अनूठी जन्मभूमि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की
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अनूठी जन्मभूमि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की

वाल्मीकि रामायण के 5वें सर्ग के बालकांड में अयोध्या का वर्णन करते हुए कहा गया है कि अयोध्या नगरी 12 योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी थी। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम के सरयू में जल समाधि लेने के बाद अयोध्या नगरी उजड़ गयी थी।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by कुलदीप सिंह
Mar 26, 2026, 02:54 pm IST
inविश्लेषण, धर्म-संस्कृति
भगवान राम

भगवान राम

अयोध्या नगरी यूं ही खास नहीं है। ‘अथर्ववेद’ में इसे देवताओं का स्वर्ग बताया गया है। भारत की प्राचीन सांस्कृतिक सप्तपुरियों में अयोध्या का स्थान प्रथम है। पावन सरयू नदी के तट पर बसी पवित्र नगरी अयोध्या को स्कंद पुराण में ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेवों की पवित्र स्थली कहा गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, जिस तरह से काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। ठीक इसी तरह से अयोध्या विष्णु जी के सुदर्शन चक्र पर बसी है।

रामायण के अनुसार, सरयू नदी के किनारे बसी अयोध्या नगरी की स्थापना सूर्य पुत्र वैवस्वत मनु द्वारा लगभग 6673 ईसा पूर्व करायी गयी थी। वे ब्रह्मा जी के पौत्र कश्यप की संतान थे। उनके बाद मनु के 10 पुत्र हुए जिनमें-इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे। इनमें ‘इक्ष्वाकु’ कुल में ‘भगवान राम का जन्म हुआ था। पौराणिक कथानक के अनुसार, मनु ब्रह्माजी के पास एक नगर निर्माण की योजना लेकर पहुंचे। ब्रह्माजी ने मनु को भगवान विष्णु के पास भेजा। विष्णु जी ने मनु के लिए साकेत धाम का चयन किया। साकेतधाम के निर्माण के लिए भूमि का चयन सरयू नदी के किनारे किया गया और इसके बाद वहां देवशिल्पी विश्वकर्मा ने भव्य नगर निर्माण किया। इसीलिए अयोध्या को साकेत के नाम से भी जाना जाता है।

12 योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी थी अयोध्या

वाल्मीकि रामायण के 5वें सर्ग के बालकांड में अयोध्या का वर्णन करते हुए कहा गया है कि अयोध्या नगरी 12 योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी थी। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम के सरयू में जल समाधि लेने के बाद अयोध्या नगरी उजड़ गयी थी। तब श्रीराम के पुत्र कुश ने अयोध्या को फिर से बसाया था। महराज कुश द्वारा अयोध्या का पुनर्निर्माण कराने के बाद सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों तक अयोध्या का अस्तित्व बरकरार रहा। लेकिन महाभारत युद्ध के बाद अयोध्या फिर से उजाड़ हो गयी। इसके बाद अयोध्या मौर्य से लेकर गुप्त, कन्नौज शासकों के अधीन रही। चक्रवर्ती सम्राट महाराज वीर विक्रमादित्य ने भी यहां विभिन्न मंदिरों, सरोवर, कूप आदि का निर्माण कराया था। अयोध्या की पहचान मंदिर और घाटों की प्रसिद्ध नगरी के रूप में भी है।

यहां के प्रसिद्ध सरयू नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं जिसमें- गुप्तार घाट, कैकयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि प्रमुख हैं। ज्ञात हो कि हिंदुओं के साथ ही बौद्ध और जैन धर्म के लिए भी अयोध्या नगरी का खास धार्मिक महत्व है। आदिनाथ समेत जैन धर्म के पांच   इसके बाद 1528 में मुग़ल आक्रान्ता बाबर के सेनापति मीरबकी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर स्थित मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। इसके बाद अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद शुरू हुआ और 500 वर्षों तक कई आंदोलन व सांप्रदायिक दंगे हुए। अंतत मामला कोर्ट पहुंचा तथा लंबी लड़ाई के बाद फैसला श्रीराम जन्मभूमि के पक्ष में आया; और आज इस पौराणिक रामनगरी का गौरव वापस लौटना हम सनातनियों के लिए गर्व का विषय है।

