पिछले सात दशक के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो साफ दिखाई पड़ता है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाम राजनीति और राजनीति के मायने हिंसा हो गए हैं। 2011 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त जीत दिलाकर जब ममता बनर्जी सत्ता के रथ पर सवार हुई थीं, तब उनका ध्येय-वाक्य था ‘पोरिबोर्तोन।’ आज भारतीय जनता पार्टी का भी यही ध्येय-वाक्य है।
इस बार ममता भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ रही हैं। उनके मुकाबले भाजपा के सुवेंदु अधिकारी खड़े हैं, जिन्होंने 2021 में उन्हें नंदीग्राम में अपमानजनक हार दी थी। इस वर्ष रमजान और नवरात्र एक साथ थे। दोनों प्रत्याशियों ने अपने अभियान की शुरुआत अपने-अपने सांकेतिक तरीकों से की। ममता बनर्जी कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फितर की नमाज में शामिल हुईं, और सुवेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर गए।

ममता बनर्जी ने अपने 15 साल के कार्यकाल में पहले से चली आ रही कुछ बातों को अपनाया और कुछ का आविष्कार किया। उनकी राजनीति की शुरुआत शहरों से हुई थी। बंगाल के शहरों में रहने वाला मध्य वर्ग, वामपंथी राजनीति से आजिज आ गया था। इस बार वही मध्य वर्ग ममता से नाराज नजर आता है। क्या गांवों में भी यही स्थिति है? यदि इसमें सचाई है तो यह ममता के लिए खतरे की घंटी है।
ममता की हालत को देखते हुए लोग पूछ रहे हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी, राज्य में एक और बड़े परिवर्तन की सूत्रधार बनेगी? क्या परिस्थितियां 2011 जैसी हैं? वामपंथी दलों के 34 साल के शासन की अभेद्य नजर आने वाली दीवार को ममता ने तोड़ा था। अब ममता के शासन के भी 15 साल हो रहे हैं। क्या उनकी विदाई होगी? क्या ऐसा संभव है?
हिंसक राजनीति
देश में आधुनिक राजनीतिक-प्रशासनिक और शैक्षिक संस्थाओं का सबसे पहले जन्म बंगाल में हुआ, पर आज अनेक गलत कारण राज्य की पहचान बन गए हैं। वस्तुतः इनकी नींव वामपंथी सरकार के दौर में ही पड़ गई थी, पर ममता-राज में उन्हीं बातों को विस्तार पाने का मौका मिला। साठ और सत्तर के दशक में इसी बंगाल के नक्सलबाड़ी ने देश का ध्यान खींचा था। उसके केंद्र में हिंसा थी।
आज भी राज्य की राजनीति के केंद्र में हिंसा है। वर्तमान हिंसा की जड़ों में उस वामपंथी हिंसा की क्रिया-प्रतिक्रियाएं ही हैं। ममता बनर्जी स्वयं हिंसा के इस पुष्पक विमान पर सवार होकर आई थीं, जिसकी मदद से उन्होंने माकपा की हिंसा पर काबू पाने में सफलता प्राप्त की थी। अब ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा ही उनका राजनीतिक संबल बनी है। ममता की खासियत है कि वे आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं हटतीं। गलत को और ज्यादा जोर देकर सच साबित करने की कोशिश में लग जाती हैं। ममता की हिंसा का आगाज माकपा के राज में सिंगुर के आंदोलन में हुआ था। माकपा ने राज्य की बुनियादी समस्याओं के समाधान की दिशा में औद्योगीकरण का जो रास्ता खोजा था, ममता बनर्जी ने उसके छिद्रों के सहारे सत्ता के गलियारों में प्रवेश किया। पर अब उनके सहयोगी भी मानते हैं कि उस आंदोलन के कारण उद्योग जगत में बंगाल की नकारात्मक छवि बन गई। पश्चिम बंगाल की इस हिंसा पर शोध कर रहे सुजात भद्र के अनुसार, “भारत में सबसे ज्यादा राजनीतिक हिंसा की घटनाएं अगर कहीं हुई हैं, तो वह बंगाल है। इस हिंसा के पीछे तीन बड़ी वजहें मानी जा रही हैं- बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था पर सत्ताधारी दल का वर्चस्व और नई राजनीतिक शक्तियों का प्रवेश।”
कट्टरवादियों का साथ
