ब्रिटेन की साप्ताहिक पत्रिका “द इकोनॉमिस्ट” लंबे समय से वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर टिप्पणियां करती रही है, किंतु भारत के संदर्भ में उसके लेखन का एक विशिष्ट पैटर्न उभरता दिखाई देता है, जहां आलोचना कई बार विश्लेषण से आगे बढ़कर एक पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढांचे में ढलती नजर आती है। यानी एक खास नैरेटिव जिसके माध्यम से भारत को कमजोर एवं बदनाम किया जा सके। हाल ही में भारतीय फिल्म “धुरंधर: द रिवेंज” पर की गई समीक्षा इस प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण बनकर सामने आई है।
यह समीक्षा फिल्म की आलोचना तक सीमित रहती, तब भी ठीक होता, किंतु “द इकोनॉमिस्ट” ने जो सबसे घातक काम किया है, वह भारतीय दर्शकों की बौद्धिक क्षमता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। लेख का केंद्रीय तर्क है कि फिल्म की लोकप्रियता उसकी कथा-शक्ति के कारण नहीं है, यह तो “तेजतर्रार मोदी-समर्थक संदेशों” की प्रतिक्रिया है। दरअसल, एक तरह से कहें तो यह “द इकोनॉमिस्ट” के भारत के प्रति गहरे अंतर्निहित पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
आलोचना बनाम तिरस्कार
वैसे तो असहमति और बहस लोकतांत्रिक चेतना की आधारशिला हैं, परंतु यहां समस्या आलोचना के स्वर और निहितार्थों में है। जब आलोचना विश्लेषणात्मक होने के बजाय तिरस्कारपूर्ण हो जाती है, तब वह स्वयं आलोचना के दायरे में आ जाती है। वस्तुत: “धुरंधर” की समीक्षा में प्रयुक्त भाषा, जैसे फिल्म देखने के अनुभव को “नशे” जैसा बताना, दर्शकों के प्रति एक उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण को बार-बार प्रकट करना, यह बताते हुए कि भारतीय दर्शक जटिल कथाओं को समझने में सक्षम नहीं हैं और वे सिर्फ भावनात्मक या राजनीतिक उत्तेजना से प्रभावित होते हैं। एक तरह से प्रत्येक भारतवासी का अपमान करने का कार्य “द इकोनॉमिस्ट” यहां करता हुआ दिखता है।
यह धारणा कि भारतीय दर्शक कथा और प्रोपेगेंडा के बीच अंतर नहीं कर सकते, आज एक फिल्म तक सीमित टिप्पणी नहीं है। यह एक व्यापक सामान्यीकरण है, जोकि करोड़ों लोगों की लोकतांत्रिक समझ और बौद्धिक स्वायतता को कमतर आंकना है। “द इकोनॉमिस्ट” का पत्रकार यह भूल जाता है कि “भारत” दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां मतदाता राजनीतिक रूप से सजग हैं। यहां जनमत “गढ़ा” नहीं जाता, वह निरंतर बहस, मीडिया, सामाजिक संवाद और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से “निर्मित” होता है। ऐसे में यह कहना कि दर्शक किसी राजनीतिक संदेश के प्रभाव में फिल्म को सराहते हैं, वास्तविकता का अत्यधिक सरलीकरण है।
फिल्म की लोकप्रियता को प्रचार कहना अनुचित
दूसरी ओर फिल्म की लोकप्रियता को “प्रचार” कहकर खारिज करना उन ऐतिहासिक अनुभवों की अनदेखी भी है, जिसे हम भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा मानते हैं। 1999 का विमान अपहरण, 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई हमला, जैसी अनेक घटनाएं भारतवासियों के लिए सिर्फ समाचार होने तक सीमित नहीं हैं, ये घटनाएं उनके अपने परिवारों से जुड़ी हैं और राष्ट्रीय चेतना को झकझोर देने वाले अनुभव हैं।
