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आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष: केवल कार्रवाई नहीं, वैश्विक रणनीति जरूरी

आज आतंकवाद केवल कुछ व्यक्तियों की गतिविधि नहीं है। यह वैचारिक कट्टरता, भर्ती नेटवर्क, वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण केंद्र और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा एक जटिल तंत्र बन चुका है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Mar 10, 2026, 03:40 pm IST
inमत अभिमत
आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई (फोटो - प्रतीकात्मक)

आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई (फोटो - प्रतीकात्मक)

आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष एक ऐसे मोड़ पर है जहां आधे-अधूरे प्रयास खतरनाक साबित हो सकते हैं। पिछले कई दशकों में दुनिया ने कई बार आतंकवादी संगठनों और उनके समर्थकों के विरुद्ध अभियान चलाए हैं, लेकिन इतिहास बताता है कि केवल एक या दो लक्ष्यों को निशाना बनाने से स्थायी समाधान नहीं मिलता।

आज आतंकवाद केवल कुछ व्यक्तियों की गतिविधि नहीं है। यह वैचारिक कट्टरता, भर्ती नेटवर्क, वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण केंद्र और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा एक जटिल तंत्र बन चुका है।

आतंकवाद का इको सिस्टम

दुनिया के कई क्षेत्रों में सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि कुछ स्थान ऐसे बन गए हैं जहां आतंकी संगठनों को संरक्षण और अवसर मिलता रहा है। पाकिस्तान का नाम अक्सर ऐसे संदर्भों में चर्चा में आता रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में यह प्रश्न उठाया गया है कि कुछ उग्रवादी-आतंकवादी संगठनों और स्थानीय नेटवर्कों के बीच जटिल संबंध मौजूद रहे हैं।

भारत के लिए यह अनुभव अत्यंत गहरा रहा है। 1947 के विभाजन के बाद से सीमा-पार आतंकवाद और प्रॉक्सी संघर्षों ने क्षेत्रीय स्थिरता को बार-बार चुनौती दी है।

अस्थायी गठबंधनों की सीमाएं

पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका, ने कई बार आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में कुछ देशों को रणनीतिक साझेदार के रूप में स्वीकार किया है। शीत युद्ध और 9/11 के बाद की परिस्थितियों में यह नीति अक्सर रणनीतिक आवश्यकता से प्रेरित रही। लेकिन आलोचक कहते हैं कि यदि मूल समस्याओं को हल नहीं किया जाए तो ऐसी नीतियां अंततः उसी संकट को दोहराती हैं।

रूस की भूमिका

वैश्विक स्थिरता के लिए रूस जैसे प्रमुख देश की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। रूस लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसकी सुरक्षा चिंताओं को समझा जाए, विशेषकर तब जब सैन्य गठबंधन उसके सीमावर्ती क्षेत्रों की ओर विस्तार करते दिखाई देते हैं।

यदि इन चिंताओं की अनदेखी की जाती है तो अविश्वास और टकराव बढ़ सकता है। इसलिए कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ऊर्जा सहयोग, प्रतिबंधों पर पुनर्विचार और रणनीतिक संवाद जैसे कदम तनाव कम करने में सहायक हो सकते हैं।

चीन का उभरता प्रभाव

चीन का उदय भी वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहा है। अपने ही क्षेत्रों में उग्रवाद के विरुद्ध कठोर नीति अपनाने के साथ-साथ चीन वैश्विक राजनीति में तेजी से प्रभाव बढ़ा रहा है।

इस बदलते शक्ति संतुलन के कारण आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग और अधिक जटिल हो जाता है।

नए शीत युद्ध से बचाव

यदि रूस स्वयं को पश्चिमी व्यवस्था से अलग-थलग महसूस करता है, तो उसके चीन के साथ स्थायी रणनीतिक गठबंधन की संभावना बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति विश्व को शीत युद्ध से भी अधिक जटिल और अस्थिर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की ओर ले जा सकती है।

स्थायी समाधान की दिशा

आतंकवाद के विरुद्ध स्थायी सफलता के लिए दुनिया को एक सुसंगत और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। इसमें केवल आतंकवादियों को निशाना बनाना ही नहीं बल्कि उन परिस्थितियों को समाप्त करना भी शामिल है जो उन्हें जन्म देती हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक शक्तियों के बीच सहयोग को मजबूत किया जाए। एक विभाजित विश्व में आतंकवाद जैसी चुनौतियों से निपटना और कठिन हो जाएगा, जबकि सहयोग पर आधारित व्यवस्था स्थिरता और शांति की बेहतर संभावना प्रदान कर सकती है।

 

Topics: सीमा पार आतंकवादभारत पाकिस्तान संबंधरूस-चीन गठबंधनवैश्विक सुरक्षाभूराजनीतिआतंकवाद का इकोसिस्टमराष्ट्रीय_सुरक्षाआतंकवादविदेश नीति
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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