पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित होने से पहले ही कांग्रेस ने अपनी मंशा व्यक्त कर दिया कि वह आगामी बंगाल विधान सभा चुनाव में सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में है। कांग्रेस पार्टी लगभग बीस वर्ष बाद सभी सीटों पर चुनाव मैदान में उतर रही है। इससे पहले 2006 में कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 262 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। 2026 में यह पार्टी एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी है, जो अकेले चुनाव मैदान में उतर रही है। इस पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपने सहयोगी वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन के लिए प्रयास नहीं किया है। इसके कई कारण और दबाव हो सकते हैं।
अपमान का बदला
दरअसल, पश्चिम बंगाल में ‘इंडी’ गठबंधन में एका नहीं हो पाया है इसलिए सभी दल अपनी-अपनी डफली और अपने-अपने राग अलापने में जुटे हुए हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि वहां की विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का एक भी विधायक नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने 2023 में मुर्शिदाबाद जिले की सागरदिघी विधानसभा सीट पर उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को हराकर विधानसभा में प्रवेश करने में सफलता प्राप्त की थी। लेकिन ममता बनर्जी ने बिना देर किए कांग्रेस पार्टी के एकलौते विधायक बायरन बिस्वास को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। और फिर से कांग्रेस पार्टी विधानसभा में शून्य पर आ गई। ममता बनर्जी के द्वारा किए गए इस अपमान का बदला लेने के लिए कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपनी क्षमता के अनुरूप चुनाव मैदान में उतर रही है।
जोर का झटका, मगर धीरे से
इसके अलावा, कांग्रेस पिछले वर्ष 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के द्वारा किए गए अपमान का बदला लेना चाहती है। क्योंकि उस समय ममता बनर्जी ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया था। यह कांग्रेस के लिए असहनीय पीड़ा की स्थिति थी। कांग्रेस पार्टी यह उम्मीद कर रही थी कि ममता बनर्जी अगर उनका समर्थन नहीं करेंगी तो आम अदमी पार्टी को भी समर्थन नहीं देंगी। और तो और ममता बनर्जी की नकल करते हुए, अखिलेश यादव ने भी अपना समर्थन आम आदमी पार्टी को दे दिया था। ममता बनर्जी और अखिलेश यादव का यह कदम सीधे तौर पर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को चुनौती थी। ममता और अखिलेश का यह कदम कांग्रेस के लिए जोर का झटका ही था।
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस 2025 के दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी और नई दिल्ली विधानसभा सीट पर अरविंद केजरीवाल की हार से काफी खुश हुई थी, क्योंकि अप्रत्यक्ष तौर पर यह अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की हार थी। ममता बनर्जी की पार्टी के दो लोकसभा सांसदों कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा का इस सीट से लगाव रहा है। 1993 में जब इस सीट का नाम गोल मार्केट था, कीर्ति आजाद ने इस सीट से जीत दर्ज की थी। अगले दो विधानसभा चुनाव में कीर्ति आजाद पत्नी पूनम आजाद इस सीट से उम्मीदवार थी। 1992 में नई दिल्ली लोकसभा सीट के उपचुनाव में शत्रुघ्न सिन्हा ने कांग्रेस पार्टी के राजेश खन्ना को टक्कर दी थी। नई दिल्ली लोक सभा में ही गोल मार्केट विधान सभा क्षेत्र है। अतएव तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नेताओं की इस सीट पर अच्छी पकड़ थी और ममता बनर्जी के समर्थन के बावजूद अरविंद केजरीवाल की हार को कांग्रेस पार्टी ने अंदर ही अंदर ममता बनर्जी की भी हार माना था। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि कांग्रेस पार्टी बायरन बिस्वास प्रकरण और दिल्ली विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी द्वारा आम आदमी पार्टी के समर्थन का बदला किस तरह से लेती है।
मुसलमान वोटरों का सहारा
कांग्रेस पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में अपने प्रदर्शन से खुश है और उसी के आधार पर वह अपने बल पर चुनावी समर में उतर रही है। कांग्रेस पार्टी 2024 के लोकसभा के चुनाव में 11 विधानसभा सीटों पर प्रथम पायदान पर थी। ये सीटें मुख्यतः मुसलमान बाहुल्य इलाकों में हैं। कांग्रेस पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर दिनाजपुर जिले की चाकुलिया, मालदा जिले की चांचल, हरीशचंद्रपुर, मालतीपुर, रतुआ मोथाबाड़ी, सुजापुर, मुर्शिदाबाद जिले की लालगोला और बहरामपुर सीटों पर प्रथम पायदान पर रही। वहीं 14 सीटों पर दूसरे पायदान पर रही थी। कांग्रेस पार्टी के आंतरिक सूत्रों के अनुसार पार्टी इन 25 सीटों को अपना मुख्य आधार मानकर चुनावी तैयारी कर रही है और कांग्रेस पार्टी इस बार अपने दम पर राज्य विधानसभा में अपना खाता खोलने को आतुर है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी का वाम दलों के साथ गठबंधन का संतोषप्रद अनुभव नहीं रहा है और 2021 में वाम दलों के साथ गठबंधन करने के बाद भी पश्चिम बंगाल में उसे उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली।
प्रवासी पक्षी हैं राहुल
पिछले कुछ सालों में, कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों के हाथों अपनी राजनीतिक जमीन खो रही है। कई राज्यों में क्षेत्रीय दल कांग्रेस की कीमत पर ही आगे बढ़े हैं। इस पुरानी पार्टी द्वारा अपनी राजनीतिक वजूद वापस पाने की किसी भी कोशिश का इन क्षेत्रीय दलों द्वारा जमकर विरोध होता है, जिससे टकराव की स्थिति पैदा होती है। यही विरोधाभास ‘इंडी’ गठबंधन की दिक्कतों की जड़ है, जिसका सामना कांग्रेस को बंगाल में करना पड़ रहा है।
