लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बोले-सदन की मर्यादा बनाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी, अटल बिहारी वाजपेयी का किया जिक्र
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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बोले-सदन की मर्यादा बनाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी, अटल बिहारी वाजपेयी का किया जिक्र

बिरला ने कहा कि यह सदन समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बने। सदन की कार्यवाही निष्पक्षता, अनुशासन और संतुलन के साथ संचालित हो।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Lalit Fulara
Mar 12, 2026, 03:20 pm IST
in भारत

नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला अपने खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के बुधवार को ध्वनिमत से खारिज होने के बाद गुरुवार को अध्यक्ष के आसन पर बैठे। बिरला ने कहा कि भारत के संसदीय इतिहास में तीसरी बार लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर संकल्प आया और इस पर दो दिनों तक 12 घंटे से अधिक चर्चा हुई। उनका हमेशा प्रयास रहा है कि सदन के भीतर प्रत्येक सदस्य नियमों और प्रक्रियाओं के तहत अपने विचार व्यक्त कर सके और सभी को पर्याप्त अवसर मिले।

बिरला ने कहा कि यह सदन समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बने। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 में अध्यक्ष के निर्वाचन का प्रावधान है और इस पावन सदन ने उन्हें दूसरी बार अध्यक्ष पद का दायित्व दिया। उनका प्रयास रहा है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्षता, अनुशासन और संतुलन के साथ संचालित हो। दस फरवरी को विपक्ष के कुछ सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था और उन्होंने अपने नैतिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए प्रस्ताव के प्रस्तुतीकरण के साथ ही सदन की कार्यवाही से स्वयं को अलग कर लिया था।

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सदन नियमों से चलता है और ये नियम न सरकार ने बनाए हैं, न प्रतिपक्ष ने
उन्होंने कहा कि इस चर्चा के दौरान अनेक विचार, दृष्टिकोण और भावनाएं सामने आईं और उन्होंने सभी को गंभीरता से सुना। उन्होंने सदन के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया। बिरला ने स्पष्ट किया कि कुछ सदस्यों का मानना था कि प्रतिपक्ष के नेता सदन से ऊपर उठकर किसी भी विषय पर बोल सकते हैं, लेकिन यह किसी को विशेष अधिकार नहीं है। सदन नियमों से चलता है और ये नियम न सरकार ने बनाए हैं, न प्रतिपक्ष ने, बल्कि सदन ने बनाए हैं और सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री या मंत्रीगण भी यदि सदन में वक्तव्य देना चाहते हैं तो नियम 372 के तहत अध्यक्ष से अनुमति लेनी होती है। किसी सदस्य को नियमों से परे जाकर बोलने का विशेषाधिकार नहीं है।

पूर्व मुख्यमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का किया जिक्र
उन्होंने संसदीय परंपराओं का जिक्र करते हुए कहा कि 1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित कुछ फोटो सदन में रखने चाहे तो स्पीकर ने पहले उन्हें दिखाने का निर्देश दिया और अटल जी ने उसका सम्मान किया। उन्होंने 1958 में भी कई उदाहरण हैं जब बिना स्पीकर की अनुमति दस्तावेज सदन में नहीं रखे गए। बिरला ने कहा कि अध्यक्ष के निर्णय से कोई भी सदस्य सहमत या असहमत हो सकता है, लेकिन नियमों और परंपराओं को लागू करना उनका कर्तव्य है। जब भी कुछ सदस्य सदन की मर्यादा के विरुद्ध आचरण करते हैं तो उन्हें कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 105 का हवाला देते हुए कहा कि संसद में बोलने की आजादी है, लेकिन यह सदन द्वारा स्वीकृत नियमों और स्थाई आदेशों के अधीन है।

उन्होंने प्रतिपक्ष द्वारा माइक बंद करने के आरोपों पर कहा कि आसन के पास कभी भी माइक ऑन-ऑफ करने का बटन नहीं होता। जिस सदस्य को बोलने की अनुमति दी जाती है, उसी का माइक ऑन होता है। उन्होंने महिला सदस्यों के सम्मान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा महिला सांसदों को बोलने का पर्याप्त अवसर दिया और प्राथमिकता दी, लेकिन जब कुछ महिला सदस्य वेल पार कर ट्रेजरी बेंच की तरफ जाकर नारेबाजी कर रही थीं और बैनर दिखा रही थीं, तो अप्रत्याशित स्थिति बन सकती थी। इसलिए उन्होंने सदन की व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री को बोलने से रोका।

सदन की मर्यादा और परंपराएं बनाए रखना जरूरी
बिरला ने कहा कि उनका प्रयास हमेशा रहा है कि किसी सदस्य का निलंबन न हो, लेकिन सदन की व्यवस्था बनाए रखना भी उनकी जिम्मेदारी है। जब कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं तो उनका मन दुखी होता है, लेकिन यह सोचना होगा कि ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा कि 1997 और 2001 में भी सदन की मर्यादा और गरिमा पर चर्चा हुई थी और सर्वसम्मति से संकल्प लिया गया था कि नारेबाजी, पोस्टर दिखाना, कागज फाड़ना और अभद्र मुद्राओं का प्रदर्शन नहीं किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि उस समय सोनिया गांधी ने भी कहा था कि वेल में आने पर पूर्ण रोक लगनी चाहिए और उल्लंघन पर स्वतः अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। सदन की मर्यादा और परंपराएं बनाए रखना जरूरी है क्योंकि सदन का आचरण पूरे देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए उदाहरण होता है। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में व्यवस्था बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। बिरला ने कहा कि उन्हें अच्छा नहीं लगता कि बार-बार कहना पड़े कि तख्तियां दिखाना, नारे लगाना, कागज फाड़ना और मेजों पर चढ़ना संसदीय लोकतंत्र की परंपरा नहीं है। सदन और देश इस मत से सहमत नहीं है। उन्होंने आग्रह किया कि सदन में अच्छी परंपराओं और मर्यादाओं को बनाए रखने के लिए सामूहिक संकल्प लिया जाए और सामूहिक विचार-विमर्श हो। सदन को देखकर देश का विश्वास और भरोसा कायम रहता है और लाखों लोग अपेक्षा करते हैं। इसलिए हमें सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिए।

Topics: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरलाLok Sabha SpeakerFormer PM Atal Bihari VajpayeeDignity of the HouseOm Birla
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