पश्चिम बंगाल : कठिन होतीं ममता की राहें
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पश्चिम बंगाल : कठिन होतीं ममता की राहें

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीतिक शिष्टाचार और मर्यादा को लांघ रही हैं। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'घुसपैठिया' कहती हैं, तो कभी चुनाव आयोग पर आरोप लगाती हैं। कहा जा रहा है कि उनकी इन हरकतों से बंगाल का भद्र—लोक उनसे नाराज हो रहा है। यह नाराजगी बढ़ती रही तो विश्वास मानिए इस बार ममता इतिहास के पन्रों में सिमट सकती हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 30, 2026, 03:16 pm IST
in भारत, विश्लेषण, पश्चिम बंगाल

वातावरण में जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, वैसे-वैसे पश्चिम बंगाल में राजनीतिक पारा भी चढ़ रहा है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने अपने लगभग सभी प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही वाममोर्चा ने भी करीब 200 उम्मीदवारों को उतार दिया है। इस बीच तृणमूल से निकले हुमायूं कबीर, जो बाबर के नाम पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनवा रहे हैं, ने हैदराबाद वाले असदुद्दीन ओवैसी से हाथ मिला लिया है। हुमायूं ने तृणमूल से अलग होकर ‘जनता उन्नयन पार्टी’ बनाई है। यानी जनता उन्नयन पार्टी और एआईएमआईएम में गठबंधन हो गया है। जनता उन्नयन पार्टी ने खुद 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। 25 मार्च को कोलकाता में असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर ने प्रेस को संबोधित किया। इस अवसर पर ओवैसी ने कहा कि वे असली ‘एम’ वाले हैं। इसका मतलब यह है कि वे मुसलमानों के नेता हैं। इस बयान में ओवैसी की सोच झलकती है। ओवैसी और हुमायूं ने ममता बनर्जी को जम कर कोसा। इसका एक ही उद्देश्य है मुसलमान मतदाताओं को ममता से दूर करना। चुनावी पंडित मान रहे हैं कि ओवैसी और हुमायूं मुसलमान मतदाताओं को बांटने में सफल रहे, तो इस बार ममता के लिए राह बहुत मुश्किल हो सकती है।

इसका भान ममता को अच्छी तरह है। मुश्किल होती राह से ममता बेहद परेशान हैं। परेशानी को कुछ कम करने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री पद को छोड़कर 23 सरकारी संस्थानों से इस्तीफा दे दिया है। अब वह पूरी तरह चुनाव प्रचार में लग गई हैं। इस दौरान वे कभी-कभी राजनीतिक शिष्टाचार और मर्यादा भी भूल जाती हैं। भाजपा और उसके नेताओं के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं।
वहीं दूसरी ओर भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। वैचारिक और रणनीतिक दृष्टि से, पार्टी बंगाल को एक महत्वपूर्ण मोर्चे के रूप में देखती है। राज्य में भाजपा का उदय उल्लेखनीय रहा है। 2011 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को केवल 4 प्रतिशत वोट मिले थे और उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। अब यह टीएमसी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरी है। यानी कि कांग्रेस और वाममोर्चे को उसने काफी पीछे धकेल दिया है। अब इस राज्य की कहानी भाजपा बनाम तृणमूल है।

हाल में एक रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, ”हालांकि भाजपा और उसके सहयोगी 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान होगी।”

2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से राज्य और उसकी राजनीति में काफी उथल-पुथल मची हुई है। तब भाजपा ने 42 में से 18 सीटें जीतकर 40.64 प्रतिशत वोट के साथ केंद्रीय सत्ता में वापसी की थी। इसी वजह से 2021 के विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गए थे, पर टीएमसी ने 294 में से 215 सीटें जीतकर 48.02 प्रतिशत मत हासिल किए। हालांकि भाजपा को सिर्फ 77 सीटें मिलीं, लेकिन उसका मत प्रतिशत 37.97 हो गया। राज्य में वह दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। पर क्या यह पर्याप्त है?

