पश्चिम एशिया संकट : ईरान का अकेलापन और भविष्य की दिशा
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पश्चिम एशिया संकट : ईरान का अकेलापन और भविष्य की दिशा

हाल के वर्षों में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने फिर वही प्रश्न खड़ा कर दिया यदि उम्मा वास्तव में एक राजनीतिक वास्तविकता है, तो ईरान आज इतना अकेला क्यों दिखाई देता है?

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Mar 16, 2026, 03:56 pm IST
inविश्लेषण
पश्चिम एशिया संकट

पश्चिम एशिया संकट

इतिहास कभी-कभी ऐसे प्रश्न पूछता है जो किसी भी विचारधारा की चमक को परख लेते हैं। इस्लामी समाज में एक अवधारणा है उम्मा। इसका अर्थ है मुस्लिम एकता, एक ऐसा समुदाय जो मजहबी धागे में बंधा हो और संकट के समय एक-दूसरे के साथ खड़ा हो।

इसे ध्यान में रखते हुए 1969 में इस्लामिक देशों के संगठन (Organisation of Islamic Cooperation) की स्थापना हुई थी। उद्देश्य था- दुनिया के मुस्लिम देशों को एक मंच पर लाना, उनके हितों की रक्षा करना और वैश्विक राजनीति में सामूहिक आवाज बनना। लेकिन इतिहास की नदी जब बहती है, तो आदर्शों की नाव को अक्सर सत्ता की लहरें हिला देती हैं।

हाल के वर्षों में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने फिर वही प्रश्न खड़ा कर दिया यदि उम्मा वास्तव में एक राजनीतिक वास्तविकता है, तो ईरान आज इतना अकेला क्यों दिखाई देता है?

कहानी की शुरुआत: कर्बला का मोड़

यदि हम इतिहास की शुरुआत में जाएं तो उम्मा की अवधारणा को सबसे बड़ा झटका कर्बला के मैदान में ही दिखाई देता है। कर्बला केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि एक ऐसी त्रासदी थी जिसने मुस्लिम समाज को दो धाराओं में बांट दिया। इस संघर्ष में पैगंबर मुहम्मद के नाती शहीद हुए और इसके बाद सुन्नी और शिया विभाजन स्थायी हो गया। यहां से इतिहास ने एक गहरी सच्चाई दिखा दी कि मजहबी एकता का सपना अक्सर सत्ता की राजनीति के सामने कमजोर पड़ जाता है।

इतिहास की राहों में बिखरती एकता

कर्बला के बाद भी इतिहास रुका नहीं। समय आगे बढ़ा और सत्ता की राजनीति ने नए-नए रूप लिए। आधुनिक युग में इसका एक बड़ा उदाहरण है ईरान इराक युद्ध, जो आठ वर्षों तक चला। यह युद्ध केवल दो देशों के बीच संघर्ष नहीं था; यह उस आदर्श पर भी प्रश्न था जो कहता था कि मुस्लिम दुनिया एक है। लाखों लोग मारे गए, शहर उजड़े, लेकिन उम्मा की एकता उस युद्ध को रोक नहीं सकी। इसी तरह अफगानिस्तान, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व के कई क्षेत्रों में समय-समय पर संघर्ष होते रहे। इतिहास बार-बार बताता रहा कि धार्मिक पहचान के बावजूद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं होती।

एक और विरोधाभास: शरण और सहानुभूति

मानवीय संकटों के समय भी एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। युद्ध और आतंकवाद से पीड़ित लोगों के लिए अक्सर वैश्विक स्तर पर सहानुभूति दिखाई देती है, लेकिन कई बार यह देखा गया कि मुस्लिम देशों ने भी बड़ी संख्या में शरणार्थियों को अपने यहां बसाने में संकोच या इंकार किया। यह तथ्य हमें याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल भावनाओं से नहीं चलती; उसके पीछे आर्थिक क्षमता, सामाजिक संतुलन और राजनीतिक हित भी काम करते हैं।

ईरान संकट: आदर्श और वास्तविकता का सामना

अब कहानी वर्तमान में आती है। जब ईरान और इजरायल के बीच तनाव बढ़ा, तो कई लोगों को लगा कि मुस्लिम दुनिया एकजुट होकर ईरान के साथ खड़ी होगी। लेकिन दृश्य कुछ और था। अधिकांश देशों ने सावधानीपूर्ण या तटस्थ रुख अपनाया। यह केवल धार्मिक मतभेद की कहानी नहीं थी; इसके पीछे कई परतें थीं।

ईरान अकेला क्यों पड़ गया?

