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तेहरान पर वार, बीजिंग तक मार

आज विश्व राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां अमेरिका सैन्य शक्ति के बल पर नई भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछा रहा है।

Written byअनुराग पुनेठाअनुराग पुनेठा
Mar 7, 2026, 10:24 pm IST
inविश्व, विश्लेषण

“अमेरिका स्वतंत्रता का मित्र तभी होता है, जब स्वतंत्रता अमेरिकी हितों की मित्र हो।” – यह कथन आधुनिक वैश्विक राजनीति की एक गहरी सचाई को उजागर करता है। लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्रता के आदर्शों का सबसे बड़ा प्रचारक होने का दावा करने वाला अमेरिका अक्सर इन्हीं मूल्यों को अपनी सामरिक और आर्थिक रणनीतियों के अनुसार ढालता दिखाई देता है।

आज विश्व राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सैन्य शक्ति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा मिलकर एक नई भू-राजनीतिक शतरंज रच रही हैं। इस शतरंज की बिसात पर अमेरिका, चीन, रूस और पश्चिम एशिया के देश अपने-अपने मोहरे चला रहे हैं। लेकिन इस पूरे खेल में सबसे विवादास्पद भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दिखाई देती है। ट्रम्प की राजनीति को अक्सर सनकी, अनिश्चित और आक्रामक कहा जाता है।

प्रवासियों के विरुद्ध कठोर नीति, वीज़ा नियमों में अचानक बदलाव, बड़े पैमाने पर निर्वासन, व्यापार युद्ध और सहयोगियों पर आर्थिक दबाव-इन सबने उनकी छवि एक ऐसे नेता की बना दी है जो पारंपरिक कूटनीति की परवाह नहीं करता। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह केवल सनक है, या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी हुई है? ट्रम्प की नीतियां एक ऐसे दौर का प्रतीक हैं जहां वैश्विक राजनीति फिर से शक्ति संतुलन की ओर लौटती दिखाई दे रही है। चीन का उदय, रूस की पुनर्सक्रियता और पश्चिम एशिया का अस्थिर भूगोल-इन सबके बीच अमेरिका अपने प्रभुत्व को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

राजनीति में शक्ति जितनी बड़ी होती है, उसके निर्णयों की गूंज भी उतनी ही दूर तक जाती है। इसलिए जो व्यक्ति स्वयं को परिवर्तन का वास्तुकार समझता है, वही कई बार दूसरों की नजर में अराजकता का निर्माता प्रतीत होता है-जहां हर नई चाल व्यवस्था की बजाय अव्यवस्था और हलचल पैदा करती है। पहली नज़र में ट्रम्प की शैली राजनीतिक आवेग जैसी प्रतीत होती है, परंतु गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि उनकी नीतियां वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने की कोशिश कर रही हैं। उनका लक्ष्य केवल किसी एक देश को हराना नहीं, बल्कि उन आर्थिक और ऊर्जा नेटवर्कों को तोड़ना है जो अमेरिका के प्रतिस्पर्धियों-विशेषकर चीन-को मजबूत करते हैं। ये विशुद्ध व्यापार है… अनैतिक व्यापार..

नए नेता के चुनाव में मेरा रहना जरूरी : ट्रंप

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई संभावित उत्तराधिकारी के रूप में उभरे हैं। वे आईआरजीसी और बसिज से जुड़े कट्टरपंथ समर्थित नेता हैं। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि मोजतबा उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं और ईरान के नए नेता के चयन में उनका शामिल होना जरूरी है, जैसे वेनेजुएला में हुआ था। ट्रंप का जोर शांति और सद्भाव लाने वाले नेता पर है।

आज चीन अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है, चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है और उसे विशाल मात्रा में तेल और गैस की आवश्यकता है। लंबे समय तक चीन ने ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों से अपेक्षाकृत सस्ते तेल की आपूर्ति सुनिश्चित की थी। ट्रम्प प्रशासन की कार्रवाइयाँ इसी ऊर्जा नेटवर्क को बाधित करने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर ड्रग तस्करी के आरोप लगाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना, ईरान पर कठोर प्रतिबंध लगाना, और पश्चिम एशिया में सैन्य दबाव बढ़ाना-ये सब कदम उस रणनीति का हिस्सा हैं जिसमें चीन की ऊर्जा आपूर्ति को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।

यदि चीन को मिलने वाला सस्ता तेल रुकता है, तो उसकी औद्योगिक वृद्धि और वैश्विक विस्तार की गति प्रभावित हो सकती है। इस दृष्टि से देखें तो ट्रम्प सीधे चीन से टकराने के बजाय उसके ऊर्जा स्रोतों और सहयोगियों को निशाना बना रहे हैं।

लेकिन यह रणनीति जितनी चालाक दिखाई देती है, उतनी ही जोखिम भरी भी है। ट्रम्प की विदेश नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वे केवल विरोधियों पर ही नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों पर भी दबाव डालते रहे हैं। यूरोपीय देशों के साथ उनके संबंध कई बार तनावपूर्ण रहे हैं। उन्होंने नाटो देशों को बार-बार चेतावनी दी कि वे अपने रक्षा खर्च का बोझ खुद उठाएं। भारत जैसे मित्र देशों के साथ भी व्यापार शुल्क और वीज़ा नीतियों को लेकर तनाव पैदा हुआ। कनाडा, जर्मनी और फ्रांस जैसे पारंपरिक सहयोगियों को भी ट्रम्प प्रशासन की आक्रामक व्यापार नीति का सामना करना पड़ा। यह नीति अल्पकालिक रूप से अमेरिका को लाभ पहुंचा सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह अमेरिका के पारंपरिक गठबंधनों को कमजोर करती है। इतिहास बताता है कि महाशक्तियां केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों के नेटवर्क से मजबूत होती हैं। यदि अमेरिका अपने मित्र देशों को ही असहज कर देता है, तो वह धीरे-धीरे वैश्विक मंच पर अकेला पड़ सकता है।

