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निवेशकों के लिए सीख और सावधानियां

एज्राएल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एकजुट धावा बोलकर पश्चिम एशिया में जो युद्ध छेड़ दिया है, उससे दलाल स्ट्रीट में भूचाल आ गया और निवेशकों के करीब 10 लाख करोड़ रुपए खाक हो चुके हैं। तीन दिन की गिरावट के बाद 5 मार्च को बाजार संभला और लाल निशान से पीछा छुड़ाकर हरे में आया। ऐसे में छोटे निवेशकों को कुछ सावधानियां रखनी होंगी

Written byसुमित मेहतासुमित मेहता
Mar 8, 2026, 09:49 pm IST
inविश्लेषण, बिजनेस

उथल-पुथल के इस दौर में ध्यान देने की बात है कि बड़े निवेशकों को, जिनमें विदेशी और घरेलू निवेशक भी शामिल हैं, ऐसी भू-राजनीतिक गतिविधियों और उनके शेयर बाजार पर पड़ने वाले संभावित असर की अच्छी समझ होती है। इसके अलावा निवेश का उनका पेशेवर तरीका उन्हें युद्ध के दुष्परिणामों से अपनी पूंजी-संपत्ति को बचाने में काफी हद तक मदद करता है। लेकिन छोटे निवेशक की बात अलग होती है। बड़े निवेशकों की तुलना में जरूरी जानकारी और समझ तक उनकी पहुंच सीमित होती है। इस वजह से या तो वे घबराकर गलत फैसले कर बैठते हैं, या जब अच्छे मौके बन रहे होते हैं तो वे बाजार से बाहर रह जाते हैं।

सबसे पहले, इस सूत्र को गांठ बांध लें कि बाजार युद्ध से नहीं, बल्कि अनिश्चितता से डरते हैं। जब कोई युद्ध शुरू होता है, तो बाजार के बड़े निवेशक भलीभांति समीक्षा करके निवेश के मौकों की पहचान करते हैं। लोगों को इसे ध्यान में रखना चाहिए कि ऐसी वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता के माहौल में बाजार में आए किसी भी उतार-चढ़ाव का मतलब यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था डूब गई है, बल्कि ऐसी स्थितियों में पूंजी—संपत्ति को फिर से तैयार करना समझदारी है। उन्हें समझना चाहिए कि ऐसे संकट के समय बाजार हमेशा उतार-चढ़ाव का शिकार होता है और गिरावट दिखाने लगता है, लेकिन जैसे ही युद्ध खत्म होता है, सभी क्षेत्र तेजी से उबरने लगते हैं।

छोटे निवेशकों के लिए पांच जरूरी सीख

सीख एक : युद्ध के समय बाजार में भयंकर अस्थिरता छा जाती है, जिसमें छोटे से लेकर बड़े उतार-चढ़ाव दिखाई देते हैं। छोटे निवेशकों के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि वे यह न मानें कि अल्पअवधि के उतार-चढ़ाव दीर्घकालिक आर्थिक गिरावट का संकेत हैं। डर के साये में बाजार अक्सर ऊपर और नीचे या दोनों तरफ बढ़ते दिखाई देते हैं। इतिहास गवाह है कि युद्ध, आतंकी हमले या राजनीतिक संकट जैसी सबसे गंभीर भू-राजनीतिक घटनाओं ने भी अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक नजरिये, कंपनियों के प्रदर्शन और शेयरों के मूल्य को शायद ही कभी बदला है। ऐसी स्थितियों में छोटे निवेशकों के लिए दो सबसे जरूरी व्यावहारिक सीख है कि मानकर चलें कि उतार-चढ़ाव होंंगे और दूसरा, तेज गिरावट के दौरान घबराएं नहीं।

सीख दो : भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में फिलहाल जिस तरह जहाजों का आवागमन रुक गया है, वैसी स्थिति हमारी तेल आपूर्ति की बड़ी कमजोरी है और इससे तेल कीमतों में तेजी संभावित होती है। ऐसे में जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ जाती है तो इसका नतीजा अधिक महंगाई, रुपए के कमजोर होने, बढ़ते व्यापार घाटे, ब्याज दर के बढ़ने और आखिरकार कॉर्पोरेट मार्जिन में कमी के रूप में सामने आता है। ये सब कारक शेयर की कीमत पर असर डालते हैं। इसलिए ऐसी स्थिति में छोटे निवेशकों को रोजाना युद्ध से जुड़ी सुर्खियों पर कम और कच्चे तेल की कीमतों, महंगाई, सेंट्रल बैंक की मौद्रिक नीति और मुद्रा स्थिरता जैसे मोटे कारकों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। दूसरे शब्दों में, युद्ध के आर्थिक असर को देखें, न कि सिर्फ युद्ध को।