इस बार तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम सीट पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है, जहां पिछली बार ममता बनर्जी को हार का मुंह देखना पड़ा था। उम्मीदवारों की सूची जारी होने से ठीक पहले पार्टी ने भाजपा से पबित्र कर को तोड़ कर अपने साथ जोड़ लिया। पबित्र कर को नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी के मुकाबले टीएमसी का उम्मीदवार बनाया गया है। विश्लेषकों के अनुसार, पबित्र कर का चयन सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। कर पहले सुवेंदु के करीबी माने जाते थे और इलाके में उनकी अच्छी पकड़ है।

पूर्वी मिदनापुर जिला, खासकर नंदीग्राम, लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का गढ़ रहा, लेकिन 2021 के बाद से यहां भाजपा का प्रभाव बढ़ा है। 2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम सीट पर बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिली थी, जहां सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया था। बाद में ममता बनर्जी ने भवानीपुर सीट से उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री पद बरकरार रखा। इस बार सुवेंदु अधिकारी, नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं।

कोलकाता और हावड़ा से सटे शहरी क्षेत्र, दक्षिण और उत्तर 24 परगना के कुछ हिस्से और ‘राढ़ बंगला’ क्षेत्र में आने वाले इलाके, जैसे पूर्वी बर्धमान, बीरभूम, हुगली और पश्चिम बर्धमान का औद्योगिक क्षेत्र, टीएमसी के गढ़ माने जाते हैं। 2024 में टीएमसी ने इन क्षेत्रों में आने वाली सभी 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की, जबकि 2021 में पार्टी ने 140 विधानसभा सीटों में से 100 से अधिक सीटें जीतीं। भाजपा को उम्मीद है कि वह इनमें से कुछ सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएगी, जिसमें गैर-बांग्लाभाषी लोगों तक पहुंचना भी शामिल है। भाजपा के एक नेता ने दावा किया, ‘आरजी कर बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार हमें मतदाताओं को लामबंद करने में मदद करेंगे। हमें उम्मीद है कि इससे हमें टीएमसी को हराने में मदद मिलेगी। अगर मतदाताओं को स्वतंत्र रूप से मतदान करने दिया गया, तो टीएमसी नहीं जीतेगी। इस बार तो मुसलमान भी टीएमसी से खुश नहीं हैं।’

‘पश्चिम बंगाल में कमल का खिलना निश्चित’

कोलकाता में नितिन नवीन का स्वागत करते भाजपा नेता

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने 25 मार्च को कोलकाता में कहा कि पश्चिम बंगाल के लोग टीएमसी सरकार के भ्रष्टाचार, वसूली, भय और अराजकता के माहौल से मुक्ति चाहते हैं। भाजपा ही सुरक्षा, रोजगार और सम्मान सुनिश्चित कर सकती है। भाजपा के कमल का निशान पश्चिम बंगाल को विकास, सुरक्षा और ‘सोनार बंगाल’ की दिशा में आगे ले जाने का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भाजपा की ताकत उसके समर्पित कार्यकर्ता हैं, जो ‘राष्ट्र प्रथम’ के भाव से काम करते हैं। पार्टी के कार्यकर्ता मेहनत और परिश्रम के साथ हर बूथ तक पहुंचेंगे और 4 मई को राज्य में भाजपा की सरकार बनाएंगे।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भाजपा के बूथ स्तर के कार्यकर्ता एक-एक बूथ की संरचना खड़ी करने में जुटे हैं और पिछले चार-पांच वर्ष में विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पश्चिम बंगाल में संगठन को मजबूत किया है, वह अत्यंत सराहनीय है। भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा की गई मेहनत अब रंग ला रही है और आज जनता उनके साथ खड़ी है। पश्चिम बंगाल का एक-एक व्यक्ति इस परिवर्तन की लहर में कार्यकर्ताओं के साथ खड़ा होकर संघर्ष करने के लिए तैयार है। 4 मई को पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने जा रही है और इस संकल्प को लेकर सभी को आगे बढ़ना है। कुछ दिन पहले एक होली मनाई गई थी और अब 4 मई को भगवा होली मनाई जाएगी।

