गुम होती गौरैया: क्या हमारी सुबहों की चहचहाहट हमेशा के लिए खो जाएगी?
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होम भारत

गुम होती गौरैया: क्या हमारी सुबहों की चहचहाहट हमेशा के लिए खो जाएगी?

कभी सुबह की पहली किरण के साथ इसकी चहचहाहट सुनाई देती थी, जो दिन की शुरुआत को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती थी लेकिन अब वह आवाज धीरे-धीरे गायब होती जा रही है और इसके लिए कान तरसते रह जाते हैं।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Mahak Singh
Mar 20, 2026, 03:44 pm IST
in भारत
World Sparrow Day

World Sparrow Day

गौरैया, जो कभी हमारे घर-आंगन की एक आम चिड़िया हुआ करती थी, अब दुर्लभ होती जा रही है। कभी हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली छोटी सी गौरैया, जो अपनी मधुर चहचहाहट से हमारे जीवन को आनंदमयी बनाती थी, आज विलुप्ति के कगार पर खड़ी है। इसकी चहचहाहट, जो सुबह-सुबह हमें मधुर अहसास कराती थी, अब विरले ही सुनाई देती है। यह नन्हा पक्षी, जिसका आकार भले ही छोटा हो लेकिन इसकी मौजूदगी हमारे पर्यावरण और जीवन में एक अनमोल सुकून लेकर आती थी।

गुम होती चहचहाहट की पुकार

कभी सुबह की पहली किरण के साथ इसकी चहचहाहट सुनाई देती थी, जो दिन की शुरुआत को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती थी लेकिन अब वह आवाज धीरे-धीरे गायब होती जा रही है और इसके लिए कान तरसते रह जाते हैं। दो दशक पहले तक यह प्यारी चिड़िया हर जगह झुंड में उड़ती नजर आती थी। हमारे घरों की छतों, आंगन के पेड़ों और आसपास के वृक्षों पर इसके घोंसले आम थे लेकिन आज यह दुर्लभ हो गई है और इसे संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल कर लिया गया है।

गौरैया संरक्षण की वैश्विक पहल

गौरैया की घटती आबादी का मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि यूरोप के कई हिस्सों में भी इसकी संख्या में गिरावट देखी गई है। यही कारण है कि विश्व भर में इसके संरक्षण के लिए चिंता बढ़ रही है। हाल के अध्ययनों के अनुसार, भारत सहित दुनिया भर में गौरैया की आबादी में 60 से 80 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। इस संकट को देखते हुए ही गौरैया और शहरी वातावरण में रहने वाले अन्य आम पक्षियों के संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 2010 में ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाने की शुरुआत की गई। यह पहल भारत की ‘नेचर फॉरएवर सोसायटी’ और फ्रांस के ‘इको-सिस एक्शन फाउंडेशन’ के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुई थी। महाराष्ट्र के नासिक निवासी पर्यावरणविद मोहम्मद ई दिलावर, जो पक्षियों के प्रति विशेष प्रेम रखते थे, ने ‘नेचर फॉरएवर सोसायटी’ की स्थापना की थी। उनके प्रयासों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली और उन्हें वर्ष 2008 में ‘टाइम’ पत्रिका द्वारा ‘हीरोज ऑफ द एनवायरनमेंट’ की उपाधि दी गई। इसी संगठन के प्रयासों से विश्व गौरैया दिवस की स्थापना हुई थी, जिससे दुनिया भर में गौरैया के संरक्षण के लिए कई अभियान शुरू किए गए। तब से लेकर आज तक, यह दिवस दुनिया भर में गौरैया को बचाने के प्रयासों का प्रतीक बन गया है। लोग इसके संरक्षण के लिए विभिन्न तरीकों से जुटे हैं, जैसे घोंसले बनाने के लिए जगह उपलब्ध कराना, पेड़-पौधे लगाना और इसके प्राकृतिक आवास को संरक्षित करने की कोशिश करना।