सीख तीन : भू-राजनीतिक संकटों के कारण अलग-अलग क्षेत्रों का प्रदर्शन बदल जाता है। जैसे, ताजा युद्ध से रुपया कमजोर हुआ है। इसका आईटी सेक्टर पर अच्छा असर पड़ा है, लेकिन तेल की रिफाइनिंग और इसकी खरीद-बिक्री पर बुरा असर पड़ा है। साथ ही, कच्चा तेल आधारित कच्चे माल से रसायन बनाने वाली कंपनियों को आपूर्ति में रुकावट और कीमतें बढ़ने से नुकसान हो सकता है। ऐसी युद्धक स्थितियों में कुछ क्षेत्रों को नुकसान होता है तो कुछ को फायदा। इसलिए छोटे निवेशकों को घटनाओं पर पैनी नजर रखनी होगी और उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जिनके अच्छा या बुरा प्रदर्शन करने की संभावना है।

सीख चार : भारतीय शेयर बाजार वैश्विक वित्तीय बाजार के साथ गहराई से जुड़े हैं। जब भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक निवेशक भारत जैसे उभरते बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड, सोना या डॉलर जैसे सुरक्षित विकल्पों में लगा देते हैं। साथ ही, कच्चे तेल की ज्यादा कीमतों के परिणामस्वरूप रुपए के कमजोर होने से भारतीय बाजार से पूंजी के सुरक्षित जगह जाने की संभावना बढ़ जाती है। अपना जोखिम घटाने के लिए विदेशी संस्थागत निवेशक ऐसी रणनीति अपनाते हैं। यही वजह है कि जब घरेलू आर्थिक हालात स्थिर रहते हैं, तब भी भारतीय बाजार वैश्विक निवेशक की बिकवाली से गिरते हैं। इसलिए खुदरा निवेशक को स्वीकार करना होगा कि भारतीय बाजार सिर्फ घरेलू आधारभूत कारकों से ही नहीं, बल्कि वैश्विक तरलता चक्र से भी प्रभावित होते हैं।

सीख पांच : रह-रहकर आने वाले झटकों के बावजूद, शेयर बाजार दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण के सबसे असरदार तरीकों में से एक है। इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता खत्म होने पर बाजार की सेहत ठीक हो जाती है। विश्लेषक अक्सर सलाह देते हैं कि वे बाजार में अल्पकालिक उठापटक पर प्रतिक्रिया करने के बजाय दीर्घकालिक वित्तीय लक्ष्यों पर ध्यान जमाए रखें। वर्षों के नजरिये वाले निवेशकों के लिए, बाजार में गिरावट आकर्षक कीमत पर अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदने का मौका भी हो सकता है।

निवेशकों के लिए पांच सावधानियां

सावधानी एक : भू-राजनीतिक संकट के दौरान छोटे निवेशक जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह है घबराकर शेयर बेच देना। बाजार में तेज गिरावट अमूमन भावनात्मक प्रतिक्रिया को हवा देती है। निवेशक कीमतों में गिरावट के ठीक बाद जान बचाकर निकलने की जल्दबाजी में नुकसान उठाते हैं। मौजूदा युद्ध में बाजार की तेज प्रतिक्रिया रही जिससे थोड़े ही समय में निवेशक का काफी पैसा उड़ गया। तेज गिरावट वाले दौर में शेयर बेचने का मतलब अमूमन बाजार की तलहटी के आसपास बाहर निकल जाना होता है। इसके बजाय, निवेशकों को यह देखना चाहिए कि क्या दीर्घकालिक निवेश का नजरिया सच में बदला है। यदि कंपनी के मूलभूत तत्व (फंडामेंटल्स) मजबूत बने हुए हैं, तो अस्थायी गिरावट की वजह से शेयर बेचना सही नहीं।