कश्मीरी पंडितों का दर्द
इसी प्रकार कश्मीरी पंडितों का पलायन और आतंकवाद से जुड़ी पीड़ाएँ आज भी समाज में गहरे भावनात्मक प्रभाव छोड़ती हैं। जब सिनेमा इन विषयों को उठाता है, तब वह कहानी नहीं बता रहा होता है, वह तो उस समय में स्मृतियों, भावनाओं और पहचान के प्रश्नों को छूता है। यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है दोहरे मानदंडों का। जब पश्चिमी सिनेमा अपने इतिहास को पुनर्परिभाषित करता है या राष्ट्रीय शक्ति को महिमामंडित करता है, तब उसे वह “रचनात्मक स्वतंत्रता” कहकर संबोधित करता है। लेकिन वहीं जब भारतीय सिनेमा ऐसा करता है, तो उसे “प्रचार” का नाम दे दिया जाता है।
दरअसल, आज जिसे “प्रचार” कहा जा रहा है, वह भारतीय समाज का अपनी कथा पर अधिकार जताने का प्रयास है। लंबे समय तक भारतीय सिनेमा एक सीमित वैचारिक ढांचे में काम करता रहा, जिसे कभी “प्रचार” नहीं कहा गया, भले ही उसमें स्पष्ट पक्षपात मौजूद था। अंतर केवल इतना है कि अब कथा की दिशा बदल रही है। कश्मीर फाइल्स, केरल स्टोरी और धुरंधर जैसी फिल्में एक ऐसे भारत को प्रस्तुत करती हैं, जो अपनी कहानी स्वयं कहना चाहता है। समस्या फिल्म से नहीं, बल्कि कहना चाहिए उस आत्मविश्वास से है, जिसके साथ भारत वर्तमान में स्वयं को देख रहा है।
“द इकोनॉमिस्ट” का भारत को लेकर एक व्यापक पैटर्न
सही तथ्य यही है कि “द इकोनॉमिस्ट”, ब्रिटेन की प्रभावशाली साप्ताहिक पत्रिका, लंबे समय से भारत की आलोचना करती आई है, अक्सर भारत को ‘असहिष्णु’, ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ बताकर पश्चिमी कथित उदारवादी एजेंडे को बढ़ावा देती है। इसकी कवर स्टोरीज और संपादकीय भारत की लोकतांत्रिक प्रगति पर सवाल उठाते हैं, जबकि आर्थिक सुधारों की तारीफ के साथ-साथ हिंदुत्व को खतरा ठहराते हैं। “द इकोनॉमिस्ट” ने मोदी के उदय से भारत को बार-बार निशाना बनाया।
14 दिसंबर 2013
“वुड मोदी सेव इंडिया ऑर रेक इट?” कवर आया, जिसमें गुजरात दंगों को ‘ह्यूज स्टेन’ “बहुत बड़ा दाग” कहा और मोदी को ‘सेक्टेरियन हेट’ सांप्रदायिक घृणा या संप्रदाय के आधार पर नफरत से जोड़ा। पत्रिका ने चेतावनी दी कि हिंदू राष्ट्रवाद से ‘इनक्लूसिवनेस’ समावेशिता या सभी को साथ लेकर चलने की भावना खतरे में है।
5 अप्रैल 2014
“कैन एनीवन स्टॉप नरेंद्र मोदी?” संपादकीय में कहा गया कि मोदी ‘क्लीन’ हैं लेकिन 2002 दंगों पर जवाब न देने से ‘सेक्टेरियन हेट’ समुदाय आधारित नफरत से उन्हें जोड़ा। पत्रिका ने बीजेपी की जीत पर मोदी को पीएम न बनाने की सलाह दी। चुनाव के बाद 21 मई 2014 को “इंडियाज़ स्ट्रॉन्गमैन: हाउ मोदी कैन अनलीश इंडिया” में सुधारों की उम्मीद लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद की आशंका जताई। फरवरी 2015 को “इंडियाज चांस टू फ्लाई” में आर्थिक अवसर बताए लेकिन (ऑटोक्रेसी) निरंकुश शासन का डर दिखाया। मई 2015 स्पेशल रिपोर्ट “इंडियाज वन-मैन बैंड” में मोदी को ‘आरएसएस सदस्यों को कंट्रोल न कर पाने’ वाला बताया, धार्मिक असहमति फैलाने का आरोप भी लगाया गया।