चुनावी आंकड़े

2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने 215 सीटें जीती थीं। उसके बाद हुए 2024 के लोकसभा चुनावों में उसने 192 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। सच यह भी है कि 2011 में सत्ता में आने के बाद से तृणमूल हर विधानसभा चुनाव में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने में सफल रही है। 2011 में उसकी सीटें 184 से बढ़कर 2021 में 215 हो गईं, जो 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए ज़रूरी 148 सीटों से कहीं अधिक है। 2019 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल को झटका लगा जब भाजपा ने 42 में से 18 सीटें जीतीं। उस चुनाव में तृणमूल को 22 सीटें मिलीं, लेकिन उसने 2024 के चुनावों में 29 लोकसभा सीटें जीतकर वापसी की। उस चुनाव में भाजपा को 12 सीटें मिलीं। अलबत्ता तृणमूल 2014 के लोकसभा चुनावों के रिकॉर्ड 34 सीटों से इन दोनों चुनावों में पीछे रही है।
इसका अर्थ है कि भाजपा ने उसके जनाधार को कमजोर जरूर किया है, पर निर्णायक विजय हासिल नहीं की है। उसकी सफलता लोकसभा चुनावों में ज्यादा उल्लेखनीय रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों के विश्लेषण से पता लगता है कि 2021 के विधानसभा चुनावों की तुलना में तृणमूल के प्रदर्शन में गिरावट आई है। 2024 में टीएमसी ने 192 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की, जबकि भाजपा ने 90 सीटों पर। कांग्रेस ने 11 सीटों पर और माकपा ने एक सीट पर बढ़त बनाई। ये आंकड़े लोकसभा चुनाव के हैं, जिसमें मतदाताओं का नजरिया अलग होता है। फिर भी इससे भाजपा के बढ़ते प्रभाव की पुष्टि होती है। लोकसभा चुनाव में टीएमसी को 45.8 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 38.7 प्रतिशत। इस बार चुनाव में कांग्रेस-वाम गठबंधन नहीं है।

खुला सरकारी खजाना

भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता, कांग्रेस-वाम गठबंधन का न होना और ओवैसी-हुमायूं की दोस्ती ने ममता बनर्जी की राहें मुश्किल कर दी हैं। तिस पर ममता को सत्ता विरोधी लहर भी सता रही है। इस लहर को खत्म करने के लिए ममता ने सरकारी खजाना खोल दिया है। इस समय पश्चिम बंगाल में सामान्य श्रेणी की महिला को 1,000 रु. प्रति माह, एससी और एसटी को 1,200 रु. प्रतिमाह मिलते हैं। अब इस धनराशि में चुनाव के बाद 500 रुपए और बढ़ाने का वादा किया है। चुनाव के बाद सभी के लिए पक्के घर समेत अन्य सुविधाएं देने का भी वादा है। महिला मतदाताओं को साधने और उन्हें अपनी तरफ एकजुट करने के लिए ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजना का पैसा बढ़ाया गया, बेरोज़गार युवाओं के लिए ‘बांग्लार युवा साथी’ के तहत प्रति माह 1,500 रु. की वित्तीय सहायता, राज्य के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते का भुगतान करना, पुरोहितों और मुअज्जिनों के मानदेय में बढ़ोतरी करने जैसे कदम उठाना उनके तरकश के तीर हैं।