सावधानी दो : कुछ क्षेत्र भू-राजनीतिक झटकों के लिए ज्यादा संवेदनशील होते हैं। जैसे, आयातित कच्चे माल या वैश्विक ‘सप्लाई चेन’ पर निर्भर उद्योग को ऊर्जा की कीमतों में किसी भी उछाल या व्यापार रास्ते में बाधा आने पर आय दबाव का सामना करना पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे जलमार्ग में रुकावट से मध्य-पूर्व में मजबूत उपस्थिति वाली कंपनियों पर भी असर पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए छोटे निवेशक को अपनी पूंजी-संपत्ति का बहुत ज्यादा हिस्सा उन क्षेत्रों में लगाने से बचना चाहिए, जो बाहरी झटकों के लिए संवेदनशील हैं।

सावधानी तीन : जब भी भू-राजनीतिक संघर्ष होता है, तो रक्षा जैसे क्षेत्र अचानक पसंदीदा बन जाते हैं। छोटे निवेशक अक्सर कीमतों में उछाल आने के बाद हड़बड़ी में इन शेयरों को खरीद लेते हैं। बड़ी संख्या में निवेशकों के किसी एक क्षेत्र पर उमड़ पड़ने से शेयर कीमत बढ़ जाती है। इससे शेयर को ऊंचे भाव पर खरीदने की नौबत आ जाती है, जो सही नहीं है। सचाई यह है कि रक्षा कंपनियों को भू-राजनीतिक तनाव से बेशक फायदा हो सकता है, लेकिन ऊंचे भाव पर शेयर खरीदना हानिकारक हो जाता है, क्योंकि जैसे ही मामला समाचार चक्र से बाहर होता है, शेयर में तेज गिरावट आ सकती है।

सावधानी चार : बाजार में उतार-चढ़ाव का समय उधार लेकर निवेश करने वाले निवेशकों के लिए खास तौर पर खतरनाक होता है। ट्रेडर जल्दी फायदा कमाने के लिए ‘मार्जिन ट्रेडिंग’ और ‘डेरिवेटिव एक्सपोजर’ का सहारा लेते हैं। लेकिन यदि बाजार अचानक गिरता है, तो उधार लेकर निवेश करने वाले मुसीबत में फंस सकते हैं और उन्हें नुकसान उठाकर शेयर बेचने पर मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए, ऐसे समय में लेवरेज वाला निवेश जोखिम भरा होता है। छोटे निवेशक को लेवरेज से बचना चाहिए और तरलता बनाए रखनी चाहिए।

सावधानी पांच : युद्ध शेयर बाजार क्या, पूरे अर्थतंत्र पर असर डालता है। तेल की बढ़ी कीमतें महंगाई में आग लगाती हैं और उभरते बाजारों की मुद्रा को कमजोर करती हैं। भारत के लिए महंगे कच्चे तेल के कारण चालू खाते का घाटा बढ़ता है और इससे रुपए पर दबाव पड़ता है। कमजोर रुपया उन कंपनियों पर असर डालता है जो आयात पर निर्भर हैं और इससे पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बढ़ता है। इसे ‘आयातित महंगाई’ कहते हैं।

इज्राएल-अमेरिका और ईरान का युद्ध एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि वित्तीय बाजार एक बड़े भू-राजनीतिक माहौल में काम करते हैं। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव अल्पकालिक तौर पर बेशक उतार-चढ़ाव पैदा करते हैं, लेकिन वे अच्छी तरह प्रबंधित कंपनियों या बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की दीर्घकालिक पूंजी-संपत्ति को नहीं बदलते। छोटे निवेशकों को भू-राजनीतिक घटनाओं के भविष्य का अंदाजा लगाने में नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि उन्हें कठिन परिस्थितियों में भावनाओं के उफान से बचते हुए अनुशासित मूल्य आधारित निवेश पर ध्यान देते हुए अपना रास्ता बनाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि सोच-विचार कर लिए फैसले ही संपत्ति निर्माण के दरवाजे खोलते हैं।

 

Topics: भारतीय शेयर बाजारपाञ्चजन्य विशेषहोर्मुज जलडमरूमध्यदलाल स्ट्रीटपूंजी-संपत्तिमार्जिन ट्रेडिंगभू-राजनीतिक अनिश्चितताचालू खाते का घाटासेक्टर रोटेशनअनुशासित निवेश
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