ईरान युद्ध से दुनिया पर लटक रही मंदी की तलवार, लेकिन भारत को संकट से बचाए हैं मोदी सरकार की नीतियां
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ईरान युद्ध से दुनिया पर लटक रही मंदी की तलवार, लेकिन भारत को संकट से बचाए हैं मोदी सरकार की नीतियां

तेल और गैस कीमतों में उछाल ने कई छोटे देशों को डगमगाया हुआ है, युद्ध ने बेशक, वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। लेकिन इस सबके बीच, मोटे तौर पर भारत इस युद्ध के दुष्प्रभावों से खास प्रभावित नजर नहीं आ रहा है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Mar 17, 2026, 07:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
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ईरान पर अमेरिका और इस्राएल के हमलों और ईरान के पलटजवाबों के बीच दुनिया भर में संकट के बादल गहराने लगे हैं। कई देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। इतना ही नहीं, अगर यह युद्ध लंबा खिंचा तो ​वैश्विक मंदी का खतरा भी साफ मंडराता दिख रहा है। तेल और गैस कीमतों में उछाल ने कई छोटे देशों को डगमगाया हुआ है, युद्ध ने बेशक, वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। लेकिन इस सबके बीच रसोई गैस पर विपक्षी दलों की हायतौबा को एक तरफ रख दें तो मोटे तौर पर भारत इस युद्ध के दुष्प्रभावों से खास प्रभावित नजर नहीं आ रहा है। इसमें काफी हाथ तो वर्षों से देश को आत्मनिर्भर बनाने वाली मोदी सरकार की नीतियों का है तो बहुत बड़ी भूमिका सजग नागरिकों की भी है। लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस सहित बहुत से अन्य देशों में अब मंदी का ताप बढ़ता दिख रहा है। आखिर अभी तक उन देशों पर युद्ध के क्या दुष्परिणाम दिख रहे हैं, इसका विश्लेषण करें तो कई आयाम दिखाई देते हैं।

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ऊर्जा कीमतों पर असर

अमेरिका-इस्राएल के ईरान पर गत 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों के बाद, तेहरान ने इस्राएल, अमेरिकी ठिकानों, तेल डिपो और खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर ईरानी हमलों से जहाजों की अवाजाही प्रभावित हुई, जहां से वैश्विक तेल-गैस का 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। इराकी जलक्षेत्र में ईंधन टैंकरों पर हमले हुए हैं। 16 मार्च की सुबह तक ब्रेंट क्रूड 106 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका था, जो गत 27 फरवरी के 72 डॉलर से 40 प्रतिशत अधिक है। केपलर की वरिष्ठ विश्लेषक मुयू जू के अनुसार, एलएनजी कीमतों में 60 प्रतिशत का उछाल आया है। 2 मार्च को कतर एनर्जी कंपनी ने ईरानी ड्रोन हमले के बाद एलएनजी उत्पादन रोका था, जो विश्व के 20 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति करती है। पेट्रोल, डीजल, जेट केरोसिन जैसे रिफाइंड उत्पादों की कीमतें भी बढ़ती गई हैं।

एशिया में 84 प्रतिशत क्रूड और 83 प्रतिशत एलएनजी होर्मुज के रास्ते जाती है, जिसमें से चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया में 70 प्रतिशत हिस्सा पहुंचता है। डर है कि अगर युद्ध लंबा चला तो कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल होते हुए तीन महीने में औसत 150 डॉलर तक पहुंच सकती है। इसीलिए अनेक एशियाई देश ऊंची कीमतों पर वैकल्पिक सप्लाई का स्रोत तलाश रहे हैं।

