे नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। उन्होंने सदन को बताया कि गरीबी ने नक्सलवाद को नहीं बढ़ाया, बल्कि नक्सलवाद ने स्वयं इन क्षेत्रों में गरीबी फैलाई है। यदि आर्थिक पिछड़ापन ही मुख्य कारण होता, तो देश के अन्य गरीब इलाके भी नक्सलवाद का गढ़ बन जाते। इसके विपरीत, माओवादियों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत उन कठिन भौगोलिक क्षेत्रों को चुना, जहां पहाड़ और घने जंगल थे।

आम धारणा के विपरीत, नक्सलवाद की शुरुआत केवल 1967 से नहीं मानी जा सकती; इसकी जड़ें भारत में 1920 तक देखी जा सकती हैं। 1967 में तो इस आयातित विचारधारा को महज एक स्थानीय पहचान देने के लिए ‘नक्सलवाद’ का नाम दिया गया। इसके बाद पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) ने पशुपति से तिरुपति तक फैले तथाकथित ‘लाल गलियारे’ की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की। 1980 के दशक में कोंडापल्ली सीतारमैया ने बस्तर के दुर्गम जंगलों को अपना आधार बनाया। यहां की राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाते हुए माओवादियों ने धीरे-धीरे जनजातीय समाज में घुसपैठ की और ‘जनताना अदालतों’ के नाम पर समानांतर, हिंसक शासन स्थापित कर दिया। इसी प्रक्रिया के तहत दंडकारण्य को उनका पहला तथाकथित ‘मुक्त क्षेत्र’ घोषित किया गया।

नेतृत्व का पाखंड और खून-खराबा

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का वास्तविक स्वरूप अत्यंत भेदभावपूर्ण और शोषणकारी था। इस आतंकी संगठन की पूरी कमान बाहरी नेताओं के हाथों में केंद्रित रही, जो बस्तर के स्थानीय जनजातीय समुदायों को केवल एक संसाधन, मानो तोप का गोला भर समझते थे। ये नेता समय आने पर चुपचाप सुरक्षित स्थानों पर लौट जाते थे, आत्मसमर्पण कर सरकार से भारी इनाम प्राप्त करते थे और आरामदायक जीवन जीने लगते थे। इसके विपरीत, जब कोई स्थानीय जनजातीय सदस्य हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का प्रयास करता, तो माओवादी उसे ‘गद्दार’ करार देकर निर्ममता से मौत के घाट उतार देते थे।

वर्ष 2004 में पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसी) ने दक्षिण एशियाई माओवादी पार्टियों और संगठनों की समन्वय समिति (CCOMPOSA) के निर्देश पर आपस में विलय कर लिया। नेपाल के कम्युनिस्ट संगठन ने इस विलय में मुख्य भूमिका निभाई। इस नए स्वरूप ने हिंसा की आग को और तेज कर दिया। 2005 में एर्राबोर शिविर पर माओवादियों ने हमला किया और 33 जनजातीय नागरिकों को जिंदा जला दिया। 25 मई, 2013 को झीरम घाटी में इन आतंकियों ने कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल सहित 29 लोगों की नृशंस हत्या कर दी। आतंकियों ने महेंद्र कर्मा की हत्या करने के बाद उनके शव पर चढ़कर नृत्य किया। इससे ज्यादा बर्बरता और क्या हो सकती है।

शहरी नक्सलियों का छल

नक्सलियों के बढ़ते अत्याचारों ने स्थानीय जनजातीय समाज के भीतर भारी आक्रोश पैदा कर दिया। 2005 में मिच्चा हुंगा और वाचम एवड़ा जैसे ग्रामीणों ने नक्सलियों के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाई। नक्सलियों ने वाचम एवड़ा सहित सात लोगों की तुरंत हत्या कर दी। इस क्रूरता ने पूरे बस्तर में एक बड़ी चिंगारी सुलगा दी। 4 जून, 2005 को कुटरू में हजारों जनजातीय ग्रामीणों ने एक विशाल जनसभा आयोजित की। महेंद्र कर्मा और मधुकर राव ने इस जन आंदोलन का नेतृत्व किया और इसे गोंडी भाषा में ‘सलवा जुडूम’ नाम दिया।

