नाट्य कला एवं संस्कृति का महाकुंभ
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नाट्य कला एवं संस्कृति का महाकुंभ

रंगमंच के अंतरष्ट्रीय फलक पर भारत रंग महोत्सव 2026 ने अपनी यात्रा के 25 साल पूरा किया है। भारंगम के रजत जयंती आयोजन में पूरे भारत में 40 से ज़्यादा जगहों और हर महाद्वीप के एक देश में नाटक प्रस्तुत किया गया। इस महोत्‍सव में 277 भारतीय और 12 अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन शामिल था, जिन्हें 288 भाषाओं और बोलियों में पेश किया गया, जो रंग संवाद का एक जीवंत प्रमाण है।

Written byडॉ. राजीव श्रीवास्तवडॉ. राजीव श्रीवास्तव
Mar 13, 2026, 08:26 am IST
in विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
नाटक लाैह पुरुष का एक दृश्य

नाटक लाैह पुरुष का एक दृश्य

लौह पुरुष के इस एकात्म प्रेरणा से ऊर्जित विश्व का वृहत्तर रंगमंच महोत्सव का 25वां संस्करण ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’, मंडी हाउस, नई दिल्ली के परिसर में 27 जनवरी को प्रारंभ हुआ था। इस महोत्सव के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। आयोजन के इस अवसर पर उन्होंने ‘रंग अभिलेख‘ नामक डिजिटल संग्रह का उद्घाटन किया, जो वर्तमान समय में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आधुनिक समय में प्रारंभ किया गया एक आवश्यक तंत्र है जो अपने ऐतिहासिक एवं शोधपूर्ण संदर्भ को लेकर एक महत्वपूर्ण सूत्र होगा।

सरदार पटेल का स्मरण

यह साल वर्ष 2026 सरदार वल्लभ भाई पटेल की डेढ़ सौवीं जयंती और पचहत्तरवीं पुण्य तिथि की वर्षगांठ का है। गुजरात के केवड़िया में स्थित एकता की मूर्ति अर्थात स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर एक भव्य नाटक ‘लौह पुरुष‘ का मंचन किया गया। यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा निर्मित है, जिसमें दो सौ कलाकारों ने भाग लिया था। इसमें प्रकाश प्रक्षेपण प्रभाव और ऑगमेंटेड रियलिटी तकनीकों का उपयोग किया गया था, जिसमें दर्शकों के मध्य सरदार पटेल के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को जीवंत रूप में प्रदर्शित कर गया। नाटक का मंचन 30-31 अक्टूबर 2025 को किया गया था। इसके बाद इसे दिल्ली, अहमदाबाद सहित देश के अन्य नगरों में प्रदर्शित किए जाने का उपक्रम निरंतर चल रहा है। डेढ़ सौवीं जन्म जयंती के इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह नाट्य मंचन देखने के साथ ही स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर पुष्प अर्पित किए और एकता दिवस की शपथ दिलाई। इस समारोह में विभिन्न राज्यों की झांकियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और परेड भी आयोजित किए गए थे।

एकनिष्ठता का संदेश

27 जनवरी से 20 फरवरी 2026 के मध्य आयोजित इस नाट्य महोत्सव में नौ देशों की दो सौ से अधिक प्रस्तुतियां प्रस्तुत की गई, जिसमें 33 महिला निर्देशकों द्वारा निर्देशित नाटक, विशेष रूप से सक्षम व्यक्तियों, ट्रांसजेंडर समुदाय और स्थानीय थिएटर समूहों द्वारा प्रस्तुतियां सम्मिलित हैं। यह महोत्सव भारत के ग्यारह नगरों और नेपाल व श्रीलंका में आयोजित किया गया। इस वर्ष नाट्य महोत्सव का विषय ‘एक अभिव्यक्ति, सर्वोच्च सृजन‘ था, जिसमें अभिव्यक्ति का एकात्म और मानवता की एकनिष्ठता का संदेश समाहित था। महोत्सव पारंपरिक, लोक, आधुनिक और अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रस्तुतियों का अद्वितीय संगम था, जो संपूर्ण अवधि में नाट्य प्रेमियों को आकर्षित करता रहा।

प्रति वर्ष आयोजित होने वाला यह अंतर्राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव अपने रजत जयंती संस्करण के साथ इस वर्ष विशेष आकर्षण का केंद्र था। गीत-संगीत, अभिनय, निर्देशन एवं अन्य संबंधित कारकों के सान्निध्य-संरक्षण में यह नाट्य महोत्सव हिंदी, अंग्रेजी सहित भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अपने सर्वश्रेष्ठ चयनित नाट्य प्रस्तुतियों के सर्वोत्तम मंचन हेतु जाना जाता है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सहित अन्य समूह एवं संस्थानों द्वारा मंचित नाटकों की सूची में प्रमुख रूप से उद्धृत किए जानेवाले नाटकों में हिंदी नाटक ‘कर्णनो वेश’ की प्रस्तुति महत्वपूर्ण थी। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक पी. एस. चारी द्वारा निर्देशित इस नाटक के पटकथा लेखक संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉ. महेश चंपकलाल थे।

इसी क्रम मे विभा छिब्बेर द्वारा निर्देशित हिंदी नाट्य ‘सुनो ना यार’ का मंचन भी उल्लेखनीय है। इस नाटक के लेखक चिराग खण्डेलवाल एवं प्रमुख कलाकारों में राजेन्द्र शर्मा, गीता शर्मा व आरुष पतेर्या थे। थिएटर का शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करके एक कलाकार का कार्य किस प्रकार सहज अभिनय का पर्याय बन जाता है उसका एक प्रभावी उदाहरण ‘सुनो ना यार’ का मंचन था। सामाजिक ताने-बाने से गुंथा यह नाटक परिवार के सदस्यों के मध्य संबंधों और उनकी जटिलताओं को परोसता है।

