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होम विश्व

चारों तरफ मार, तेल की धार

ईरान पर अमेरिका-इस्राएल के सैन्य हमले से क्षेत्रीय संघर्ष तेज हो गया और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से वैश्विक तेल-गैस आपूर्ति बाधित हुई है। इससे ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि और विश्व अर्थव्यवस्था पर संकट की आशंका बढ़ गई है। भारत, जो खाड़ी क्षेत्र पर तेल-गैस के लिए निर्भर है, विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है

Written byदिनकर प्रकाश श्रीवास्‍तवदिनकर प्रकाश श्रीवास्‍तव
Mar 14, 2026, 10:15 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
ईरान की राजधानी तेहरान में तेल डिपो पर हमले के बाद का दृश्य

ईरान की राजधानी तेहरान में तेल डिपो पर हमले के बाद का दृश्य

इस्राएल-अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई आरंभ की। युद्ध के शुरुआत में ही ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई मारे गए। इस घटना ने स्पष्ट संकेत दिया कि यह संघर्ष केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके उद्देश्य ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन तक विस्तृत हो चुके थे। यह हमला अप्रत्याशित था, क्योंकि ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ताओं में प्रगति के संकेत मिल रहे थे। इसके जवाब में ईरान ने क्षेत्र में स्थित इस्राएल-अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला किया।

सऊदी अरब के रास तनुरा स्थित सऊदी अरामको रिफाइनरी व कतर के रास लाफान स्थित एलएनजी संयंत्र को भी निशाना बनाया। इसके अतिरिक्त, वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत वहन करने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य भी बंद कर दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा व व्यापार पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि यह युद्ध चार से पांच सप्ताह तक चल सकता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो विश्व अर्थव्यवस्था और वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में गंभीर अस्थिरता पैदा हो सकती है। परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है और दुनिया को तीसरे बड़े तेल मूल्य झटके की शुरुआत का सामना करना पड़ सकता है।

हमले से पहले दो घटनाक्रम

सैन्य हमले से पहले दो समानांतर घटनाक्रम सामने आ रहे थे। एक ओर अमेरिका अब तक के सबसे बड़े नौसैनिक सैन्य बेड़े को तैनात कर रहा था। इसमें दो विमानवाहक पोत शामिल थे। यूएसएस अब्राहम लिंकन, जो ओमान की खाड़ी में तैनात था और यूएसएस गेराल्‍ड आर. फोर्ड, जो इस्राएल के निकट भूमध्य सागर में तैनात था। दूसरी ओर, कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां चल रही थीं। 26 फरवरी को ओमान की मध्यस्थता में जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच तीसरे दौर की वार्ता हुई। इस परिप्रेक्ष्य में प्रश्न उठता है कि क्या सैन्य शक्ति का यह व्यापक प्रदर्शन राष्ट्रपति ट्रंप की ‘आर्ट ऑफ नेगोशिएशन’ यानी मोलभाव करने की कला की रणनीति का हिस्सा था, जिसके माध्यम से दबाव बनाकर कूटनीतिक वार्ताओं में अनुकूल परिणाम प्राप्त करने का प्रयास किया गया?

प्रश्न तो यह भी उठता है कि क्या ये वार्ताएं वास्तव में केवल समय प्राप्त करने की रणनीति थीं, ताकि सैन्य तैयारी पूरी की जा सके? इसी दौरान ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की नौसेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य अभ्यास किए, जिसका उद्देश्य यह दिखाना था कि संघर्ष की स्थिति में वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को बंद करने की क्षमता रखती है। साथ ही, ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भी अवगत कराया कि यदि उस पर इस्राएल या अमेरिका ने हमला किया तो वह न केवल इस्राएल को, बल्कि पूरे क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा।