मध्य-पूर्व की वर्तमान राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रश्न बार-बार उठता है, इतना बड़ा और प्रभावशाली देश होने के बावजूद ईरान कई मुद्दों पर अपेक्षाकृत अकेला क्यों दिखाई देता है? इसका उत्तर किसी एक कारण में नहीं बल्कि इतिहास, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा, वैश्विक गठबंधनों और स्वयं ईरान की नीतियों की कई परतों में छिपा है।

सुन्नी-शिया विभाजन – मुस्लिम दुनिया का लगभग 85–90% हिस्सा सुन्नी है, जबकि ईरान शिया इस्लाम का प्रमुख केंद्र है। यह विभाजन सातवीं शताब्दी से चला आ रहा है। कई अरब देशों को आशंका रहती है कि ईरान शिया प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करता है, जिसके कारण अविश्वास बना रहता है।

अरब-फारसी प्रतिस्पर्धा – ईरान की सांस्कृतिक पहचान फारसी सभ्यता से जुड़ी है, जबकि अधिकांश मध्य-पूर्वी देश अरब पहचान रखते हैं। इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अंतर ने क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया।

क्षेत्रीय प्रभुत्व की नीति – कई देशों का आरोप है कि ईरान ने सीरिया, इराक और यमन जैसे देशों की राजनीति में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की। इससे कुछ अरब देशों को यह लगता है कि ईरान क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदलना चाहता है।

प्रॉक्सी संगठनों से संबंध – ईरान के संबंध कुछ ऐसे संगठनों से जोड़े जाते हैं जिन्हें “प्रतिरोध धुरी” कहा जाता है। इनमें प्रमुख हैं , हिजबुल्लाह , हमास। कई देशों को डर है कि इससे क्षेत्र में प्रॉक्सी युद्ध और अस्थिरता बढ़ सकती है।

अमेरिका के साथ अरब देशों के संबंध – खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था काफी हद तक अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग पर आधारित है। इसलिए वे ऐसी नीति अपनाने से बचते हैं जिससे अमेरिका से टकराव हो।

इज़रायल के साथ संबंध सामान्य होना – क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा परिवर्तन तब आया जब 2020 के अब्राहम एकॉर्ड के बाद इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, सूडान और मोरक्को सहित कई अरब देशों के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका के समर्थन से संपन्न हुआ।

आर्थिक हित और युद्ध का भय – खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था तेल, व्यापार और निवेश पर आधारित है। बड़े युद्ध की स्थिति में उनकी आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसलिए वे व्यापक संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहते हैं।

केंद्रीय इस्लामी नेतृत्व का अभाव – 1924 में उस्मानी खिलाफत के अंत के बाद मुस्लिम दुनिया में कोई केंद्रीय राजनीतिक नेतृत्व नहीं रहा। परिणामस्वरूप सभी देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं।

आंतरिक असंतोष और प्रतिबंध –ईरान के भीतर समय-समय पर विरोध आंदोलन हुए हैं और पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक नेटवर्क को सीमित किया है।

यदि ईरान–इजरायल युद्ध लंबा चला तो भविष्य कैसा होगा?

मध्य-पूर्व में ईरान–इजरायल के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक राजनीति और भविष्य की विश्व व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक गठबंधनों में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।

सबसे पहला प्रभाव वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है। वर्तमान विश्व व्यवस्था में अमेरिका एक प्रमुख शक्ति रहा है, जबकि रूस और चीन जैसी शक्तियाँ भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यदि यह संघर्ष गहराता है तो इन शक्तियों के बीच नए कूटनीतिक समीकरण बन सकते हैं, जिससे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की प्रवृत्ति और मजबूत हो सकती है।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा। फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य से वर्ष 2025 में, लगभग 15 मिलियन बैरल प्रति दिन (एम/डी) कच्चे तेल का परिवहन हुआ, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 34% था। इसके अलावा, विश्व के द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का लगभग 20% हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि युद्ध इस क्षेत्र तक फैलता है तो तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है और कई देश वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तथा नए व्यापार मार्गों की तलाश तेज कर सकते हैं।

तीसरा प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। यदि संघर्ष बढ़ता है तो सुन्नी-शिया तनाव और कुछ चरमपंथी संगठनों की गतिविधियाँ भी बढ़ सकती हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी संभव है कि क्षेत्रीय शक्तियाँ लंबे संघर्ष के दुष्परिणामों को समझते हुए शांति और संवाद को प्राथमिकता दें।

ऐसी स्थिति में भारत जैसे देश, जो संतुलित कूटनीति और संवाद की नीति अपनाते हैं, मध्यस्थता और शांति प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस प्रकार यह संघर्ष भविष्य की विश्व व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, जहाँ शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक सहयोग नए रूप में उभर सकते हैं।

 

Topics: Hormuz Straitपश्चिम एशिया संकटUmmah conceptMiddle East Politicswest asia crisisIran Vs IsraelShia Sunni DividegeopoliticsIndia Diplomacyपाञ्चजन्य विशेषIran Israel conflict
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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