मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित सुंदरेल गांव के निवासियों ने ऐसा काम किया है, जिसकी प्रशंसा विरोधी भी करते हैं। केवल 15 वर्ष में इस गांव में वह खुशहाली आई है, जिसकी चर्चा दूर-दूर तक होती है। इस खुशहाली के पीछे ‘ग्राम विकास बैंक’ है। हालांकि यह पंजीकृत नहीं है, लेकिन एक सामान्य बैंक की तरह ही काम करता है।
राष्ट्रीय स्व्यंसेवक के चार स्वयंसेवकों द्वारा केवल 400 रुपए की पूंजी के साथ शुरू हुए इस बैंक से आज सैकड़ों लोगों को सहारा मिल रहा है। अभी इसके 700 से अधिक सदस्य हैं। सभी हर महीने 100 रुपए सदस्यता शुल्क जमा करते हैं। इसके बदले उन्हें बैंक से ऋ ण मिलता है, वह भी केवल 1 रुपए ब्याज पर। गांव के निवासी और ग्राम विकास, मालवा प्रांत के सह संयोजक महेंद्र पाटीदार बताते हैं, “यह बैंक हर महीने लगभग 50 लाख रुपए का कर्ज देता है।
बैंक में सदस्यता शुल्क जमा करने के लिए गट पद्धति अपानई गई है। 50 सदस्यों के बीच एक गटनायक बनाया गया है। वही बाकी सदस्यों से शुल्क लेकर बैंक में जमा करता है। इस तरह कई गटनायक हैं।”

हर महीने 1-10 तारीख के बीच शुल्क जमा होता है। इसके बाद बैंक की संचालन समिति के सदस्यों की एक बैठक होती है। जिन सदस्यों को कर्ज लेना होता है, उन्हें 1 तारीख से पहले आवेदन देना होता है। बैठक में सभी आवेदनों पर विचार किया जाता है और फिर आवेदकों को ऋ ण मिल जाता है। कर्ज की पहली शर्त है कि लेने वाला बैंक का सदस्य हो और दूसरी शर्त है कि वह दो सदस्यों को ‘गारंटर’ बनाए। खेती-किसानी के साथ ही विवाह, घर बनाने, कारोबार करने आदि के लिए लोग कर्ज ले सकते हैं। केवल नाम मात्र के सूद पर कर्ज मिलने से लोग सहर्ष कर्ज लेते हैं और अपने को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इस प्रयास ने गांव का कायाकल्प कर दिया है।
केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी गांव में कार्य हो रहा है। गांव में प्रत्येक महीने की पूर्णिमा के आसपास आने वाले रविवार को सामूहिक कन्या पूजन होता है। इसमें गांव के हर घर से कन्याओं को लाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। इसका उद्देश्य है सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना। महेंद्र पाटीदार कहते हैं, “छोटी बच्चियों को समझाना आसान है कि जाति के नाम पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। इसलिए इन बच्चियों को एकत्र कर उनकी पूजा की जाती है और साथ में भोजन कराया जाता है। इससे उनमें जातिगत कोई द्वेष नहीं रहता। इसका बहुत अच्छा प्रभाव भी पड़ा है। गांव की जो लड़कियां विवाह के बाद ससुराल गई हैं, वे वहां भी कुछ इस तरह का भेदभाव देखती हैं, तो उसका विरोध करती हैं।”

