उत्पादकता में कमी

ऊर्जा आयात महंगा होने से उत्पादकता घटी है। ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेस डेटा के अनुसार, 28 फरवरी के बाद से 85 देशों में पेट्रोल महंगा हुआ है। कंबोडिया में 68 प्रतिशत, वियतनाम 50 प्रतिशत, नाइजीरिया 35 प्रतिशत, लाओस 33प्रतिशत, कनाडा में 28 प्रतिशत बढ़ोतरी देखने में आई है। पाकिस्तान और श्रीलंका ने सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया है, 50 प्रतिशत काम घरे से करने को कहा है। फिलीपींस, थाईलैंड में भी चार दिन काम, म्यांमार में वैकल्पिक दिन गाड़ी चलाने की अनुमति दी गई है, श्रीलंका में क्यूआर कोड से ईंधन मिलने लगा है। इससे मैन्युफैक्चरिंग और अन्य सेवाएं प्रभावित हुईं। जहाज मालिक नए ऑर्डर लेने से हिचकिचा रहे हैं, क्योंकि खर्च बढ़ गए हैं।

File Photo

शेयर बाजारों में गिरावट

ब्लूमबर्ग के अनुसार, युद्ध शुरू होने से वैश्विक शेयर 5.5 प्रतिशत गिरे हैं। एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। 28 फरवरी से, न्यूयार्क शेयर बाजार 6 प्रतिशत, नैस्डैक 2.4 प्रतिशत, शंघाई 1.86 प्रतिशत, तोक्यो निक्केई 11प्रतिशत, भारत का निफ्टी 7 प्रतिशत, हांगकांग हेंगसेंग 4 प्रतिशत, लंदन का शेयर बाजार 5.3 प्रतिशत, सऊदी तदावुल 9.6 प्रतिशत, यूरोनेक्स्ट 6 प्रतिशत, एएसएक्स 6 प्रतिशत गिर चुका है। दक्षिण कोरिया के शेयर 8 प्रतिशत गिरे हैं। फ्रेडरिक श्नाइडर (मध्य पूर्व काउंसिल) के अनुसार, एशिया ऊर्जा संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित है। रूस के शेयर ऊपर हैं, क्योंकि वह गैर-खाड़ी हाइड्रोकार्बन आपूर्तिकर्ता देश है।

महंगाई की चिंता

आईएमएफ की क्रिस्टालिना जॉर्ज ने चेताया है कि युद्ध लंबा खिंचने पर महंगाई बढ़ जाएगी। 1973, 1978, 2008 के तेल संकटों ने महंगाई एवं बेरोजगारी पैदा की थी। श्नाइडर ने ग्लोबल साउथ के कर्ज संकट की आशंका जताई है। चीन ऊर्जा विविधीकरण के तमाम स्रोतों जैसे नवीकरणीय, न्यूक्लियर, कोयला, स्टॉकपाइलिंग से सुरक्षित है, लेकिन उसका निर्यात प्रभावित हुआ है। यूरोप रूसी गैस कटौती से पहले से ही तनावग्रस्त है।

ईरान ने भारत के जहाजों को होर्मुज गलियारे से गुजरने की विशेष अनुमति दी है

जीडीपी वृद्धि दर

कैपिटल इकोनॉमिक्स के नील शेयरिंग का पूर्वानुमान है कि युद्ध जल्दी खत्म हुआ तो एशिया-यूरोप पर सीमित असर रहेगा, केवल तुर्की-पाकिस्तान जैसे उभरते बाजार ब्याज दरें बढ़ाएंगे। युद्ध लंबा चला तो यूरो जोन में जीडीपी 0.5 प्रतिशत, चीन <3 प्रतिशत और अमेरिका में यह 2.25 प्रतिशत हो सकती है।

यात्रा और विमानन प्रभाव

गल्फ एयरलाइंस फ्लाइट से आवाजाही सामान्य से नीचे है क्योंकि हवाई क्षेत्र बंद है। क्वांटास, एसएएस, एयर न्यूजीलैंड, इंडिगो, एयर इंडिया ने किराये बढ़ा दिए हैं। जेट फ्यूल 85-90 डॉलर से 150-200 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। एशिया-यूरोप-अमेरिका की उड़ानें लंबी हैं जो ईरानी हवाई क्षेत्र से बचते हुए जाती हैं। यूरोपीय एयरलाइंस रूसी हवाई क्षेत्र बंदी से पहले से प्रभावित है। पर्यटन और जीवनयापन पर संकट की आशंका जताई जा रही है।