यहां की वामपंथी सरकारें तमाम सैद्धांतिक बातें करती रहीं, पर उन्होंने नौजवानों को रोजगार दिलाने के रास्ते नहीं खोजे। ममता बनर्जी तकरीबन वैसी ही राजनीति लेकर सामने आईं, जैसी वामपंथी सरकारें चला रही थीं। इस राजनीति में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को भी उन्होंने अपने साथ जोड़ लिया। मुसलमानों के मन में डर पैदा करने की मनोवृत्ति इसका बड़ा कारण है। पिछले साल वक्फ बोर्ड से जुड़े कानून में संशोधन को लेकर हुई हिंसा ने इस बात को साबित किया। केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा था, जिसे संसद ने अप्रैल की शुरुआत में पारित कर दिया था। इस कानून की पेशबंदी में हुई हिंसा बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों मे, जिनमें मुर्शिदाबाद भी शामिल था, सबसे तीव्र रही। सोशल मीडिया के ज़रिए फैलाई गई गलत सूचनाओं और भड़काऊ संदेशों ने विरोध प्रदर्शनों को हवा दी। इसके अलावा भी राज्य में हाल में हुई राजनीतिक और सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। 2023 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी व्यापक हिंसा देखी गई, जिसमें चुनाव संबंधी झड़पों से जुड़ी मौतों की संख्या 48 से 55 के बीच बताई गई। मतपेटियों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर हुईं।
ध्रुवीकरण और ममता
राज्य की 10 करोड़ से अधिक आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 30 प्रतिशत है, जिनका काफी बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी का समर्थक है। राज्य में 294 में से 85-126 सीटें ऐसी हैं, जिन पर हार-जीत का निर्धारण मुस्लिम मत तय करते हैं। 2021 में ऐसी 85 सीटों में से 75 सीटें ममता के पाले में आई थीं। हालांकि भारतीय जनता पार्टी को ध्रुवीकरण का दोष दिया जाता है, पर बंगाल में ध्रुवीकरण तृणमूल के लिए लाभकारी है। इसकी वजह से कांग्रेस और वामपंथी दल हाशिए पर चले गए हैं, जिन्हें पहले मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलता था। लंबे समय तक भाजपा बंगाल की राजनीति में प्रभावी शक्ति नहीं रही। पर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों से जाहिर हुआ कि बंगाल में भी उसे लोकप्रियता हासिल है। हिंदुओं पर हमले होने पर वह प्रतिक्रिया को स्वर देती है। पिछले साल मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा से यह बात प्रकट होती है।
मुर्शिदाबाद हिंसा
हालांकि ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद हिंसा के पीछे बांग्लादेशी अपराधियों का हाथ होने का आरोप लगाकर न केवल पल्ला झाड़ा, बल्कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) और भाजपा को भी जिम्मेदार ठहराया। उनकी टिप्पणियों के जवाब में भाजपा ने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि मुर्शिदाबाद में हिंसा में शामिल होने के आरोप में जो 200 से ज़्यादा लोग गिरफ़्तार किए गए हैं, उनमें से कितने बांग्लादेशी नागरिक हैं। सीमा सुरक्षा बल और केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर वे अक्सर विपरीत टिप्पणियां करती रहती हैं। यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि वक्फ कानून के विरुद्ध हुआ आंदोलन इतनी जल्दी इतना हिंसक कैसे हो गया? इससे पहले संशोधित नागरिकता कानून के मुद्दे पर भी उस इलाके में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे।