ज्ञातव्य है कि पिछले चुनाव प्रचार के समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राहुल गांधी को ‘प्रवासी पक्षी‘ कह कर ताना मारा था। उनका आरोप था कि ये लोग केवल चुनाव के समय ही पश्चिम बंगाल में दिखाई देते हैं। और इनका ध्यान सिर्फ फोटो खिंचवाने पर होता है।
‘एकला चलो‘ का सुर
पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ना कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि वह पिछले 5 साल से राज्य विधानसभा में अपनी आवाज खो चुकी है, अब उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। क्या राहुल और प्रियंका गांधी का नेतृत्व बंगाल में जमीनी स्तर पर एक नई शुरुआत करने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भर पाता है? आश्चर्य तो इस बात का है कि 2021 के विधान सभा चुनाव में 294 सीटों पर मिली करारी हार और 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली असफलता के बाद भी, कांग्रेस नेतृत्व ने अकेले चुनाव में उतरने का निर्णय लिया है। कांग्रेस का वोट प्रतिशत 12.25 से मात्र 3.03 रह गया है।
वास्तव में, पश्चिम बंगाल में सभी ‘एकला चलो‘ के एक सूत्री कार्यक्रम का पालन करने में जुटे हुए हैं। वैसे भी बंगाल कांग्रेस के भीतर अभी तो निराशा का ही माहौल है, क्योंकि बंगाल के हितों के बारे में हाईकमान कभी विचार ही नहीं करता। ऐसे में समय का पंछी किस डाल पर बैठेगा, यह तो जैस-जैसे चुनाव प्रचार की सरगरमी बढ़ेगी वैसे -वैसे दृश्य स्पष्ट होगा।
घटती लोकप्रियता, दरकता जनाधार
पिछले दिनों राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को गहरा धक्का लगा है। बिहार में कांग्रेस पार्टी के आधे विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया है। साथ ही ओडिशा में भी कांग्रेस पार्टी के तीन विधायकों ने पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान किया। यह कांग्रेस पार्टी की घटती राजनीतिक रसूख का स्पष्ट द्योतक है। यह दर्शाता है कि कांग्रेस पार्टी से अब सिर्फ जनता ही नहीं, बल्कि अब उसके निर्वाचित जन प्रतिनिधि भी दूरी बनाने लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अवसरों पर आगाह किया है कि कांग्रेस पार्टी में एक और भी विभाजन हो सकता है। अब पार्टी उसी दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है।
कांग्रेस पार्टी की बिहार और अन्य राज्यों में ऐसी बुरी स्थिति उसकी नेतृत्व क्षमता में कमी के कारण देखने को मिल रही है। वर्तमान में बिहार विधानसभा में कांग्रेस के छह विधायक हैं, लेकिन पार्टी ने किसी भी विधायक को दल का नेता, उपनेता या सचेतक नियुक्त नहीं किया है। बिहार में कांग्रेस पार्टी की संगत का असर उसके सहयोगी राजद पर भी दिखने लगा है। उसके भी एक विधायक फैसल रहमान ने अपने ही पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार अमरेन्द्रधारी सिंह के लिए मतदान करने से दूरी बना ली। कांग्रेस पार्टी के तीन विधायक वाल्मीकि नगर के सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा, फारबिसगंज के मनोज विश्वास और मनिहारी के मनोहर प्रसाद सिंह ने राज्यसभा चुनाव में मतदान में ही हिस्सा नहीं लिया।य
सच तो यह है कि ओडिशा में कांग्रेस पार्टी की स्थिति और भी दयनीय है। वहां पार्टी के तीन विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करके भाजपा समर्थित उम्मीदवार दिलीप रे के पक्ष में वोट दिया। कांग्रेस पार्टी के साथ ही बीजू जनता दल के आठ विधायकों ने अपनी पार्टी के व्हिप को छोड़कर भाजपा समर्थित दिलीप रे के पक्ष में मतदान किया है। विदित हो कि राज्यसभा चुनाव में ओडिशा में कांग्रेस पार्टी और बीजद का गठबंधन था। हरियाणा में भी कई कांग्रेस विधायकों ने पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान किया। आखिर कांग्रेस पार्टी को यह सोचने की जरूरत है कि केवल उसी के विधायक क्यों पार्टी छोड़ रहे हैं! दरअसल, यह समय कांग्रेस पार्टी के लिए आत्ममंथन का है।
कांग्रेस पार्टी का दिन प्रति दिन राजनीतिक ह्रास तेजी से होता जा रहा है। 2023 में मेघालय विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पांच सीटों पर चुनाव जीतने में सफल हुई थी। लेकिन उसके चार विधायक पार्टी को छोड़कर सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी में शामिल हो गए थे। वहीं एक विधायक सालेंग संगमा के सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में उनकी सीट भी नेशनल पीपुल्स पार्टी जीत गई और कांग्रेस पार्टी मेघालय विधानसभा में शून्य पर सिमट गई।
एक समय मेघालय कांग्रेस पार्टी का गढ़ हुआ करता था। गोवा में 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के 11 विधायक निर्वाचित हुए थे। लेकिन 8 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है। कई अन्य राज्यों में भी कांग्रेस पार्टी के विधायकों का पार्टी से मोहभंग होने और पार्टी के टूटने की खबर समय-समय पर मिलती रहती है। कांग्रेस पार्टी का वर्तमान में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी विधायक नहीं है।
पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, नागालैंड, मेघालय और सिक्किम में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है। और तो और कांग्रेस पार्टी का उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भी कोई सदस्य नहीं है। इसलिए राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चलती ही रहती है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही है।
