ईरान के साथ टकराव इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। पश्चिम एशिया केवल मजहबी या क्षेत्रीय संघर्ष का मैदान नहीं है; यह विश्व ऊर्जा आपूर्ति की धुरी भी है। यदि ईरान कमजोर होता है या उसकी तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर अमेरिका का प्रभाव बढ़ सकता है। अमेरिका स्वयं अब दुनिया के बड़े ऊर्जा निर्यातकों में शामिल हो चुका है, विशेषकर शेल गैस क्रांति के बाद। लेकिन यहां भी एक बड़ा जोखिम है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता केवल ऊर्जा की कीमतों को ही प्रभावित नहीं करती; यह वैश्विक राजनीति को भी अस्थिर कर सकती है। यदि ईरान, रूस और चीन जैसे देश इस दबाव के जवाब में एक दूसरे के करीब आते हैं, तो यह एक नए शक्ति-गठबंधन को जन्म दे सकता है।

दिल्ली में आयोजित रायसीना संवाद में अमेरिकी उपविदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाउ ने स्पष्ट संकेत दिया कि अमेरिका भारत के साथ “पारस्परिक साझेदारी” चाहता है। उन्होंने कहा कि व्यापार समझौते की दिशा में प्रगति हो रही है और आयात शुल्कों में कमी की संभावना है। साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की कीमतों में वृद्धि के बीच भारत को अमेरिकी ऊर्जा निर्यात की ओर ध्यान देना चाहिए। इसे लेकर बहुत से भारतीय असहज है, ये विशुद्ध धमकी है, एक अमीर की धमकी, धन का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह व्यक्ति को यह विश्वास दिला देता है कि वह भविष्य को भी खरीद सकता है।

ट्रम्प की विदेश नीति को पूरी तरह सनक कहना भी गलत होगा और उसे पूर्णतः रणनीतिक मानना भी। उनकी शैली में एक प्रकार का “अनिश्चितता का हथियार” है-ऐसी कूटनीति जिसमें विरोधी यह अनुमान ही नहीं लगा पाते कि अगली चाल क्या होगी। लेकिन समस्या यह है कि यह अनिश्चितता केवल विरोधियों को ही नहीं, बल्कि सहयोगियों को भी अस्थिर कर देती है। कूटनीति में विश्वास और स्थिरता बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

यदि एक नेता बार-बार अपने ही साझेदारों को धमकी देता है या अचानक नीतियां बदल देता है, तो धीरे-धीरे उस पर भरोसा कम होने लगता है। यही वह बिंदु है जहां ट्रम्प की रणनीति आलोचना का विषय बनती है। वे शक्ति के प्रदर्शन को कूटनीति का विकल्प मानते दिखाई देते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि केवल दबाव और धमकी से स्थायी गठबंधन नहीं बनते। लेकिन यह प्रयास जितना आक्रामक होगा, उतना ही प्रतिरोध भी पैदा करेगा। कूटनीति का मूल सिद्धांत यह है कि शक्ति और सहयोग दोनों साथ-साथ चलते हैं। यदि कोई राष्ट्र केवल शक्ति का प्रयोग करता है और सहयोग को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह धीरे-धीरे अपने ही बनाए गठबंधनों को कमजोर कर देता है।

इसलिए ट्रंप की नीतियों का आकलन करने के लिए केवल उनकी रणनीति को देखना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी परखना होगा कि क्या ये नीतियां अमेरिका को सशक्त बना रही हैं-या उसे वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर रही हैं। दुनिया भर के कई लोग, जिनमें भारतीय भी शामिल हैं, हॉलीवुड अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो के उस आक्रोश से जुड़ाव महसूस करते हैं जो उन्होंने टोनी अवार्ड्स के दौरान व्यक्त किया था। मंच की मर्यादा को दरकिनार करते हुए डी नीरो ने स्पष्ट शब्दों में कहा था- ‘भाड़ में जाए ट्रंप’।

Topics: पारंपरिक कूटनीतिआक्रामक व्यापार नीतिऊर्जा और अर्थव्यवस्थाऊर्जा नेटवर्कशेल गैस क्रांतिआर्थिक प्रतिस्पर्धापाञ्चजन्य विशेषपश्चिम एशियाआयात शुल्कअमेरिकी हितकूटनीतिक शैलीएकतरफावाद
अनुराग पुनेठा
अनुराग पुनेठा
अनुराग पुनेठा वरिष्ठ पत्रकार हैं, टीवी पत्रकारिता में लंबा समय काम किया है, कई टीवी चैनल्स में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। रक्षा और विदेश मामलों पर पकड़ है और तमाम अखबारों में लिखते रहे हैं। लोकसभा टीवी, संसद टीवी ज़ी न्यूज़ में कार्यरत रहे। टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित दैनिकों के लिए के लिए लेखन किया है। [Read more]
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