मुर्शिदाबाद की हिंसा के कारण 500 के आसपास हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर मालदा जिले में पलायन करना पड़ा। दंगाइयों ने 200 घरों और दुकानों में आग लगा दी और लूटपाट की। इसमें तीन लोगों की मौत हुई। इस हिंसा पर कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा गठित तीन सदस्यीय तथ्य-जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में हिंसा स्थल पर स्थानीय तृणमूल कांग्रेस पार्षद और विधायक की उपस्थिति को रेखांकित किया। रिपोर्ट के अनुसार, मुर्शिदाबाद के बेगुना जैसे गांवों में हिंदू घरों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, पानी के कनेक्शन काट दिए और टंकियां नष्ट कर दीं, ताकि पीड़ित आग न बुझा सकें। दिसंबर, 2025 में राज्य के कुछ हिस्सों में साधु-संतों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार की खबरें सामने आईं। गत 20 जनवरी को कलकत्ता उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार राज्य की रिपोर्ट को देखे और यह तय करे कि क्या एनआईए जैसी केंद्रीय एजेंसी से जांच करवाने की जरूरत है। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एनआईए को जांच सौंपने का आदेश जारी किया। इसके खिलाफ राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची। उसका कहना था कि इस मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी की कोई जरूरत नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने जांच रोकने से इनकार किया है।
निशाने पर हिंदू
2016 में हावड़ा जिले के धुलागढ़ में रामनवमी जुलूस के बाद हिंसा भड़की, जिसमें दर्जनों हिंदू घरों और दुकानों को लूटकर जला दिया गया था। इसी तरह 2017 में एक फेसबुक पोस्ट के बाद बदौरिया-बसीरहाट में भड़की हिंसा में कई मंदिरों और घरों को नुकसान पहुंचाया गया। 2018 में पुरुलिया, रानीगंज और आसनसोल जैसे क्षेत्रों में रामनवमी के जुलूसों के दौरान हुई झड़पों में चार लोगों की मौत हुई थी। 2021 में राज्य में तृणमूल कांग्रेस की विजय के बाद जबर्दस्त हिंसा हुई थी। हैरत की बात थी कि उस समय बंगाल के अखबारों ने इन खबरों की या तो अनदेखी की या शांति बनाए रखने की मुख्यमंत्री की अपील को प्रमुखता दी। चौबीस घंटे सनसनी फैलाने वाले टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों या कैमरामैनों ने भी घटनास्थलों तक जाकर पीड़ितों से बात करने का प्रयास नहीं किया। जो वीडियो सामने आए थे, वे घटनास्थलों पर उपस्थित लोगों ने मोबाइल फोन से तैयार किए थे। इस कवरेज से ही पता लगा था स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार हुआ। बंगाल में अक्सर पूरे गांव के गांव राजनीतिक दबाव में रहते हैं। इसकी शुरुआत वामपंथी दलों के शासन में ही हो गई थी और तृणमूल कांग्रेस ने उस हिंसा का जवाब हिंसा से देकर अपनी जगह बनाई। क्या इसे लोकतांत्रिक परिघटना माना जाए?
केंद्रीय बलों पर टिप्पणी
पिछले चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर भी टिप्पणियां हुईं, जो चिंतनीय बात थी। मीडिया के प्रतिनिधियों ने जो जानकारियां दी थीं, उनमें सीमा सुरक्षा बल के जवानों के घरों पर हुए हमलों की खबरें चिंतनीय थीं। तैश और आवेश ममता की राजनीति का प्रमुख तत्व है। चुनाव संचालन में केंद्रीय बलों की मदद लेने को भी वे गलत मानती रही हैं। 2016 में नोटबंदी का विरोध करने के सिलसिले में दिल्ली गईं, जहां से वापस लौटते समय कोलकाता में उनके विमान को उतरने में देरी हुई, जिसे लेकर हंगामा हुआ। विमान प्रकरण चल ही रहा था कि टोल प्लाजा पर सेना के अभ्यास को लेकर उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया। उनका कहना था कि केंद्र सरकार ने हमारे खिलाफ सेना तैनात कर दी है।

विसंगति भरी राजनीति
