एक पुरानी हिंदी कहावत है- “मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त”। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और ईरान के बीच कथित बैक-चैनल वार्ताओं पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कथनों के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों और ईरानी नेतृत्व के किसी रहस्यमयी प्रतिनिधि के बीच अनौपचारिक संपर्क चल रहा है-जो कथित रूप से अयातुल्लाह अली खामेनेई के बाद बचे प्रभावशाली उत्तराधिकारियों में से एक है।
ईरान का इंकार और “गवाहों” की उत्सुकता
विडंबना यह है कि स्वयं ईरान ने ऐसी किसी भी वार्ता से साफ इनकार किया है। इसके विपरीत, पाकिस्तान और तुर्की-जो स्वयं को मध्यस्थ बता रहे हैं- असामान्य रूप से उत्साहित दिख रहे हैं। वे न केवल वार्ता की पुष्टि कर रहे हैं, बल्कि यह तक दावा कर रहे हैं कि इस्लामाबाद में औपचारिक बातचीत का मंच तैयार हो चुका है।
रहस्य और नेतृत्व का शून्य
स्थिति और भी जटिल हो जाती है जब यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान की ओर से वार्ता कौन कर रहा है। ईरान के कई शीर्ष नेता—अली लारिजानी, अज़ीज़ नासिरज़ादेह, मोहम्मद पाकपुर, अली शमखानी और ग़ुलामरेज़ा सुलेमानी—अमेरिका-इज़राइल हमलों में मारे जा चुके हैं। ऐसे में वार्ता की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
ईरान की आशंका: क्या यह जाल है?
वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसी रिपोर्टों के अनुसार, ईरान को डर है कि शांति वार्ता एक जाल हो सकती है- जिसका उद्देश्य उसके बचे हुए नेताओं को बाहर निकालकर निशाना बनाना हो। विशेष रूप से मोहम्मद-बाकर ग़ालिबाफ जैसे नेता संभावित लक्ष्य माने जा रहे हैं।
क्षेत्रीय समीकरणों में नया मोड़
वॉशिंगटन से आ रही खबरों के अनुसार, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस संघर्ष को “ऐतिहासिक अवसर” के रूप में देख रहे हैं। साथ ही, सऊदी अरब और यूएई के रुख में भी बदलाव दिख रहा है-वे अब निष्क्रियता को कमजोरी के रूप में देखे जाने से बचना चाहते हैं।
अमेरिकी रणनीति और दबाव
अमेरिका ने ऊर्जा संरचना पर हमलों को सीमित करने का संकेत दिया है, लेकिन सैन्य ठिकानों पर हमले जारी हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि लक्ष्य ईरान की परमाणु क्षमता को समाप्त करना है। साथ ही, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर संयुक्त नियंत्रण जैसी शर्तें भी सामने आ रही हैं।
क्या कोई समझौता टिकाऊ होगा?
ईरान और अमेरिका के बीच क्या समझौता टिकेगा? इसका उत्तर संदेहपूर्ण है। ईरान की ताकत केवल उसकी सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि रूस और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के समर्थन में भी निहित है।
भारत: एक संभावित संतुलित मध्यस्थ
यहीं भारत की भूमिका महत्वपूर्ण बनती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारत उन कुछ देशों में है, जिनके सभी पक्षों के साथ संतुलित संबंध हैं। भारत एक अधिक विश्वसनीय और प्रभावी मध्यस्थ बन सकता है।
इतिहास की विडंबना
1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान और इज़राइल के संबंध अत्यंत घनिष्ठ थे। बाद में वैचारिक बदलाव और इस्लामी नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा ने इस रिश्ते को शत्रुता में बदल दिया। आज की स्थिति केवल युद्ध नहीं, बल्कि विचारधारा और रणनीति का परिणाम है। जब तक यथार्थवाद, बयानबाजी पर हावी नहीं होता, तब तक यह नाटक चलता रहेगा- जहाँ मुद्दई इनकार करता है, गवाह हावी हैं, और सच्चाई कहीं खो जाती है।

















