ईरान बनाम अमेरिका-इजरायल के मध्य चल रहे युद्ध के बीच विपक्षी पार्टियां लगातार चीख-चीखकर कह रही हैं कि युद्ध भारत की दहलीज तक पहुंच गया है। राहुल गांधी ने तो हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में अमेरिका के द्वारा डुबोए गए ईरानी युद्धपोत का सहारा लेकर सरकार को कोसना तक शुरू कर दिया था। लेकिन अब उन्हीं की पार्टी के सांसद शशि थरूर ने मिडिल ईस्ट के मौजूदा संघर्ष को लेकर कहा है कि भारत इस ईरान युद्ध में सैन्य रूप से नहीं फंसेगा। ये अलग बात है कि उसे सतर्क रहने की आवश्यकता है।
संघर्ष का भारत पर असर
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि अमेरिका-इजरायल की ईरान पर चल रही कार्रवाई का सातवां दिन चल रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता ये है कि गल्फ देशों में रहने वाले 90-100 लाख भारतीय वहां फंसे हुए हैं। हवाई जहाजों पर मिसाइलें चल रही हैं, एयरपोर्ट पर लोग अटक गए हैं, व्यापार बंद हो रहे हैं। ये लोग रोजगार करते हैं, कमाई करके रेमिटेंस भेजते हैं। इसलिए भारत के लिए ये मामला सीधे उनके जीवन और परिवारों से जुड़ा हुआ है। थरूर ने साफ कहा, “हम उदासीन नहीं रह सकते।”
भारत की पहली कोशिश होनी चाहिए कि जल्द से जल्द सीजफायर हो। उन्होंने कहा, “भारत के हित में है कि डी-एस्केलेशन की मांग करें और डिप्लोमेसी पर जोर दें।” युद्ध जितनी जल्दी खत्म हो, उतना सबके लिए अच्छा।
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रूसी तेल पर अमेरिकी छूट
अमेरिका ने हाल ही में भारत को 30 दिनों की अस्थायी छूट दे दी है। जिससे, भारतीय कंपनियां बिना प्रतिबंध के रूस से तेल खरीद सकें। ये फैसला मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए लिया गया है। विपक्षी पार्टियां सरकार पर सवाल उठा रही हैं कि क्या ये भारत की संप्रभुता पर हमला है।
थरूर ने इस पर व्यावहारिक नजरिया रखा। उन्होंने कहा कि अगर छूट न हो तो रिफाइनरीज पर प्रतिबंध लग सकते हैं, जिससे उनका पूरा व्यापार प्रभावित होगा। वेवर मिलने से कंपनियां खुलकर 30 दिनों तक तेल खरीद सकती हैं, बिना किसी नेगेटिव असर के। ये फैसला आर्थिक मजबूरी में लिया गया है। उनका कहना था, “सरकार ने जो चुना है, उसे उस वक्त भारत के हित में समझा होगा। दूसरे विकल्प चुनने के भी परिणाम होते।” थरूर ने ये भी कहा कि बाहर बैठकर सरकार को सब कुछ बोलना आसान है, लेकिन सरकार को परिणाम भुगतने पड़ते हैं। इसलिए सरकार के फैसलों का सम्मान करना चाहिए।
भारत की कूटनीतिक स्थिति
थरूर ने बताया कि भारत ने न तो अमेरिका-इजरायल की कार्रवाई का समर्थन किया है और न ही उसकी निंदा। ईरान से संपर्क बनाए रखा है और उम्मीद जताई है कि मामले जल्द सुलझ जाएं। ये एक सोची-समझी रणनीति है। कई दूसरे देश भी ऐसे ही सतर्क रुख अपना रहे हैं। युद्ध की वजह पर थरूर ने सवाल उठाए। अमेरिका-इजरायल का दावा है कि ये प्री-एम्प्टिव सेल्फ-डिफेंस था, क्योंकि ईरान न्यूक्लियर वेपन बना सकता था। लेकिन ओमानी मध्यस्थों का कहना है कि ईरान पहले ही नो न्यूक्स, जीरो परिस्कृत यूरेनियम स्टॉक और दूसरे कदमों पर सहमत हो चुका था। थरूर ने कहा कि प्री-एम्प्टिव सेल्फ-डिफेंस का लॉजिक यहां फिट नहीं बैठता।
यूएन पर कही बड़ी बात
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की सीमाएं हैं, खासकर जब कोई परमानेंट मेंबर युद्ध में हो। लेकिन थरूर ने कहा कि इसका मतलब ये नहीं कि यूएन को पूरी तरह खारिज कर दें। अंतरराष्ट्रीय कानून पर दबाव है, लेकिन ये अभी भी कई मुद्दों पर काम आ सकता है।