घटती आबादी के प्रमुख कारण

भारतीय उपमहाद्वीप में गौरैया की छह प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश अब संकट में हैं। पश्चिमी देशों में भी यह स्थिति चिंताजनक है। वैश्विक स्तर पर गौरैया की 26 प्रजातियां मौजूद हैं, जिनमें से पांच भारत में पाई जाती हैं लेकिन इनके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। भारत में केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि देश भर में गौरैया की संख्या लगातार घट रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत में गौरैया की स्थिति और भी चिंताजनक हो गई है। 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में इसकी आबादी में 85 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है जबकि ग्रामीण इलाकों में भी यह 40 से 50 प्रतिशत तक कम हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण ने इस संकट को और गहरा दिया है। गौरैया की घटती संख्या के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। पिछले दो-ढाई दशकों में हमारी जीवनशैली में आए बदलाव ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है। जंगलों का विनाश, पेड़-पौधों की अंधाधुंध कटाई, प्रदूषण और शहरीकरण ने इसके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है। पक्के मकानों के बढ़ते चलन ने घोंसलों के लिए जगह कम कर दी है। पहले घरों में खुली जगहें, छज्जे और आलों में गौरैया आसानी से घोंसले बना लेती थी लेकिन अब आधुनिक वास्तुकला में ऐसी जगहें नहीं बची। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह बदलाव देखा जा सकता है, जहां पारंपरिक मिट्टी के घरों की जगह कंक्रीट के ढांचे बन रहे हैं। इसके अलावा, मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन भी इसके लिए एक बड़ा खतरा बन गया है, जिसका इनकी आबादी पर सीधा असर पड़ा है।

भोजन, आवास और सुरक्षा का संकट

कई बार इनके घोंसले सुरक्षित स्थानों पर नहीं होने के कारण कौए और अन्य शिकारी पक्षी इनके अंडों तथा बच्चों को खा जाते हैं। खेतों में कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग भी गौरैया के लिए खतरा बन गया है। इसके नवजात बच्चे शुरुआती दिनों में कीड़े-मकोड़ों को खाते हैं लेकिन कीटनाशकों के कारण खेतों में कीड़े-मकोड़े खत्म हो रहे हैं, जिससे इसके बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता। भोजन और पानी की कमी ने इसके अस्तित्व को और संकट में डाल दिया है। शहरीकरण की दौड़ में पेड़-पौधों की कटाई ने इसके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया। पर्यावरणविदों के अनुसार, गौरैया छोटे झाड़ीनुमा पेड़ों पर घोंसले बनाना पसंद करती है लेकिन विकास के नाम पर इन पेड़ों को काट दिया गया है। आजकल घरों में लगाए जाने वाले नब्बे फीसद पौधे विदेशी प्रजातियों के हैं, जिन पर गौरैया घोंसला नहीं बना सकती। गौरैया प्रायः 20 मीटर से अधिक ऊंचाई पर उड़ान नहीं भर सकती। ऐसे में बड़े शहरों में ऊंची-ऊंची इमारतों के कारण इसके लिए उड़ान भरना और भोजन ढूंढना मुश्किल हो गया है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी भी इसके लिए चुनौती बन रही है।

संरक्षण की जिम्मेदारी और जागरूकता

गौरैया के अस्तित्व पर मंडराते संकट को देखते हुए पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह छोटी सी चिड़िया आने वाले वर्षों में इतिहास का हिस्सा बन जाएगी और हमारी आने वाली पीढ़ियां तब इसे केवल किताबों या इंटरनेट पर ही देख पाएंगी। पर्यावरण के साथ हमारा व्यवहार भी इसके लिए जिम्मेदार है क्योंकि हमने धरती, जल और वायु को इस कदर प्रदूषित कर दिया है कि इसका असर न केवल मनुष्यों, बल्कि सभी जीव-जंतुओं और पक्षियों पर पड़ रहा है। बहरहाल, गौरैया के संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए हमें पक्षियों के प्रति अनुकूल वातावरण बनाना होगा। गौरैया को वापस बुलाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने परिवेश को उनके अनुकूल बनाएं। हमें अपने बगीचों में ऐसे पेड़ लगाने चाहिए, जिन पर वे आसानी से घोंसला बना सकें। हमें यह समझना होगा कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं है बल्कि हमारे पर्यावरण की सेहत का प्रतीक है, इसलिए भी इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी चहचहाहट का आनंद ले सकें। यदि हम सभी गौरैया की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति जागरूक हो जाएं तो यह नन्हा सा पक्षी फिर से हमारे घर-आंगन में फुदकता दिखाई देगा। इसके लिए हमें बस थोड़ा सा प्रयास करना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियों को गौरैया सिर्फ किताबों में देखने को न मिले बल्कि वे इसकी चहचहाहट का आनंद भी ले सकें।

Topics: bird conservationreasons for sparrow extinctionsparrows in IndiaClimate changeenvironmental conservationविश्व गौरैया दिवसWorld Sparrow DaySparrow ConservationSparrowsdeclining sparrow population
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