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असम की बदलती जनसांख्यिकी और राजनीतिक प्रभाव

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार, 2041 तक असम में हिंदू और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर हो जाएगी। उनके व्यक्तित्व के अनुसार,  इसके बाद असम मुस्लिम बहुल राज्य बन जाएगा।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Mar 26, 2026, 02:40 pm IST
inविश्लेषण, असम

बांग्लादेश से सटे भारत के राज्यों पश्चिम बंगाल और असम में बेहताशा बदलती जनसांख्यिकी ना सिर्फ इन राज्यों वरन पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। इस जनसांख्यिकी बदलाव में मुस्लिम समुदाय की अत्यधिक बढ़ती जनसंख्या पूरे देश और समाज के लिए आने वाले दिनों में बड़े परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। इस जनसांख्यिकी परिवर्तन में कई दलों का गुपचुप सहयोग इस समस्या के समाधान में भी समस्या उत्पन्न कर रहा है। कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राजद, बदरूदीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का नाम उन दलों में शामिल है जो अवैध रूप से भारत में प्रवेश करके जनसांख्यिकी के बदलाव का प्रयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए वोट बैंक के रूप में करना चाह रहे हैं।

हिंदू और मुस्लिम आबादी हो जाएगी बराबर

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार, 2041 तक असम में हिंदू और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर हो जाएगी। उनके व्यक्तित्व के अनुसार,  इसके बाद असम मुस्लिम बहुल राज्य बन जाएगा। जम्मू कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद असम तीसरा प्रदेश होगा  जहां हिंदू अल्पसंख्यक होंगे और मुसलमान बहुसंख्यक। जम्मू कश्मीर और लक्षद्वीप केंद्रशासित प्रदेश हैं अतएव राज्यों में असम ही प्रतिशत के मामले में सबसे ज्यादा मुस्लिम वाला राज्य है। यह बहुत गंभीर मामला है क्योंकि जिस तेजी से असम में मुसलमानों की आबादी बढ़ी है, वैसा भारत के किसी दूसरे राज्य में कभी नहीं हुआ है। किसी भी धर्म की आबादी अगर सामान्य तरीके से बढ़ती है तो इसमें कोई अतिवादिता नहीं है। लेकिन असम में जिस रफ़्तार से मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई है उसे किसी भी लिहाज से सामान्य नहीं कहा जा सकता है।

मुस्लिमों की जनसंख्या में वृद्धि और घुसपैठ

असम में मुस्लिम की जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि बहुत बड़ी घुसपैठ की तरफ इशारा करती है। हकीकत में असम में मुस्लिम जनसंख्या के विस्फोट के पीछे एक सोची समझी बहुत साजिश महसूस हो रही है। ये साज़िश कोई नई नहीं, बल्कि आजादी के तत्काल बाद शुरू हो गई थी। इसका लक्ष्य पूरे असम को पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में शामिल करने का था। यह साजिश आज भी अनवरत जारी है।

इसे भी पढ़ें: असम में कांग्रेस प्रायोजित घुसपैठ

घुसपैठ पर गंभीर है भाजपा

असम की भाजपा सरकार इस मामले की गंभीरता को भली भांति समझती हैं और इसके समाधान के लिए यथोचित कदम भी उठा रही है। इसी क्रम में हिमंता विस्व शर्मा की सरकार ने पूरे राज्य में वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने का एक बड़ा अभियान छेड़ रखा है। इस अतिक्रमण को रोकना असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान को बचाये रखने के लिए आवश्यक है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता विस्व शर्मा के अनुसार,  योजनाबद्ध तरीके से राज्य में मुस्लिम आबादी सरकारी और जंगलों की जमीन पर भी कब्जा कर रही है। यह बदलाव न केवल आंकड़ों में दिखता है, बल्कि असम के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर भी असर डाल रहा है।

हिमंता विस्व शर्मा के अनुसार, असम राज्य की कुल मुस्लिम जनसंख्या में से सिर्फ 3% ही मूल असमिया आबादी है। यानी असम की कुल आबादी में 31% मुसलमान बांग्लादेशी हो सकते हैं। यह राज्य की जनसंख्या का लगभग एक तिहाई है।


असम की जनसंख्या असंतुलन को समझने के लिए 1951 की प्रथम जनगणना से इस ओर विचार करना पड़ेगा। 1951 असम में मुस्लिम आबादी 22.6% थी। 20 साल बाद 1971 में असम में मुस्लिम आबादी बढ़कर हो गई 24.6% हो गई। इसके 20 साल बाद 1991 में असम में मुसलमानों की संख्या 28.4% हो गई है। 2001 में असम में मुस्लिम आबादी बढ़कर 31% हो गई। 2011 की जनगणना में असम में मुसलमानों की आबादी 34.2% हो गई है। जानकारों के अनुसार, अगली जनगणना में राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 40% के आंकड़े को भी पार कर सकती है।

असम में मुस्लिम जनसंख्या के वृद्धि की दर अन्य राज्यों से काफी अधिक है। 1951 से 2011 के बीच पूरे भारत में मुस्लिम आबादी 4.4% बढ़ी है, जबकि इसी दौरान असम में मुसलमानों की संख्या में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज़ की गयी। देश में मुस्लिम जनसंख्या की अपेक्षा असम में लगभग ढाई गुना मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि देखी गई है। असम के कई जिले मुस्लिम बाहुल्य हो चुके हैं। असम में भी वैसे जिले जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं, वहां मुस्लिमों की जनसंख्या की वृद्धि दर काफी अधिक होने के साथ ही पूर्णतः मुस्लिम बाहुल्य बन चुके हैं। वर्तमान में असम के लगभग 11 जिलों में बहुसंख्यक बन चुके हैं। वहीं अन्य चार जिलों में उनकी प्रभावी जनसंख्या हैं। 2001 की जनगणना के मुताबिक, असम में छह मुस्लिम बहुल जिले थे और 2011 तक ये संख्या जो छह से बढ़कर अब 11 हो गई है।

इन मुस्लिम बाहुल्य जिलों में अधिकतर वैसे जिले हैं, जो बांग्लादेश से सीधे सीमा साझा करते हैं या एक जिले के बाद है। अतएव कहा जा सकता है इन जिलों में अवैध बांग्लादेशियों के कारण ही जनसंख्या में इतनी तेजी से वृद्धि हुई है।

जिलेवार जनसंख्या (2011 की जनगणना)

 

उपरोक्त जिलों में दक्षिण सलमारा मनकाचर, धुबरी, गोवालपारा, करीमगंज जिले बांग्लादेश की सीमा से सीधा मिलता है।

असम के मुस्लिम बाहुल्य निचले असम में 2005 में मुस्लिमों के वोट बैंक की बहुलता को देखते हुए बदरुद्दीन अजमल ने आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम से पार्टी बनाई। इस पार्टी की स्थापना के समय के बाद से लगातार तीन लोकसभा चुनावों में पार्टी सुप्रीमो बदरुद्दीन अजमल ने धुबरी लोकसभा सीट से बड़ी जीत हासिल किया। आरोपों के अनुसार, बदरुद्दीन अजमल के बड़े पैमाने पर निचले असम के धुबरी और इसके समीपवर्ती इलाकों में मुस्लिम घुसपैठ को बढ़ावा दिया।

 

Topics: Demographic Change in AssamAssam's Muslim Populationअसम चुनाव 2026असमHimanta Biswa Sarmaहिमंता बिस्व सरमाअसम चुनावअसम विधानसभा चुनावअसम मुस्लिम जनसंख्याAssamअसम डेमोग्राफी चेंजAssam Assembly Elections
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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