ममता की राजनीति में एक बड़ी विसंगति है। एक तरफ वे राष्ट्रीय नेता बनना चाहती हैं, वहीं वे हिंदीभाषी क्षेत्रों के प्रति हिकारत भी फेंकती हैं, वैसे ही जैसे तमिलनाडु में डीएमके के कुछ नेता करते हैं। वे भाजपा को ‘बाहरी लोगों की’ यानी उत्तर प्रदेश, बिहार की पार्टी के तौर पर प्रचारित करती हैं और बांग्ला भाषा, संस्कृति और बांग्ला अस्मिता के मुद्दे को उठाती हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कई बार भाजपा नेताओं को ‘बाहरी’ या ‘बंगाल विरोधी’ बताया था। भाजपा के उत्तर भारत से आने वाले नेताओं को वे स्थानीय संस्कृति से अनभिज्ञ और बाहरी मानती हैं। इसे वे बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी हस्तक्षेप के तौर पर प्रस्तुत करती हैं। इस विमर्श का उद्देश्य अपनी राजनीतिक जमीन को ‘बंगाली अस्मिता’ के साथ जोड़कर मजबूत करना और उत्तर भारतीय हिंदी भाषी नेताओं के प्रभाव को कम करना रहा है।
केंद्र से टकराव
ममता बनर्जी जहां अपने आपको गरीब-परवर साबित करती हैं और तमाम कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करती हैं, वहीं उन्होंने केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को या तो अस्वीकार कर दिया है या उन्हें कमजोर कर दिया है और उन्हें राज्य-नियंत्रित समकक्ष योजनाओं में बदल दिया है।
2015 में केंद्र सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना लेकर आई थी, जिसका उद्देश्य जन्म आधारित लिंग चयन को रोकना, लिंग अनुपात में सुधार लाना और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना है। यह योजना पश्चिम बंगाल में कभी ठीक से लागू नहीं हो पाई। इसकी जगह राज्य सरकार ने ‘कन्याश्री’ जैसी योजना लागू की। सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद राज्य में ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ योजना लागू हो पाई है। पश्चिम बंगाल में जल जीवन मिशन (केवल 55 प्रतिशत जनता तक ही जल की उपलब्धता है) सबसे निचले पायदान पर है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्रीय नई शिक्षा नीति के स्थान पर अपनी नई शिक्षा नीति बनाई है। ममता सरकार ने ‘आयुष्मान भारत’ से लेकर ‘पीएम-किसान’ तक, आठ केंद्रीय योजनाओं को अवरुद्ध या कमजोर कर दिया है। यह एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने नीति आयोग के आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है। ‘आयुष्मान भारत’ की जगह ‘स्वास्थ्य साथी’ योजना लागू की गई है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने दिसंबर, 2025 में राज्यसभा को बताया था कि इससे अकेले पश्चिम बंगाल के सबसे गरीब लोगों को केंद्र सरकार से मिलने वाली धनराशि में सालाना लगभग 785 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। ‘प्रधानमंत्री किसान योजना’ कई वर्षों तक अटकी रही और उसकी जगह ‘कृषक बंधु योजना’ लागू की गई। बाद में राज्य सरकार ने कुछ शर्तों के साथ आंशिक रूप से रियायत दी।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से भी बाहर रहने का विकल्प चुना गया। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को ठीक से लागू नहीं किया और प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना और स्मार्ट सिटी मिशन को शुरू नहीं किया गया। कोविड के दौरान राज्य में गरीब कल्याण रोजगार अभियान भी ठीक से नहीं चल पाया, क्योंकि प्रवासी श्रमिकों का डेटा साझा नहीं किया गया था।
राजनीतिक षड्यंत्र