‘भारत रंग महोत्सव’ के अंतर्गत नाटकों के मंचन की श्रृंखला में ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ के शिक्षक, छात्र और अन्य सहायकों की प्रस्तुति को मंचित होते देखना प्रायः एक सुखद अनुभूति का कारक रहता है। इस श्रृंखला में अरुणा कुमार मलिक द्वारा निर्देशित हिंदी नाटक ‘भूत की आत्मकथा’ का मंचन विशेष रूप से सराहनीय रहा। संदेश युक्त सुरुचिपूर्ण इस प्रस्तुति में बाल कलाकारों के साथ युवा एवं प्रौढ़ पात्रों को एक साथ मंच पर अभिनय करते देखना मनोरंजन के साथ ही ज्ञानवर्धन का भी माध्यम था।

रंगारंग कार्यक्रम का एक दृश्य

‘आदि रंग‘ का ओज

नाट्य उत्सव के इस वृहद् आयोजन में ‘आदि रंग महोत्सव’ का अपना एक पृथक ही ओज था। देश के कोने-कोने से पधारे आदिवासी जनजातियों के विभिन्न समूहों ने नृत्य-संगीत के अपने पारंपरिक लोक शैली को प्रस्तुत करते हुए एक समृद्ध परंपरा को प्रस्तुत किया। उत्तर-पूर्व के राज्यों सहित विभिन्न भारतीय राज्यों के लोक नृत्यों की साझा प्रस्तुतियां अद्भुत रही। इस आदिवासी नृत्य श्रृंखला का मिश्रित आयोजन ‘आदि रंग महोत्सव’ के समापन सत्र में जिसमें विभिन्न राज्यों के आदि लोक नृत्यों की झांकियों की एक मोहक परिदृश्य लड़ियों में पिरो कर प्रस्तुत किया गया था, जो अविस्मरणीय रहा।

‘लौह पुरुष’ का मंचन

विश्व के इस वृहत्तर नाट्य महोत्सव का सर्वाधिक आकर्षक, प्रभावी एवं समसामयिक नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय परिसर के मुक्त प्रांगण में सरदार पटेल की डेढ़ सौवीं जयंती को समर्पित विराट नाट्य प्रस्तुति ‘लौह पुरुष’ का मंचन हुआ था। इस नाटक की परिकल्पना, संगीत एवं निर्देशन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वर्तमान निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया था। जबकि सरदार पटेल के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आधारित इस नाटक का लेखन आसिफ अली और शोध डॉ. रिजवान कादरी ने किया था।

लौह पुरुष का मंचन अपनी भव्यता से उत्सर्जित दिव्यता के ओज में जिस विराट स्वरूप का दर्शन कराया वह रंगमंच के अब तक की यत्र तत्र सर्वत्र एवं अन्यत्र की गई ढेरों प्रस्तुतियों के इतिहास में नाट्य मंचन का विशाल जीवंत कीर्तिमान स्थापित कर गया। दो सौ से भी अधिक की संख्या में कलाकारों के समूह में प्रत्येक आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष-बालक-बालिका का समुच्चय अद्भुत था। अभिनय की सूक्ष्मता को इस एक बिंदु से समझा जा सकता है कि मंच पर एक कोने में खड़ा पात्र भी भूमिका के परिक्षेत्र में न रहते हुए भी अपनी सक्रियता के प्रति सहज रूप से सजग था।

हाथो में तिरंगा लिए कलाकार

उत्कृष्टता की नूतनता

भारत रंग महोत्सव का यह समापन सत्र अवश्य था, परंतु ‘लौह पुरुष’ की इस विराट प्रस्तुति ने भविष्य के व्योम पर एक ऐसा चित्र उकेर दिया था, जो वैश्विक स्तर पर आने वाले समस्त नाट्य उत्सवों के लिए उत्कृष्टता का एक नूतन अध्याय लिख गया है। आगत महोत्सवों के लिए यह एक चुनौती है जो इससे भव्य प्रस्तुति तथा आयोजन की प्रशासनिक क्षमता की स्तरीय गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के संकल्प के प्रति कृत संकल्पित होने हेतु प्रत्येक निर्देशक-आयोजक को अनिवार्य रूप से बाध्य करेगा।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के इस सफल आयोजन के लिए रा.ना.वि. के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी और उनके समस्त सहयोगी, अधिकारी, विद्यार्थी, कर्मी तथा मंत्रालय बधाई के पात्र हैं। विदा का यह सत्र अपने पुनः आगमन की उत्कंठा जगा गया है। नाट्य कला एवं संस्कृति का यह महाकुंभ प्रति वर्ष रथी-महारथियों का वैश्विक संगम इसी प्रकार रचाता रहेगा तथा स्वप्निल परिकल्पनाओं को जीवंत एवं प्रगाढ़ करता रहेगा।

Topics: नाट्य कला एवं संस्कृतिरंग संवादडिजिटल संग्रहआधुनिक तकनीकऑगमेंटेड रियलिटीएकता की मूर्तिप्रकाश प्रक्षेपणविविधता में एकतासामाजिक एवं सांस्कृतिकपाञ्चजन्य विशेषआदि रंग महोत्सवलौह पुरुषआदिवासी लोक कलारजत जयंतीनृत्य का संगमभारत रंग महोत्सवराष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
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