सलवा जुडूम के दबाव में नक्सली घबराने लगे। उन्होंने विरोध में ‘कोया भूमकाल मिलिशिया’ का गठन किया और बस्तर को गृहयुद्ध में धकेल दिया। इसी समय शहरों में बैठे वामपंथी विचारकों और शहरी नक्सलियों ने आतंकियों को बचाने के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया। इन शहरी नक्सलियों ने झूठ फैलाकर जुलाई 2011 में इस शांति अभियान पर प्रतिबंध लगवा दिया। इसके बाद फिर से निर्दोष लोगों की हत्याएं शुरू कर दीं। हिमांशु कुमार जैसे शहरी नक्सलियों ने 2009 में सुरक्षा बलों पर फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई। न्यायालय ने इस झूठ को पकड़ा और हिमांशु कुमार पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। ‘द वायर’ और ‘बीबीसी’ जैसे मीडिया संस्थान भी आतंकियों को कथित माओवादी लिखकर उनका लगातार बचाव करते हैं।

राजनीतिक साठगांठ

छत्तीसगढ़ में 2018 से 2023 के बीच भूपेश बघेल की सरकार ने नक्सलियों के प्रति अत्यंत नरम रवैया दिखाया। 2018 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले खूंखार नक्सली नेता गणपति ने भूपेश बघेल को फोन किया। गणपति ने कांग्रेस को 37 सीटों पर जीत दिलाने का सीधा प्रस्ताव दिया। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नेता राज बब्बर ने नक्सलियों को ‘क्रांतिकारी’ कहकर पुकारा। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी नक्सलियों के प्रति सहानुभूति जताई और राज्यसभा सांसद ने कहा कि सभी नक्सली बुरे नहीं होते।

जब कोरोना महामारी के कारण पूरा देश लॉकडाउन का पालन कर रहा था, तब नक्सलवादियों ने जून 2020 में 10 हजार ग्रामीणों की भारी भीड़ जुटाकर एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया। उन्होंने इस भीड़ के जरिए अपना महीनों का राशन जमा कर लिया। इंटेलिजेंस इनपुट मिलने के बाद भी तत्कालीन राज्य सरकार ने इन आतंकियों पर कोई कार्रवाई नहीं की। कुछ ही दिनों बाद कट्टकम सुदर्शन, कोसा रेड्डी और देवजी तिरुपति जैसे शीर्ष कमांडरों ने अबूझमाड़ में एक और बड़ी गुप्त बैठक की। राज्य सरकार ने उस समय भी पूर्ण मौन धारण कर लिया।

वर्ष 2021 में आई एक रिपोर्ट में पता चला कि इसी कालखंड में नक्सलियों ने पूरी एक नई सशस्त्र कंपनी तैयार कर ली और उन्हें अबूझमाड़ में ट्रेनिंग दी। आंकड़े गवाही देते हैं कि कांग्रेस शासन के दौरान सुरक्षा बलों के बलिदान की संख्या बढ़ती गई और माओवादियों के मारे जाने की संख्या लगातार घटती गई। हापाटोला मुठभेड़ के बाद भी सुप्रिया श्रीनेत और दीपक बैज जैसे कांग्रेसी नेताओं ने मुठभेड़ की सत्यता पर सवाल उठाए और मारे गए आतंकियों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की।

लोकतंत्र की विजय

लंबे समय तक 12 राज्यों के 17 प्रतिशत हिस्से को लहूलुहान करने वाला यह वामपंथी उग्रवाद आज अपने पतन के अंतिम चरण में पहुंच चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा बलों के निरंतर प्रहारों ने इस हिंसक तंत्र को केवल दो जिलों तक सीमित कर दिया है। नक्सलियों ने दंडकारण्य को अपना मुक्त क्षेत्र बनाने का जो दुस्साहसी सपना देखा था, वह अब पूरी तरह चकनाचूर हो चुका है। भारत का लोकतंत्र लगातार सशक्त हो रहा है और इस खूनी विचारधारा की गहरी जड़ों को उखाड़ चुका है। जो माओवादी कभी गरीबों और जनजातियों का मसीहा बनने का नाटक करते थे, आज बस्तर की जनता उनका असली और अत्यंत खौफनाक चेहरा अच्छी तरह पहचान चुकी है। जल्द ही लाल आतंक का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट जाएगा।

नक्सलवाद : हिंसा पर पूर्णविराम

Topics: वामपंथी उग्रवादमाओवादलाल आतंकलाल गलियाराकंगारू कोर्टअमित शाहअबूझमाड़जनजातीय समाजझीरम घाटी हमलाआंतरिक सुरक्षाशहरी नक्सलनक्सलवादसलवा जुडूमबस्तरजनजातीय जन-आंदोलनपाञ्चजन्य विशेषशोभा मंडी
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