जिनेवा वार्ता के बाद ओमान के विदेश मंत्री बद्र बिन हमद अल बुसैदी ने सीबीएस न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में खुलासा किया कि ईरान ने समृद्ध यूरेनियम का भंडार नहीं बनाने पर सहमति जताई थी। यूरेनियम भंडार के अभाव में परमाणु बम का निर्माण संभव नहीं होता। ईरान इस पर भी सहमत था कि वह अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के मौजूदा भंडार को ‘ईंधन’ में बदल देगा और यह ईंधन ऐसा होगा जिसे फिर से पहले वाली अवस्था में वापस नहीं बदला जा सकेगा। इसी संदर्भ में ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान के पास ऐसी मिसाइल क्षमता नहीं थी, जो सीधे अमेरिका के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सके। जैसा कि बेंजामिन नेतन्याहू ने ‘अस्तित्वगत खतरे’ की बात कही थी या ट्रंप ने ‘आसन्न खतरे’ का दावा किया था, उसके ठोस प्रमाण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आए।

ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान

इस युद्ध के परिणामस्वरूप तेल-गैस की कीमतों में तेज वृद्धि देखने को मिली है। होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते खाड़ी क्षेत्र से आने वाली वैश्विक कच्चे तेल की लगभग 20 प्रतिशत आपूर्ति के बाधित होने की भरपाई करने के लिए कोई वैकल्पिक स्रोत तत्काल उपलब्ध नहीं है। फरवरी की शुरुआत से अंतरराष्ट्रीय मानक माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत में प्रति बैरल 4.54 डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई थी और युद्ध शुरू होने के बाद इसमें 40 डॉलर प्रति बैरल से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि हो गई। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की वृद्धि लंबे समय तक बनी रही, तो भारत के वार्षिक तेल आयात बिल में लगभग 14,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वृद्धि होगी। चूंकि भारत कच्चे तेल का लगभग 50 प्रतिशत आयात इसी क्षेत्र से करता है, इसलिए यह संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न कर सकता है।

इस युद्ध का प्रभाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी स्थित संयंत्र पर हमले के बाद कतर ने एलएनजी का उत्पादन और निर्यात अस्थायी रूप से रोक दिया है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति अचानक कम हो गई है। इस आपूर्ति बाधा के कारण एशियाई बाजारों में स्पॉट कीमतें तेजी से बढ़कर लगभग 10.73 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू से 35 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू तक पहुच गई हैं। यह स्थिति भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि भारत अपनी एलएनजी आवश्यकताओं का लगभग 55 प्रतिशत आयात कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से करता है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत आपूर्ति अकेले कतर से होती है।

कब तक रहेगा संकट?

ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यह व्यवधान कितने समय तक जारी रहेगा? क्या कच्चे तेल तथा एलएनजी की कीमतें आगे भी बढ़ती रहेंगी? पहले प्रश्न का उत्तर मुख्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध कब तक चलेगा। किंतु यह भी स्पष्ट है कि कीमतों पर पड़ने वाला प्रभाव युद्ध की अवधि से अधिक समय तक बना रह सकता है। कच्चे तेल और एलएनजी की कीमतों में वृद्धि के अतिरिक्त, समुद्री परिवहन व बीमा लागतों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए, लाल सागर में लगभग डेढ़ साल पहले जहाजों पर हूती हमले हुए थे, जिसके कारण जहाजों की बीमा दरें बढ़ी थीं, वह आज तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी हैं। वर्तमान में फारस की खाड़ी क्षेत्र की स्थिति अधिक गंभीर है। यह केवल बीमा दरों में वृद्धि का मामला नहीं रह गया है, बल्कि जहाजों और माल के बीमा की सेवा देने वाली बारह प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में से सात ने इस क्षेत्र में ‘युद्ध जोखिम बीमा’ प्रदान करना ही बंद कर दिया है।

अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है

एलएनजी आपूर्ति में व्यवधान का तात्कालिक प्रभाव भारतीय बाजार पर भी दिख रहा है। गेल इंडिया लिमिटेड ने उद्योगों के लिए गैस आपूर्ति में कटौती की घोषणा की है, जबकि शहरों की गैस वितरण व्यवस्था और उर्वरक क्षेत्र के लिए आपूर्ति बनाए रखने का निर्णय लिया गया है, ताकि आवश्यक सेवाओं पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। भारत के पास कच्चे तेल का भंडार लगभग 25 दिनों तक की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। इसी बीच, ट्रंप ने अमेरिकी प्रतिबंधों में आंशिक ढील देने की घोषणा की है, जिससे रूस से भारत कच्चा तेल खरीद सकेगा। यह तेल पहले से ही समुद्र में मौजूद जहाजों के माध्यम से उपलब्ध है। हालांकि, इससे भारत को सीमित राहत ही मिलेगी। एक प्रतिष्ठित ऊर्जा व्यापार पत्रिका के अनुसार, भारत खाड़ी क्षेत्र से प्रतिदिन लगभग 28 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है। इसके अतिरिक्त, समुद्र में टैंकरों के माध्यम से उपलब्ध रूसी तेल की मात्रा भी लगभग 196 लाख बैरल से घटकर 70 लाख बैरल रह गई है। इस सीमित मात्रा का अधिकांश भाग पहले ही चीन के लिए निर्धारित किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में भारत के पास उपलब्ध रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडार केवल लगभग 20-25 दिनों की आवश्यकता को ही पूरा कर सकते हैं।

क्षेत्रीय आयाम

युद्ध शुरू होने से पहले ही क्षेत्रीय देशों ने संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता जता दी थी। अरब के नौ देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने संयुक्त रूप से ट्रंप को पत्र लिखकर सैन्य विकल्प अपनाने से परहेज करने की सलाह दी थी। सउदी अरब और यूएई ने तो स्पष्ट कहा था कि उनके भू-भाग और वायुक्षेत्र का उपयोग ईरान के विरुद्ध किसी सैन्य अभियान के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इन देशों को आशंका थी कि युद्ध से अनिवार्य रूप से उन्हें भी परोक्ष नुकसान हो सकता है। दरअसल, ये देश किसी युद्ध में नहीं पड़ना चाहते, क्योंकि पूरे क्षेत्र में अधिकांश तेल और ऊर्जा प्रतिष्ठान फारस की खाड़ी के निकट पूर्वी हिस्से में स्थित हैं, जिससे किसी भी सैन्य संघर्ष की स्थिति में उनके प्रभावित होने की आशंका अत्यधिक रहती है। बाद की घटनाओं ने इन देशों की आशंकाओं को काफी हद तक सही सिद्ध कर दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि युद्ध कब तक चलेगा? यदि इस संघर्ष के उद्देश्य परमाणु मुद्दे से आगे बढ़कर शासन परिवर्तन तक विस्तृत हो जाते हैं, तो यह एक दीर्घकालिक और जटिल संघर्ष का रूप ले सकता है। युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था को उतनी ही अधिक क्षति पहुंचने की आशंका रहेगी। इसके अलावा, लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही तो आतंकी समूह उभर सकते हैं, जैसा कि इराक में हुआ था। हालांकि, 2002 में अमेरिका के नेतृत्व में शुरू किया गया सैन्य अभियान अपेक्षाकृत शीघ्र ही उसके पक्ष में समाप्त हो गया था, लेकिन उसके दीर्घकालिक परिणामस्वरूप क्षेत्र में गहरी अस्थिरता पैदा हुई, जिससे अंततः इस्लामिक एस्टेट जैसे आतंकी संगठन उभरे। वास्तव में परमाणु मुद्दे का समाधान कूटनीतिक वार्ताओं के माध्यम से संभव था, जिसका संकेत ओमान के विदेश मंत्री के वक्तव्य से मिलता है। लेकिन मिसाइल मुद्दे पर ईरान कभी समझौता नहीं करेगा, क्योंकि इस्राएल और अमेरिकी हमलों की सूरत में यही उसकी एकमात्र रक्षात्मक शक्ति है। रही बात लेबनान और सीरिया की, तो इनके भविष्य का निर्णय वहां के लोगों को ही करने देना चाहिए। ये अरब देश हैं, जहां विदेशी मौजूदगी का कोई औचित्य नहीं है।