इस प्रकार की अस्वीकृति के पीछे प्रशासनिक मतभेद हों, तब भी कोई बात है। पर इनके पीछे राजनीतिक साजिश नजर आती है। बंगाल का मॉडल केंद्रीय योजना की दिल्ली-छाप को मतदाता तक पहुंचने से रोकता है। इसके स्थान पर, वह राज्य-चिह्नित कार्यक्रम प्रस्तुत करता है, जिसे तटस्थ प्रशासकों के बजाय टीएमसी के बूथ-स्तरीय पदाधिकारी संचालित करते हैं। आम जनता, सरकारी कर्मचारियों के बजाय, सुविधाओं के लिए तृणमूल कार्यकर्ताओं पर निर्भर रहती है। हजारों करोड़ रुपए से चलने वाली लक्ष्मी भंडार योजना के लाभार्थियों का पंजीकरण करने वाला स्थानीय पदाधिकारी मतदान के समय पार्टी का प्रतिनिधि बनकर सामने आएगा। कल्याणकारी योजनाओं को चलाने वाले लोग ही पार्टी के उम्मीदवार बनते हैं। भाजपा की परिवर्तन यात्रा के दौरान रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि बंगाल में कई रेलवे परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण की धीमी गति और राज्य के सीमित समर्थन के कारण लगातार पीछे चल रही हैं। अभी तक केवल 27 प्रतिशत भूमि का ही अधिग्रहण हो पाया है। भारत-बांग्लादेश सीमा बाड़बंदी परियोजना में पश्चिम बंगाल की भूमि अधिग्रहण की रफ्तार कछुए जैसी है। यह मामला अदालत में भी चल रहा है।
गरीबी ही गरीबी
नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट-2023 के अनुसार पश्चिम बंगाल में गरीबी की स्थिति गंभीर है। वहां रहने वाले लगभग 10 करोड़ लोगों में से 11 प्रतिशत लोग अब भी गरीबी का शिकार हैं। इसका सीधा मतलब है कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए जन कल्याणकारी योजनाओं की जरूरत है। राज्य ने एक सामानांतर मॉडल विकसित किया है जिसमें राज्य निधि का चुनिंदा इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय को राजनीतिक रूप से संतुष्ट रखने के लिए किया जाता है, जबकि अन्य को कम उदार या तटस्थ केंद्रीय लाभों पर निर्भर रहने दिया जाता है। जब धन केंद्र सरकार से आता है और योजनाएं पूरे देश के लिए हैं, तो उचित अपेक्षा है कि राज्य इन्हें मनमाने ढंग से न रोकें, न विलंबित करें या दुरुपयोग करें।
‘कट मनी’ कल्चर
वाममोर्चा सरकार के समय से ही पार्टी और सरकार के बीच का भेद खत्म हो गया था। सरकारी काम कर्मचारियों के बजाय पार्टी कार्यकर्ताओं के मार्फत होने लगे। इससे ‘कट मनी’ की परंपरा शुरू हुई, जिसे अब संस्थागत रूप मिल गया है। ज्यादातर सरकारी कार्यों के लिए कमीशन वसूला जाता है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की राशि में से स्थानीय नेता और बिचौलिए हिस्सा वसूलते हैं। बिना कमीशन दिए सरकारी लाभ नहीं मिलता। हाल में राज्य के दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह ने भी ‘कट मनी’ का मुद्दा उठाया था और कहा था कि यह राज्य के विकास में प्रमुख बाधाओं में एक है। माकपा और कांग्रेस भी इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार को घेरती रही है। व्यवस्था ऐसी है कि सरकारी मदद पार्टी कार्यकर्ताओं के मार्फत ही जनता तक पहुंच पाती है।
इसे लेकर अक्सर स्थानीय गुटों में टकराव भी होता है। जून, 2019 में ममता बनर्जी ने सार्वजनिक मंच से अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को चेतावनी देते हुए कहा था कि जिन्होंने जनता का पैसा लिया है, वे उसे वापस करें। इस बयान के बाद प्रदर्शन हुए और लोगों ने स्थानीय नेताओं के घरों के बाहर धन-वापसी के लिए घेराव भी किया। कुछ समय यह चला, पर फिर सब कुछ उसी तरह चलने लगा। चुनाव की घोषणा होने से एक दिन पहले कोलकाता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली हुई थी। राज्य सरकार ने लोगों को रैली में आने से रोकने के लिए हरसंभव प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हुई। रैली में लाखों लोग शामिल हुए। उस रैली को देखते हुए लोग कह रहे हैं कि इस बार ममता की राहें बहुत कठिन हैं। इसका अर्थ क्या है यह हम सब जानते हैं।

