जून 2017 कवर
“मोदीज इंडिया: द इल्यूजन ऑफ रिफॉर्म” ने सुधारों को ‘फ्लफ’ फालतू एवं बेकार सामग्री कहा, जीएसटी को जटिल ठहराया, उसकी भरसक आलोचना की। 28 फरवरी 2019 को “मोदीज़ डेंजरस मोमेंट” पुलवामा के बाद भारत-पाक तनाव पर, मोदी को सुधारों में फेल बताया, बेरोजगारी बढ़ने का उल्लेख अतिरंजित तरीके से तथ्यों से परे जाकर किया। वहीं मोदी के हिंदुत्व को ‘चौविनिस्टिक हिंदू नेशनलिज्म’ कहा। बाबरी विध्वंस से भाजपा वोटबैंक जोड़कर ‘पॉलीटिकल पॉइजन’ ठहराया।
23 जनवरी 2020
“इनटॉलरेंट इंडिया” कवर पर सीएए-एनआरसी, कश्मीर लॉकडाउन, गौरक्षा को ‘डिस्क्रिमिनेटरी’ (भेदभावपूर्ण) कहते हुए इस पर बिना सही तथ्यों के अपने ही तरीके से जूठ को सच मानते हुए छापा गया । हिंदुत्व को असहिष्णुता का स्रोत बताया गया, सीएए को ‘मुस्लिम-विरोधी’, कश्मीर को ‘कलेक्टिव पनिशमेंट’। कुल मिलाकर 2014 से 2020 तक के लेखों में आर्थिक सुधारों की आलोचनात्मक व्याख्या करते हुए “हिंदू राष्ट्रभाव” को एक स्थायी खतरे के रूप में चित्रित किया गया।
7 मार्च 2024
“व्हाट इज़ हिंदुत्व, द आइडियोलॉजी ऑफ इंडियाज़ रूलिंग पार्टी?” आर्टिकल में हिंदुत्व को ‘हिंदूनेस’ कहा, मोदी की विचारधारा बताते हुए भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने का आरोप लगाया गया। विनायक दामोदर सावरकर का उल्लेख कर इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ ठहराया।
5 जून 2024
चुनाव से ठीक पहले “द मोदी राज” पॉडकास्ट में आरएसएस को ‘यूरोपियन फासिस्ट मूवमेंट्स से इंस्पायर्ड’ कहा।
28 अगस्त 2024
“नरेंद्र मोदी फेसेज़ अ न्यू थ्रेट: हिज़ हिंदू-नेशनलिस्ट पैट्रन्स” में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा रिफ्ट पर, हिंदू राष्ट्रवाद को खतरा बताया। मोदी पर दबाव डालने वाला कहा। ये लेख भारत की आर्थिक सफलता (दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था) को नजरअंदाज कर राजनीतिक आलोचना पर केंद्रित रहा। हिंदुत्व पर प्रश्नचिह्न: आलोचना की तिथियाँ हिंदुत्व को द इकोनॉमिस्ट ‘हिंदू सुप्रीमेसी’ का पर्याय मानता है।
दिसंबर 2024 (19-26 दिसंबर)
हॉलिडे डबल इश्यू में अनाम आर्टिकल में संघ को ‘डिस्टॉर्टेड’ बताया, गोडसे को ‘एक्स-मेम्बर’ जोड़कर इसे लिखा गया। इसे ‘पैरामिलिट्री पपेटमास्टर’ कहा। 23 दिसंबर 2024 पॉडकास्ट “द आरएसएस: द मोस्ट पावरफुल वॉलंटियर ग्रुप यू हैव नेवर हर्ड ऑफ” में आरएसएस को ‘बॉयज क्लब’ से ‘हिंदू नेशनलिज्म ब्रिडिंग ग्राउंड’ कहा, मोदी के कंट्रोलर। ये लेख हिंदुत्व को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हैं, जबकि भारत की सांस्कृतिक एकता को नजरअंदाज करते हैं। इन लेखों के अलावा अन्य लेख भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को घेरने वाले समय-समय पर इसने प्रकाशित किए हैं।
पूर्वाग्रहों का पूरा पैटर्न, यहां हमें बार-बार भारत-विरोधी रूप में दिखाई देता है। आलोचना का स्वर भारत, यहां की सरकार एवं बहुसंख्यक हिन्दू समाज के प्रति समय के साथ अधिक नकारात्मक और एकरेखीय होता गया। 2024-26 के विभिन्न लेखों तक भी एक ही निरंतरता दिखाई देती है, जहां भारत को बार-बार एक ऐसे राष्ट्र के रूप में चित्रित किया जाता है, जोकि अपनी ही लोकतांत्रिक संरचना के लिए खतरा बन रहा है। इन लेखों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका और हिंदुत्व की अवधारणा को विशेष रूप से निशाना बनाया गया है।
