भारत में ऋतुएं केवल मौसम परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना की सजीव अभिव्यक्ति हैं। बसंत विशेष रूप से वह काल है जब प्रकृति में सौंदर्य, ऊर्जा और उल्लास एक साथ प्रस्फुटित होते हैं। ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय में बसंत केेे आनंद का वसंतोत्सव दस फरवरी से उन्नीस फरवरी तक आयोजित था। इसका आरंभ रामजस काॅलेज में लीला बैंड की प्रस्तुति से हुआ।
दिल्ली सरकार के सहयोग से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं एवं फैकल्टी ने मिलकर वसंतोत्सव 2026 का आयोजन किया। इस आयोजन में दिल्ली के आठ महाविद्यालयों को केंद्र बनाकर दिल्ली के अन्य महाविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं को इसमें जोड़ा गया। इस सांस्कृतिक आयोजन के केंद्र ‘रामजस’, ‘श्यामलाल’, ‘पीजीडीएवी’, ‘आत्माराम सनातन धर्म’, ‘दीनदयाल उपाध्याय’, ‘शिवाजी’ एवं शहीद सुखदेव महाविद्यालय बने। विश्वविद्यालय स्टेडियम में इस वसंतोत्सव के सुव्यवस्थित आयोजन में 35,000 से अधिक विद्यार्थियों की सहभागिता हुई। साथ ही, 205 संस्थानों का प्रतिनिधित्व इस बात का उद्घोष था कि भारत का जेन-जी अपनी जड़ों से कटना नहीं चाहता, वह उन्हें पुनः रोपित कर भविष्य का निर्माण करना चाहता है।
इन दिनों ‘भजन क्लबिंग’ नई सांस्कृतिक गतिविधि के रूप में प्रचलित हुई है।
भजन क्लबिंग में राघव राजा, साधो, केशवम, रहस्य, इंडन म्यूजिक कलेक्टिव और सैम बैंड के कलाकारों ने भक्ति गीतों को पेश किया। इस आयोजन में दिल्ली विश्वविद्यालय के हजारों छात्र छात्राओं ने सुर से सुर मिलाया। उन्होंने इसके माध्यम से जाहिर किया कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को ऊर्जा के साथ जीते हैं। यह केवल धार्मिक अभिव्यक्ति मात्र नहीं है बल्कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जीवंत अनुभव से गुजरना है।
युवा कलाकारों और विद्यार्थियों की इस भागीदारी से यह सिद्ध हुआ कि भारतीय युवा अपनी पहचान उधार में नहीं लेना चाहता है। वह अपने स्वर स्वयं रचेगा, अपनी लय स्वयं चुनेगा और अपनी परंपरा को आधुनिक मंच पर आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करेगा। इस आयोजन को एक तरह से वैचारिक विजय का क्षण कहना उचित होगा। जहां यह मिथक भी टूट गया कि आधुनिकता और भारतीयता परस्पर विरोधी हैं। वास्तव में, अपनी संस्कृति पर गर्व करना भारतीयता का मूल है।
16 फरवरी को विश्वविद्यालय स्टेडियम में विशेष कार्यक्रम ‘शी और शक्ति‘ केवल छात्राओं के लिए आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम में केशवम बैंड ने सांस्कृतिक संध्या में भाग लिया। उनकी संगीत की लय पर जब लगभग 10,000 युवा छात्राएं भक्ति-गीतों की लय पर झूम उठीं, तब वह केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं रहा, बल्कि इसने संदेश दिया कि भारत की नई पीढ़ी अपनी परंपरा को गर्व से जीना चाहती है।
वर्षों तक यह धारणा गढ़ी जाती रही है कि विश्वविद्यालयों में भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों के लिए स्थान सीमित है। किंतु इस वसंतोत्सव ने उस विचार को पराजित कर दिया। यह आयोजन किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने पक्ष में खड़े होने का साहस था। यह सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का उद्घोष था कि भारत का युवा अपनी पहचान स्वयं निर्धारित करेगा। जब परिसर में पीले रंग के परिधानों की आभा फैली और सामूहिक स्वर में भक्ति, आनंद और राष्ट्रभाव गूंजा, तब वह केवल उत्सव नहीं रहा, वह वैचारिक स्वतंत्रता का उत्सव बन गया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के इस आयोजन ने पुष्ट किया कि भविष्य का भारत अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ, आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से सजग है। जेन-जी की उपस्थिति ने बता दिया है कि आधुनिकता और भारतीयता एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। बसंत यहां केवल ऋ तु नहीं है, वह जीवन-दर्शन है। और यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है।
(लेखिका सत्यवती कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)
















