एकत्व से समाप्त होंगे संघर्ष: जैसलमेर चादर महोत्सव में बोले डॉ मोहन भागवत-समरसता है राष्ट्र की शक्ति
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एकत्व से समाप्त होंगे संघर्ष: जैसलमेर चादर महोत्सव में बोले डॉ मोहन भागवत-समरसता है राष्ट्र की शक्ति

जैसलमेर में दादा गुरुदेव जिनदत्त सूरी के 871वें चादर महोत्सव में RSS प्रमुख मोहन भागवत और जैन संतों ने सामाजिक समरसता पर जोर दिया। RSS प्रमुख ने रेल यात्रा की घटना से एकात्मता समझाई। भेदभाव त्यागकर देश के लिए समर्पित होने का आह्वान।

Written byपाञ्चजन्यपाञ्चजन्य — edited by कुलदीप सिंह
Mar 7, 2026, 11:34 am IST
inराजस्थान
Dr Mohan bhagwat Jaisalmer Jain

जैसलमेर, राजस्थान। स्वर्ण नगरी जैसलमेर में दादा गुरुदेव आचार्य श्री जिनदत्त सूरी के 871वें चादर महोत्सव के अवसर पर सामाजिक समरसता का अनुपम दृश्य देखने को मिला। इस मौके पर उन्होंने कहा कि विविधता वास्तव में एकता का शृंगार और उत्सव है, न कि विभाजन का कारण है।

कार्यक्रम में जैन और सनातन परंपरा के संतों सहित समाज के सभी वर्गों के लोगों का संगम हुआ। यह कार्यक्रम पूर्णतः समरसता और सामाजिक एकता के भाव पर आधारित था, जिसमें गच्छाधिपति जिनमणिप्रभ सागर के नेतृत्व में धर्म, तीर्थ और संस्कृति की रक्षा का संकल्प दोहराया गया।

सनातन संस्कृति की जीवटता का प्रतीक

इस मौके पर अपने संबोधन में सरसंघचालक जी ने भारतीय संस्कृति की चिरंतनता, विविधता में एकता और सामाजिक समरसता पर प्रकाश डाला। उन्होंने दादा गुरुदेव आचार्य जिनदत्त सूरी जी की 871 वर्ष पुरानी चादर को भारत की सनातन संस्कृति की जीवटता का प्रतीक बताया। यह चादर उस सत्य का प्रतीक है, जिसे न अग्नि जला सकती है, न शस्त्र काट सकते हैं और न ही जल भिगो सकता है। यह हमारे पूर्वजों द्वारा पहचाने गए उस शाश्वत सत्य का प्रमाण है जो सर्वत्र विद्यमान है।

उन्होंने जैन दर्शन के अनेकांतवाद सिद्धांत की सराहना करते हुए कहा कि सत्य इतना व्यापक है कि उस तक पहुँचने के मार्ग अलग-अलग होना स्वाभाविक है। विविधता वास्तव में एकता का शृंगार और उत्सव है, न कि विभाजन का कारण।

एकत्व से ही समाप्त होंगे संघर्ष

उन्होंने एक रेल यात्रा की मार्मिक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि समाज में झगड़े और संघर्ष इसलिए होते हैं क्योंकि लोग एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते और अपने एकत्व के भाव को भूल जाते हैं। जब मनुष्य यह समझ जाता है कि हम सब एक ही चेतना के अंश हैं, तब स्वार्थ और भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि केवल वैश्विक संस्थाएँ जैसे लीग ऑफ नेशंस और संयुक्त राष्ट्र युद्धों को नहीं रोक सकतीं। इसके लिए मानव के भीतर करुणा और एकात्मता का भाव होना आवश्यक है।

इसे भी पढ़ें: ‘धर्म की रक्षा आचरण से करनी है, सनातन धर्म जोड़ता और उन्नत करता है’-डॉ. मोहन भागवत

सरसंघचालक जी ने समाज से केवल उपदेशों तक सीमित न रहकर आचरण में परिवर्तन लाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अपने मित्रों और परिचितों के दायरे में विभिन्न जातियों, पंथों, भाषाओं और प्रदेशों के लोगों को शामिल करें। जब हम सुख-दुख, खान-पान और सामाजिक जीवन साझा करेंगे, तभी वास्तविक सामाजिक शक्ति प्रकट होगी।

भेदभाव और स्वार्थ को त्यागकर देश के लिए समर्पित होने की आवश्यकता

उन्होंने सभी को यह संकल्प दिलाया कि यदि हम आपसी भेदभाव और स्वार्थ को त्यागकर देश के लिए समर्पित हो जाएँ, तो भारत न केवल परम वैभव संपन्न राष्ट्र बनेगा, बल्कि एक विश्वगुरु के रूप में संपूर्ण मानवता को शांति और समृद्धि का मार्ग दिखाएगा।

समरसता ही राष्ट्र की शक्ति

अपने ओजस्वी उद्बोधन में गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसागर जी महाराज ने कहा कि समरसता ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है। भारत का ध्वज पूरे विश्व में सम्मानपूर्वक लहराने के लिए सभी संप्रदायों के संतों को एकता और अहिंसा का मार्ग अपनाना होगा। उन्होंने भगवान महावीर और भगवान राम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में जातिवाद और छुआछूत का कोई स्थान नहीं है। साथ ही युवाओं को सही दिशा देने और समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर चलने का आह्वान किया।

इस अवसर पर संघ और समाज के अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान चादर महोत्सव की स्मृति में डाक टिकट, विशेष सिक्के और दादा गुरुदेव पर आधारित पुस्तक का विमोचन किया गया। महोत्सव समिति के अध्यक्ष मंगल प्रभात लोढ़ा, संयोजक तेजराज गुलेचा तथा पद्म भूषण डॉ. डी.आर. मेहता सहित अनेक समाजसेवियों ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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