लोकतंत्र को सशक्त बनाने में तकनीक की भूमिका अहम : ओम बिरला
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लोकतंत्र को सशक्त बनाने में तकनीक की भूमिका अहम : ओम बिरला

राष्ट्रमंडल सम्मेलन से पहले लोकतंत्र और तकनीक पर बड़ा संदेश। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक संसद को अधिक समावेशी, प्रभावी और नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाएगी।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Jan 15, 2026, 03:11 pm IST
inभारत, दिल्ली

नई दिल्ली (हि.स.) । लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोकतांत्रिक संस्थानों को अधिक समावेशी, प्रभावी और नागरिकों के प्रति उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। बदलते समय में संसदों को नई तकनीकी क्षमताओं को अपनाते हुए लोकतंत्र के मूल मूल्यों की रक्षा करनी होगी।

राष्ट्रमंडल सम्मेलन की पृष्ठभूमि में लेख

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे अपने लेख में राष्ट्रमंडल के लोकसभा अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन की पृष्ठभूमि में लोकतंत्र और तकनीक के आपसी संबंधों पर विस्तार से बताते हुए कहा कि सर्दियों की धुंध के बीच ऐतिहासिक संविधान सदन राष्ट्रमंडल देशों की संसदीय परंपराओं के संरक्षकों की मेजबानी के लिए तैयार है। 28वें राष्ट्रमंडल लोकसभा अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में अपने साथी लोकसभा अध्यक्षों का स्वागत करना बड़ी जिम्मेदारी का विषय है।

संसदीय कार्यप्रणाली में तकनीकी बदलाव

उन्होंने कहा कि आज संसदों का कार्यक्षेत्र उन शक्तियों से बदल रहा है, जिनकी कल्पना पूर्वजों ने शायद ही की होगी। नियम-पुस्तिका जैसे पारंपरिक प्रतीकों के साथ अब एल्गोरिदम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भी संसदीय कार्यवाही का हिस्सा बन रहे हैं। इसी कारण सम्मेलन के लिए चुने गए विषय वर्तमान समय की चुनौतियों और संभावनाओं से जुड़े हैं।

राष्ट्रमंडल संसदीय सहयोग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ओम बिरला ने राष्ट्रमंडल संसदीय सहयोग का जिक्र करते हुए कहा कि इसकी शुरुआत 1969 में कनाडा के लुसिएन लैमोरक्स की पहल पर हुई थी, जिसका उद्देश्य निष्पक्ष और कार्यपालिका से स्वतंत्र संसदीय संस्थानों को बढ़ावा देना था। ओटावा स्थित स्थायी सचिवालय के साथ यह मंच साझा लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक बना हुआ है।

राष्ट्रमंडल मंच पर भारत की भूमिका

उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से इस परंपरा का एक मजबूत स्तंभ रहा है और उसे तीन बार पहले भी राष्ट्रमंडल लोकसभा अध्यक्षों सम्मेलन की मेजबानी करने का अवसर मिला है। जनवरी 2026 में नई दिल्ली चौथी बार इस प्रतिष्ठित सम्मेलन की मेजबानी करेगी, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि संसदीय संस्थान नागरिकों की अपेक्षाओं के अनुरूप विकसित होते रहें।

संविधान सदन का ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व

लोकसभा अध्यक्ष ने संविधान सदन के महत्व को बताते हुए कहा कि यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि वह पवित्र स्थल है जहां भारत के संविधान का निर्माण हुआ। यह लोकतंत्र की जननी की भावना का प्रतीक है। आधुनिक तकनीक अपनाए जाने के बावजूद संप्रभुता, प्रतिनिधित्व और बहस जैसे मूल लोकतांत्रिक मूल्य अपरिवर्तित रहेंगे।

डिजिटल युग में संसदों की नई चुनौतियां

उन्होंने कहा कि भविष्य का संचालन अतीत के उपकरणों से संभव नहीं है। भारत के एक वैश्विक तकनीकी केंद्र के रूप में उभरने से राष्ट्रमंडल देशों को लोकतंत्र में हो रहे डिजिटल परिवर्तन से निपटने का साझा अवसर मिलता है। नई दिल्ली इस विषय पर सामूहिक सहमति विकसित करने का मंच बनेगी।

डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में भारत

उन्होंने कहा कि भारत केवल डिजिटलीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लोकसभा में उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरणों का उपयोग नागरिकों और उनके प्रतिनिधियों के बीच की दूरी कम करने के लिए किया जा रहा है।

संसद भाषिनी परियोजना और भाषाई समावेशिता

उन्होंने संसद भाषिनी परियोजना का जिक्र करते हुए कहा कि बहुभाषी समाज में भाषा लोकतंत्र के मार्ग में बाधा नहीं बननी चाहिए। वास्तविक समय में अनुवाद और लिप्यंतरण की सुविधा से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सांसद अपनी मातृभाषा में बोल सकें और उनकी बात तुरंत अन्य सदस्यों तथा उनके निर्वाचन क्षेत्र तक पहुंचे। यह व्यवस्था समावेशिता को मजबूती प्रदान करेगी।

विधायी कार्यों में एआई का उपयोग

उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता विधायी अनुसंधान, कानून निर्माण और बजट विश्लेषण जैसे जटिल कार्यों में सहायक बन सकती है। इससे संसदों की कार्यक्षमता बढ़ेगी और नागरिकों के कल्याण को नई गति मिलेगी।

वैश्विक सार्वजनिक भलाई के रूप में तकनीक

वसुधैव कुटुंबकम की भावना के तहत भारत राष्ट्रमंडल देशों के साथ अपना डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा साझा करने को तैयार है। भारत तकनीक को निजी संपत्ति नहीं, बल्कि वैश्विक सार्वजनिक भलाई के रूप में देखता है।

तकनीक से जुड़ी नई चुनौतियां

ओम बिरला ने कहा कि तकनीक के लाभों के साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। सोशल मीडिया ने संसद को जनता के करीब लाया है, लेकिन ऑनलाइन उत्पीड़न और डीपफेक जैसी समस्याएं भी बढ़ी हैं। सदन की गरिमा की रक्षा अब डिजिटल क्षेत्र तक विस्तारित हो चुकी है।

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