हिंदुत्व के प्रति पूर्वाग्रह
पत्रिका “द इकोनॉमिस्ट” द्वारा “हिंदुत्व” को अक्सर “हिंदू श्रेष्ठता” के नाम पर नकारात्मक अर्थों के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जबकि ऐतिहासिक रूप से प्रतिपादित हिन्दुत्व की अवधारणा बहुत व्यापक, पवित्र और बहुआयामी है। इसे “द इकोनॉमिस्ट” द्वारा सिर्फ राजनीतिक वर्चस्व के उपकरण के रूप में प्रस्तुत करना भारतीय समाज की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक संदर्भों को सीमित करते हुए उसका अपमान करता है।
इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संदर्भ में प्रयुक्त शब्दावली; जैसे “पैरामिलिट्री” या “फासिस्ट प्रेरित” भी “द इकोनॉमिस्ट” के एक खास नजरिए को रेखांकित करता है और बताता है कि ये पत्रकारिता के पवित्र दृष्टिकोण को नजरअंदाज करके एक खास नैरेटिव को खड़ा करने का काम कर रही है। ये हर बार अपने लेखों में आरएसएस की सामाजिक, शैक्षिक और सेवा गतिविधियों को नजरअंदाज करती है और भारतीय संदर्भ को यूरोपीय ऐतिहासिक अनुभवों के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति को भी उजागर करना है।
इस पत्रिका “द इकोनॉमिस्ट” का एक और महत्वपूर्ण पहलू चयनात्मकता है। भारत की आर्थिक प्रगति, जोकि पिछले वर्षों में विश्व में सबसे तेज रही है; उसकी डिजिटल अवसंरचना, जिसने करोड़ों लोगों को वित्तीय और सामाजिक रूप से सशक्त बनाया और उसकी वैश्विक भूमिका, दरअसल इन पहलुओं को अपेक्षाकृत छूआ ही नहीं गया, यदि कहीं महत्व दिया भी गया तो वह इतना कम है कि दिखाई ही नहीं देता और अपने व्यापक अर्थ प्रकट नहीं करता।
भारत को हमेशा संकटग्रस्त लोकतंत्र बताया
हर बार के अंक में जब भी ये भारत के संदर्भ में बात करती है, सिर्फ राजनीतिक विवादों को व्यापक नैरेटिव के रूप में प्रस्तुत करने का काम करती हुई ये पत्रिका दिखती है। यहां हमेशा ही भारत को एक “संकटग्रस्त लोकतंत्र” के रूप में चित्रित किया जा रहा है। हालांकि, यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि प्रश्न उठाना भी है। किंतु जब आलोचना बार-बार एक खास दिशा में झुकी हुई दिखाई दे, जब उसमें जटिलता के बजाय सरलीकरण अधिक होता है और जब वह पूरे समाज की बौद्धिक क्षमता पर प्रश्न उठाने लगे, तब उस आलोचना की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है।
वस्तुत: वर्तमान संदर्भ में यह “धुरंधर” फिल्म की समीक्षा का मामला नहीं है। यह उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है, जिसमें भारत को देखने का एक विशेष पश्चिमी दृष्टिकोण बार-बार सामने आता है। ऐसे में कहना यही होगा कि भारत आज एक तेजी से बदलता हुआ, आत्मविश्वासी और बहुआयामी समाज है। उसकी कहानी को किसी एक वैचारिक फ्रेम में सीमित करना उसकी वास्तविक शक्ति, उसकी विविधता और लोकतांत्रिक चेतना की अनदेखी करना है।
