भाजपा के मुद्दे

वहीं भाजपा बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ, हिंदुओं के विरुद्ध हो रहे हमलों, भारत-बांग्लादेश की सीमा पर तारबंदी न होने देने जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ममता बनर्जी पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे घुसपैठियों को बचाने के लिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विरोध कर रही हैं। इस आरोप में दम भी है। इस कार्य को राकेने के लिए ममता बनर्जी खुद सर्वोच्च न्यायालय तक आईं, लेकिन न्यायालय में उनकी मंशा पूरी नहीं हुई। इससे वह और बौखला गई हैं। इस बौखलाहट में उन्होंने नरेंद्र मोदी को ही ‘घुसपैठिया’ कह दिया है। इस तरह की ‘शब्दावली’ ममता पर भारी पड़ सकती है। जोर-जोर से बोल कर और भाजपा के नेताओं के लिए अपशब्द कह कर ममता बनर्जी अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश दे रही हैं कि ‘चिंता की कोई बात’ नहीं है-लड़ेंगे और जीतेंगे। लेकिन हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी ने हाथ मिलाकर ममता के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। भले ही फरहाद हाकिम जैसे नेता ममता के लिए ‘तारणहार’ बनने की कोशिश करें, लेकिन उन्हें भी डर लग रहा है कि यदि मुसलमान मतदाता बंटे तो भाजपा को रोकना आसान नहीं होगा।

आस्तिक होते वामपंथी

जो वामपंथी अपने को नास्तिक और धर्म को ‘अफीम’ मानते थे, वे अब धर्म की शरण ले रहे हैं, पूजा-अनुष्ठान कर रहे हैं, मंदिर-मंदिर भटक रहे हैं। हाल ही में माकपा की युवा नेता मीनाक्षी मुखर्जी ने हुगली जिले के उत्तरपाड़ा में चुनाव प्रचार के दौरान एक धार्मिक कार्यक्रम में भाग लिया। उसका आयोजन मारवाड़ी समुदाय ने किया था। उस दौरान उन्होंने मंत्रोच्चार के बीच हवन में आहुति भी डाली। इससे पहले उन्होंने ईद के दौरान मुसलमानों को मुबारकबाद दी थी। ऐसे ही पानीहाटी से माकपा उम्मीदवार कलतान दासगुप्ता ने श्री चैतन्य देव के मंदिर में पूजा-अर्चना कर अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की।

इससे पहले माकपा का कोई नेता ऐसा करता था तो हंगामा मच जाता था। उसे कारण बताओ नोटिस तक दे दिया जाता था। एक बार वरिष्ठ माकपा नेता सुभाष चक्रवर्ती तारापीठ मंदिर गए। उनसे कई तरह के सवाल पूछे गए थे। हालांकि माकपा अपने मुस्लिम नेताओं को कभी भी मस्जिद जाने से नहीं रोक पाई। माकपा के मुसलमान नेता नमाज के वक्त बैठक छोड़कर मस्जिद जाते रहे हैं। एक बार माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर रज्जाक मोल्ला हज यात्रा पर गए। इसको लेकर माकपा में बहस छिड़ गई। इसके बाद मोल्ला ने साफ कहा था, ‘पहले मोहम्मद, फिर मा‌र्क्स।’ उनके इस बयान के बाद बहस बंद हो गई थी।

लगभग साढ़े तीन दशक तक पश्चिम बंगाल में राज करने वाले वाममोर्चा की हालत इतनी पतली है कि वर्तमान विधानसभा में उसका एक भी सदस्य नहीं है। वाममोर्चा का नेतृत्व माकपा करती रही है। इस समय पश्चिम बंगाल से लोकसभा और राज्यसभा में भी माकपा का कोई सदस्य नहीं है। शायद यही कारण है कि माकपा के नेता पार्टी के मूल सिंद्धांत को छोड़कर मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं।

Topics: सीमा तारबंदीआरजी कर कांडहुमायूं कबीरभाजपा बनाम तृणमूलपश्चिम बंगाल चुनाव 2026मुस्लिम मतों का बंटवाराममता बनर्जीओवैसी-हुमायूं गठबंधनअसदुद्दीन ओवैसीलक्ष्मी भंडार योजनाहिंदू उत्पीड़ननंदीग्राम का संग्रामपाञ्चजन्य विशेषपबित्र करसुवेंदु अधिकारीअमित शाह बांग्लादेशी घुसपैठराजनीतिक समीकरण
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