सनातन संस्कृति के सर्वोत्तम प्रेरणा पुरुष हैं प्रभु श्रीराम

मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम भारत की सनातन संस्कृति के सर्वोत्तम प्रेरणा पुरुष यूँ  ही नहीं माने जाते हैं। श्रीराम के जीवन का मूल उद्देश्य अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करना था। आम इंसान शांति के साथ आपस में प्रेम व सौहार्द का भाव रखते हुए सामाजिक समरसता का कैसे जिया जाए, इसका सर्वोत्तम उदाहरण है श्रीराम का जीवन। उनके गुणों की विशिष्टता के कारण ‘रामराज्य’ आज भी सुशासन, शांति व समृद्धि का पर्याय माना जाता है। रामचरितमानस में उल्लेख मिलता है कि श्रीराम जहां भी गए वहां की लोक-मान्यताओं, परम्पराओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने को उन्होंने हमेशा अपना ध्येय बनाया। भील जनजाति की प्रिय भक्तिन शबरी के जूठे बेर को ग्रहण कर उसको मां के समान आदर दिया।

सीता माता को रावण के चंगुल से बचाने के संघर्ष में अपने प्राण गंवाने वाले जटायु की अंत्येष्टि अपने हाथों से कर उनको पिता का मान दिया। रावण की विशाल सेना के प्रतिपक्ष में किष्किन्धा के रीछ-वानरों को सहायक बनाया। यानी जिस अवसर पर जो मार्ग समरसता को बढ़ाने वाला लगा, उन्होंने उसी का अनुसरण किया। “शिवद्रोही मम भगत कहावा, ते नर सपनेहु मोहि न पावा” का संदेश देकर उन्होंने शैव व वैष्णव मतों में समन्वय और सहकार स्थापित किया। भारत के उत्तरी छोर से जाकर सुदूर दक्षिण के अंतिम छोर में “रामेश्वरम” की स्थापना कर सर्वपंथ समादर के सन्देश को मजबूत किया। दर्जनों उद्धरणों के द्वारा सीतापति भगवान श्रीराम के समन्वयवादी दृष्टिकोण का परिचय रामायण में हम पग-पग पर प्राप्त कर सकते हैं। प्रभु श्रीराम के इन्हीं सद्गुणों के बलबूते त्रेतायुग में रामराज्य की सीमायें समूचे विश्व में विस्तारित थीं। दक्षिण पूर्व एशिया के देश थाईलैण्ड, वियतनाम, इण्डोनेशिया, कम्बोडिया और कैरेबियन देश वेस्टइंडीज, सूरीनाम व मॉरीशस ही नहीं मध्य पूर्व ईराक, सीरिया, मिश्र सहित यूरोप इंग्लैड, बेल्जियम और मध्य अमेरिका के होण्डुरास सहित शेष विश्व के कई देशों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम विविध रूपों में मौजूद हैं।

इन देशों में उपस्थित श्रीराम से जुड़े साक्ष्य श्रीराम की  वैश्विक लोकप्रियता को प्रमाणित करते हैं। हम सनातनी भारतवासी प्रभु श्रीराम के धराधाम पर अवतीर्ण होने के शुभकाल श्रीरामनवमी को सदियों से श्रद्धा भक्ति से समारोह पूर्वक मनाते आ रहे हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हमारे भारतीय नववर्ष यानी नया विक्रमी संवत्सर का शुभारम्भ होता है और उसके ठीक आठ दिन बाद चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को हम अपने आराध्य श्रीराम का जन्मोत्सव पूरे देश में खूब धूमधाम से मनाते हैं।

पर्यटन का वैश्विक केंद्र बिंदु बनी रामनगरी

पांच सौ वर्षों के सुदीर्घ संघर्ष के बाद 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में दिव्य व भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ रामनगरी अयोध्या ने अपना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक वैभव पुनः प्राप्त कर लिया है। प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि आज विश्व पटल पर देश के एक प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुकी है। लगभग ₹1700 करोड़ की लागत से निर्मित यह राममंदिर आज देश दुनिया के करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र बनने के साथ पर्यटन का एक वैश्विक केंद्र बिंदु बन चुका है। जैसे राम वन से लौटकर मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर आए थे, वैसे ही सदियों बाद यह धरती फिर धर्म और न्याय की विजय का साक्षी बनी है।

 

Topics: Ayodhyaअयोध्यावाल्मीकि रामायणसनातन संस्कृतिSanatan cultureShri Ram Janmabhoomiश्रीराम जन्मभूमिValmiki RamayanaशबरीShabari
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