भारत की स्थिति

फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था ईरान युद्ध के बावजूद पटरी पर बनी हुई है, लेकिन रेटिंग एजेंसियां जैसे आईसीआरए, मूडीज और फिच कंपनियां खतरे की चेतावनी दे रही हैं। जैसा पहले बताया, मोदी सरकार की कुछ प्रमुख नीतियां इस संकट में देश को अपेक्षाकृत सुरक्षित रख रही हैं। इनमें से प्रमुख हैं—

ऊर्जा सुरक्षा नीतियां

मोदी सरकार ने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व का विस्तार किया है, जो 5 मिलियन टन से अधिक तेल स्टोर करता है। यह ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने पर 10-15 दिन की अतिरिक्त सप्लाई सुनिश्चित करता है। रूस, अमेरिका और गैबॉन जैसे विविध स्रोतों से तेल आयात (रूस से 40 प्रतिशत हिस्सा) ने निर्भरता कम की है।

विदेशी मुद्रा भंडार

भारतीय रिजर्व बैंक के पास 650 बिलियन डॉलर से अधिक का फॉरेक्स रिजर्व है, जो रुपये को स्थिर रखता है। युद्ध से तेल की कीमत 106 डॉलर/बैरल पहुंचने पर भी करंट अकाउंट डेफिसिट 1-2 प्रतिशत तक सीमित रह सकता है। आइसीआरए के अनुसार, 70-75 डॉलर/बैरल पर सीएडी 1 प्रतिशत रहेगा।

घरेलू उत्पादन को बढ़ावा ‘आत्मनिर्भर भारत’ और पीएलआई योजना से रिफाइनरी क्षमता 250 मिलियन टन सालाना हो गई। रिलायंस जामनगर और एचपीसीएल—आईओसी जैसी रिफाइनरी एलएनजी/तेल प्रोसेसिंग बढ़ा रही हैं। साथ ही, भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से लंबी अवधि में आयात निर्भरता घटने वाली है।

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व्यापार में विस्तार

भारत ने ईरान पर निर्भरता घटाकर यूएई, सऊदी से आयात बढ़ाया है। यूरोपीय संघ, यूके और ऑस्ट्रेलिया के साथ हमारे मुक्स व्यापार समझौतों ने निर्यात को संतुलित किया है। हालांकि बासमती चावल निर्यात प्रभावित हुआ है, लेकिन समग्र व्यापार में लचीलापन बरकरार है। फिच के अनुसार, युद्ध लंबा चला तो जीडीपी पर 0.3-0.6 प्रतिशत असर दिख सकता है, लेकिन विकास दर 7 प्रतिशत बनी रहने वाली है।

मौद्रिक नीति स्थिरता

आरबीआई ने मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4 प्रतिशत ±2 प्रतिशत बनाए रखा है। युद्ध से पेट्रोल कीमत 20-30 प्रतिशत बढ़ने पर भी सब्सिडी/टैक्स कट से खुदरा प्रभाव सीमित रखने के प्रयास नतीजे दे रहे हैं। हमारा बैंकिंग सेक्टर भी मजबूत स्थिति में बना हुआ है।

इतना सब होने पर भी जोखिम तो बना ही हुआ है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने युद्ध की बजाय विवाद को बातचीत से हल करने की बार—बार अपील की है, यह केवल भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के हित की बात है और विश्व के प्रमुख देश इस बात को मानते भी हैं। इस वक्त भारत की विश्व मंच पर मजबूत स्थिति इसे एक प्रभावी भूमिका में दिखा रही है।

 

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Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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