क्या बंगाल में सच में इतनी अराजकता है !
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होम भारत पश्चिम बंगाल

क्या बंगाल में सच में इतनी अराजकता है !

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज मंच पर खड़ी होकर यह चीख-चीख कर कह रही हैं कि -“केवल 15 मिनट के लिए अगर प्रशासन बंगालियों के सर से हाथ उठा ले तो पूरा समाज समाप्त हो जाएगा।”

Written byगोपाल सामंतोगोपाल सामंतो
Mar 27, 2026, 09:03 pm IST
in पश्चिम बंगाल
Mamata Banerjee

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल

देश आज एक नये अध्याय को देख रहा है। यह अध्याय भी उसी पुण्य भूमि से शुरू हो रहा है, जहां से स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ था। इस वाक्य मात्र से यह स्थापित हो जाता है कि हम पश्चिम बंगाल के बारे में बात कर रहे है। यहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज मंच पर खड़ी होकर यह चीख-चीख कर कह रही हैं कि -“केवल 15 मिनट के लिए अगर प्रशासन बंगालियों के सर से हाथ उठा ले तो पूरा समाज समाप्त हो जाएगा।”

इतिहास ने बंगाल को “डायरेक्ट एक्शन डे” दिखाया था, क्या ममता बनर्जी का आशय ऐसे ही कत्लेआम से है? क्या वो अपने भाषण के द्वारा बंगाल को डायरेक्ट एक्शन डे का फ़्लैशबैक दिखा रही हैं ! क्या वह चुनाव से पहले बंगालियों को डराना चाहती थीं?

सर्वोच्च न्यायालय से भी नाखुश हैं ममता

यह केवल प्रश्न नहीं है अपितु देश के संघीय ढांचे पर सीधा कुठाराघात है। अगर स्पष्ट रूप से समझा जाये तो देश के संविधान के आधीन कार्य करने वाले चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का इस कुत्सित तरीके से विरोध अपने आप में संघवाद का विरोध माना जाना चाहिए। प्रजातांत्रिक तरीके से वह कोर्ट भी जा चुकी हैं। वहां अपनी बात को स्वयं रखा भी था। इसके बाद शायद सर्वोच्च न्यायालय से भी वो नाखुश हैं क्योंकि फ़ैसला उनके मनमाफ़िक़ नहीं हुआ, इसलिए वो धरना दे रही थीं।

क्या केवल बंगाल में ही चल रहा एसआईआर

अलग-अलग प्रदेशों में भी SIR की प्रक्रिया हुई और किसी को पता भी नहीं चला कि कैसे और कब यह चुनावी प्रक्रिया संपन्न हो गयी। इसी भ्रामक वातावरण के चलते अगर वर्तमान की ख़बरों और घटनाक्रमों को देखें तो लगता है -जैसे केवल बंगाल में ही SIR हो रहा है और यह कोई विदेशी प्रक्रिया है जिसको अंग्रेजों ने बंगाल की जनता पर थोप दिया है। ममता बनर्जी के मुताबिक़ हर बंगाली को इसका विरोध करना पड़ेगा। इस साधारण सी प्रक्रिया को नेस्तानाबूद करने में TMC का हर कार्यकर्ता दिन-रात लगा हुआ है। शायद इस प्रक्रिया को ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेता – कार्यकर्ता अपने अस्तित्व की लड़ाई मानकर चल रहे है, हो भी क्यों ना ? जिस प्रकार से बंगाल की सड़कों पर प्रजातंत्र को गुंडातंत्र के आगे नतमस्तक कर दिया गया है। पिछले 50 सालों से, ऐसा होना बहुत ही आम बात है। विचारणीय यह है कि- वो बंगाली समाज कहा गुम हो गया है, जिसने अंग्रेजों का खिलाफत उनके तोपों की नाल पर चढ़कर किया था? बंगाल की भूमि में ही पहले सशस्त्र बल “आज़ाद हिन्द फौज” का निर्माण हुआ था।

बंगाल की एक कहानी यह भी

बंगाल के हर गली की एक कहानी यह भी है कि घरों में अकेले बूढ़े माँ -बाप बचे हुए हैं और बच्चे विदेशों में बस गए। साल में एक बार विजिट पर आने वाले बन गए हैं। इसे भी TMC ने भुनाया। TMC के इसी मंच से उनकी एक सांसद श्रीमती महुआ मोइत्रा अपने उच्चतम आवाज़ में यह कहती हैं कि -“आज जो TMC के साथ नहीं है वो बंगाली ही नहीं है।”

क्या टीएमसी देगी बंगाली होने का सर्टिफिकेट

क्या बंगाली होने का सर्टिफिकेट TMC की एक ऐसी महिला से बंगाली समाज को लेना पड़ेगा जो खुलेआम कहती हैं कि—“ मां काली मदिरापान और धूम्रपान करती है।” ऐसी कूटरचना और राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए दिए गए बयान केवल TMC की नहीं अपितु समस्त बंगाली समाज और असंख्य वैभव-गाथा वाले बंगाल को कलंकित करने का काम कर रही है ।

90 के दशक में जिस प्रकार चुनावी हिंसा और बैलेट बॉक्स लूट के कारण बिहार कलंकित था, ममता बनर्जी के कार्यकाल में बंगाल उससे कहीं आगे निकल गया है। पूर्वी बंगाल ने ‘हिंदू जेनोसाइड’ को बार-बार झेला है। बंगाल के भद्र समाज के मन में धीमा मीठा जहर घोल कर देश के संघीय ढांचे से अलग करने का कुत्सित प्रयास सत्ताधारी TMC पार्टी हर दिन कर रही है।

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार

शासकीय अधिकारियों को, विपक्षी पार्टियों के नेताओं को और आम जानता को डराने का काम जो TMC के नेता दैनिक रूप से कर रहे हैं। मानो प्रशासन और न्याय व्यवस्था बंगाल में लंबी छुट्टी पर गयी हुई है। एक क़ानूनजीवी और TMC सांसद कल्याण बनर्जी देश के चीफ इलेक्शन कमिश्नर की उंगली काटने की बात कर रहे हैं। ऐसे सांस्कृतिक पतन को देखकर, इसे सहन कर रहे शांत बैठे लोगो को देखकर दुख और आश्चर्य लगता है।

क्या लौटेगा बंगाल का वैभव

बंगाल में चुनावी मौसम शुरू हो गया है। राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं। देखना दिलचस्प रहेगा कि बंगाल का ‘भद्रोलोक’ समाज कब तक ऐसे अभद्र प्रयास को संजोकर रखता? कब तक अराजकता के सहारे देश के ब्रेन-कैपिटल को उसके वैभव से दूर रखने में ममता बनर्जी और उनके साथी सफल हो पाते हैं? पिछले 50 सालों में बंगाल कितने पीछे जा चुका है, यह किसी से छुपा नहीं है, 1947 में आज़ादी के समय केवल कोलकाता की GDP देश के आर्थिक राजधानी कही जाने वाले मुंबई से दुगुनी थी। आज मुंबई की GDP कोलकाता के तीन गुना से भी अधिक है। इस ब्रेन-ड्रेन वाले जगह से क्या बंगाल वापस वैभव का सफ़र कर पाएगा? अब यह कोलकाता के बुद्धिजीवी बंगाली समाज को सोचना होगा और तय करना होगा।

 

Topics: ममता बनर्जीपश्चिम बंगाल चुनावबंगाल चुनाव 2026बंगाल में एसआईआर
गोपाल सामंतो
गोपाल सामंतो
संस्थापक (Save Bengal Save India Movement) [Read more]
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