ऊर्जा (तेल-गैस) के अलावा भी भारत के लिए ईरान के साथ संबंध रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। ईरान में भारत के राजदूत के रूप में मुझे चाबहार बंदरगाह समझौते में भारत की भागीदारी पर बातचीत करने का अवसर मिला। यह बंदरगाह भारत के लिए अफगानिस्तान तक पहुंचने का महत्वपूर्ण रास्ता है। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भी ईरान से होकर गुजरता है। यह मार्ग भारत को रूस और मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए एक छोटा और तेज व्यापारिक रास्ता प्रदान करता है। इसके अलावा, भारत और ईरान के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक व भाषायी संबंध भी रहे हैं। पारसियों के पवित्र ग्रंथ Avesta की भाषा पर संस्कृत का प्रभाव रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर सालेही से मेरी पहली मुलाकात के दाैरान उन्होंने बताया था कि फारसी भाषा की जड़ें भी संस्कृत से जुड़ी हुई हैं। आज भी फारसी भाषा में संस्कृत के कई शब्द मिलते हैं। कुछ पीढ़ियों पहले तक ईरान के कुछ गांवों में संस्कृत जैसी भाषा बोली जाती थी। ईरानी लोग इस्लाम से पहले के इतिहास और विरासत पर गर्व करते हैं। इसी कारण पारसी नववर्ष नवरोज को ईरान में राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाता है, जिसकी परंपरा प्राचीन (पूर्व-इस्लामी) काल से चली आ रही है।

वर्तमान स्थिति में तत्काल युद्धविराम जरूरी है। सभी पक्षों को पुन: वार्ता की मेज पर लौटना चाहिए। वैसे भी इराक, लीबिया और अफगानिस्तान में किए गए सत्ता परिवर्तन के प्रयासों से अमेरिका को कई अनपेक्षित और जटिल परिणामों का सामना करना पड़ा है। ईरान के परमाणु मुद्दे पर समझौता संभव था, जैसा कि अल-बुसैदी ने भी कहा था। इसलिए इस समझौते की प्रक्रिया को पुनः शुरू किया जाना चाहिए। इसके बदले ईरान अपने ऊपर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की अपेक्षा करेगा। यदि ऐसा होता है, तो भारत और अन्य देशों की कंपनियों के लिए ईरान के साथ व्यापार फिर से शुरू करने तथा उसके तेल और गैस क्षेत्र में निवेश करने का रास्ता खुल जाएगा।

इस बीच, अयातुल्लाह खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सर्वोच्च नेता चुना गया है। यह बदलाव ऐसे समय पर हुआ है, जब क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक चिंताएं पहले से ही बढ़ी हुई हैं। उधर, 9 मार्च को ट्रंप ने बयान दिया कि युद्ध ‘बहुत जल्दी समाप्त हो जाएगा।’ ट्रंप का बयान ऐसे समय आया, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें अचानक बढ़कर 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं और दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई थी। हालाँकि, बाद में स्थिति कुछ स्थिर हुई और ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत घटकर लगभग 94 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया की राजनीतिक परिस्थितियों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव न केवल ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों की स्थिरता को भी चुनौती देता है। भविष्य में स्थायी शांति की उम्मीद तभी की जा सकती है, जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकले और उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि क्षेत्र में कोई नई उकसाने वाली घटना न हो, क्योंकि ऐसी घटनाएं तनाव को फिर से बढ़ा सकती हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया में स्थिरता केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक हितों से भी जुड़ी हुई है। इसलिए कूटनीतिक संवाद, आपसी विश्वास और संतुलित नीतियां ही दीर्घकालिक शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

Topics: अयातुल्लाह अली खामेनेईमोजतबा खामेनेईफारस की खाड़ी#IranIsraelWar #EnergyCrisis #OilPricesईरान-इस्राएलअमेरिका संघर्षभारतीय अर्थव्यवस्थाएलएनजी (LNG)चाबहार बंदरगाहजिनेवा वार्ताडोनाल्ड ट्रंपआर्थिक प्रतिबंधपाञ्चजन्य विशेषभारत-ईरान सांस्कृतिक विरासतहोर्मुज जलडमरूमध्य
दिनकर प्रकाश श्रीवास्‍तव
दिनकर प्रकाश श्रीवास्‍तव
पूर्व राजदूत, ईरान [Read more]
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