कहा जाता है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी किया जा सकता है। ऐसी ही इच्छाशक्ति का परिचय सोनडीह गांव के लोगों ने दिया और उन्होंने अपने गांव में पानी की समस्या को दूर कर दिया। बता दें कि यह गांव छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा जिले में एक पहाड़ की तलहटी पर बसा है। इस कारण यहां पानी की समस्या सदैव बनी रहती थी। अब सोनडीह और उसके आसपास के गांवों का भू-जल स्तर ऊपर उठ गया है और लोगों को साल भर पर्याप्त मात्रा में पानी मिल रहा है। ‘ग्राम व्यवस्था समिति’ के अध्यक्ष हेमलाल सिंह बताते हैं, ”वर्षों से सोनडीह गांव के लोग एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे थे।
पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां भूजल स्तर बहुत नीचे था। इसे देखते हुए ग्रामीणों ने तय किया कि बरसात के पानी को रोका जाए। फिर सभी ने मिलकर नजदीक के पहाड़ से लगभग 500 मीटर लंबा कच्चा नाला तैयार किया और उसे एक तालाब से जोड़ दिया। इससे बरसाती पानी तालाब तक पहुंचने लगा। फिर यह अनुभव हुआ कि एक तलाब बरसाती पानी को संभाल नहीं पा रहा है तो और छह तालाब खोदे गए और सभी को एक-दूसरे से जोड़ दिया गया। अब बरसात का पानी इन तालाबों में जमा होता है। जब सभी तालाब भर जाते हैं, तब अतिरिक्त पानी नदी में जाता है। अब गांव में पानी ही पानी है।”
वे कहते हैं, ”साल भर पानी रहने से खेती भी आसानी से होती है। जब खेती ठीक होने लगी तो गांव में विकास का पहिया भी तेजी से घूमने लगा। लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रहे हैं। इससे गांव के युवा सरकारी नौकरी में जाने लगे हैं। स्थिति यह है कि सोनडीह और उसके पास के एक गांव के करीब 30 युवा भारतीय सेना में हैं।”
‘ग्राम व्यवस्था समिति’ ने फसलों को जानवरों से बचाने के लिए गांव की पूरी जमीन की तारबंदी कर दी है। इसके लिए जिसके पास जितनी जमीन है, उस हिसाब से लोगों से सहयोग लिया गया। अब गांव के लोगों को फसल की देखरेख करने के लिए अतिरिक्त समय नहीं लगाना पड़ता है। समिति ने गांव के लोगों को एक—दूसरे को, विशेषकर गरीब परिवारों की मदद करने के लिए भी प्रेरित किया है। गांव में किसी गरीब की मृत्यु होने पर सभी लोग अपनी क्षमता के अनुसार उस परिवार की आर्थिक मदद करते हैं।
यही नहीं, हर घर से उस परिवार को एक किलो चावल भी दिया जाता है, ताकि वह परिवार अपनी जरूरतें पूरी कर सके। लोगों को किसी भी तरह के नशा से बचाने के लिए गांव में मद्यपान का निषेध किया गया है। कोई भी व्यक्ति बीड़ी, तंबाकू, दारू आदि का सेवन नहीं कर सकता है।
गांव में धार्मिक गतिविधियां चलती रहें, इसके लिए गांव में एक भव्य मंदिर भी बनाया गया है। यह सब काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की पहल पर संभव हुआ है। बता दें कि गांव में 1995-96 में संघ की शाखा शुरू हुई थी। इसके बाद गांव के विकास पर मंथन शुरू हुआ और आज उसके अच्छे परिणाम भी दिख रहे हैं।

















