क्या पश्चिम एशिया में टकराव केवल बम-मिसाइलों का है, या उसके पीछे और भी गहरे खेल चल रहे हैं? पूंजी के लिए पश्चिम के पैंतरे, उन्माद से जूझता इस्लामी जगत, और स्त्री गरिमा व मानव अधिकारों की तलाश में सभ्य समाज का संघर्ष। फरवरी 28 की सीमित स्ट्राइक के बाद प्रतिरोध, दबाव, प्रॉक्सी और ग्रे जोन की चालें इस शतरंज को और जटिल बना रही हैं। पहेलियों की परतें खोलता पाञ्चजन्य का विशेष आयोजन
पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने के लिए केवल वर्तमान घटनाओं का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए इतिहास, भू-राजनीति, संसाधन, आस्थागत पहचान, वैश्विक शक्ति संरचना और आर्थिक हितों के जटिल संबंधों को समझना आवश्यक है। आतंक के मुखौटों का उदय, छद्म युद्ध, परमाणु राजनीति, मानवाधिकार विमर्श और वैश्विक शक्तियों की रणनीतियां एक ऐसी राजनीतिक संरचना गढ़ती हैं, जिसमें स्थानीय और वैश्विक हित एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। भविष्य में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है कि कूटनीति, आर्थिक सहयोग और सामाजिक विकास को प्राथमिकता दी जाए तथा क्षेत्रीय व वैश्विक शक्तियां दीर्घकालिक शांति और स्थिरता के दृष्टिकोण से अपनी नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करें।
पश्चिम एशिया आधुनिक विश्व राजनीति का वह क्षेत्र है, जहां भू-राजनीति, संसाधन, आस्थागत पहचान, ऐतिहासिक स्मृति और बड़ी शक्तियों के रणनीतिक हित एक जटिल संरचना बनाते हैं। 20वीं शताब्दी के मध्य से लेकर वर्तमान तक, इस क्षेत्र में होने वाले संघर्षों ने केवल क्षेत्रीय स्थिरता को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा संरचना पर भी गहरा प्रभाव डाला है। विशेष रूप से 1979 की ईरानी क्रांति के बाद इस क्षेत्र की राजनीति में एक नया वैचारिक व रणनीतिक आयाम जुड़ा। ईरान ने स्वयं को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक शक्ति के रूप में भी प्रस्तुत किया। इसके परिणामस्वरूप, उसकी विदेश नीति, क्षेत्रीय रणनीति और सुरक्षा दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इसी अवधि में पश्चिम एशिया में आतंक के मुखौटों की भूमिका भी तेजी से बढ़ी। कई विश्लेषकों ने यह तर्क दिया कि क्षेत्रीय शक्तियों ने इन संगठनों का उपयोग अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया।
इस अध्ययन का उद्देश्य विशेष रूप से ईरान की नीतियों और उसके क्षेत्रीय प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। साथ ही, यह भी समझना आवश्यक है कि वैश्विक शक्तियों, विशेष रूप से पश्चिमी देशों की नीतियां पूरी तरह आदर्शवादी नहीं रही हैं, बल्कि कई बार वे सत्ता, रणनीतिक प्रभुत्व और आर्थिक हितों से संचालित होती रही हैं। इस शोध का लक्ष्य किसी एक राजनीतिक दृष्टिकोण का समर्थन करना नहीं, बल्कि उपलब्ध अकादमिक साहित्य, विशेषज्ञ टिप्पणियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के आधार पर एक व्यापक और आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना है।

पश्चिम एशिया की भू-राजनीति
पश्चिम की भू-राजनीति में ईरान की भूमिका लंबे समय से चर्चा और विश्लेषण का विषय रही है। ईरान ने बरसों तक उस नीति पर काम किया, जो कट्टर इस्लामी विचारों से मेल खाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने बीते चार दशक में एक ऐसी रणनीति विकसित की है, जिसके तहत वह सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना विभिन्न छद्म आतंकी संगठनों के माध्यम से क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करता है। यह नीति विशेष रूप से लेबनान, गाजा, यमन और इराक जैसे क्षेत्रों में दिखाई देती है। अमेरिका के पश्चिम एशिया विशेषज्ञ वली नस्र का कहना है कि ईरान ने ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ को अपनी विदेश नीति का महत्वपूर्ण उपकरण बना लिया है। 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने शिया विचारधारा और राजनीतिक प्रभाव को फैलाने के लिए क्षेत्रीय संगठनों के साथ संबंध मजबूत किए। यह रणनीति ईरान को कम लागत में व्यापक प्रभाव स्थापित करने का अवसर देती है और प्रत्यक्ष युद्ध से भी बचाती है।
लेबनान में सक्रिय हिज्बुल्लाह को ईरान की सबसे प्रभावशाली प्रॉक्सी ताकत माना जाता है। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ फेलो रे टाकी के अनुसार, हिज्बुल्लाह को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) से लंबे समय से सैन्य प्रशिक्षण, हथियार और वित्तीय सहायता मिलती रही है। उनका कहना है कि हिज्बुल्लाह केवल एक सशस्त्र आतंकी संगठन नहीं, बल्कि लेबनान की राजनीति, सामाजिक संस्थाओं और सुरक्षा ढांचे में गहराई से शामिल हो चुका है। इससे ईरान को इस्राएल के खिलाफ एक रणनीतिक दबाव बिंदु बनाए रखने में मदद मिलती है।
इसी तरह, गाजा में सक्रिय हमास और फिलिस्तीन इस्लामी जिहाद को भी कई विशेषज्ञ ईरान के समर्थन से जोड़कर देखते हैं। पश्चिम एशिया मामलों के विश्लेषक ब्रूस रीडेल के अनुसार, ईरान इन संगठनों को वित्तीय सहायता, हथियार तकनीक और प्रशिक्षण उपलब्ध कराता रहा है। इससे इस्राएल के साथ संघर्ष लगातार बना रहता है और ईरान क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करता है। यमन में सक्रिय हूती विद्रोह (अंसार अल्लाह) भी क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का अहम हिस्सा बन चुका है। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारेआ अल-मुस्लिमी के अनुसार, हूतियों को ईरान से मिसाइल तकनीक, ड्रोन और सैन्य प्रशिक्षण जैसे संसाधनों का समर्थन मिला है। हालांकि, ईरान इन आरोपों को अतिरंजित बताता है। अल-मुस्लिमी का कहना है कि यमन का संघर्ष अब स्थानीय गृहयुद्ध से आगे बढ़कर क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष का रूप ले चुका है, जिसमें सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी शामिल हैं।
इसके अलावा, इराक में भी कई शिया मिलिशिया समूह सक्रिय हैं, जिनमें से कुछ को ईरान के करीब माना जाता है। पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज के कई गुटों के ईरान से करीबी संबंध बताए जाते हैं। इराक विशेषज्ञ रेनाद मंसूर के शब्दों में, इन मिलिशिया संगठनों ने इराक की सुरक्षा और राजनीति, दोनों में गहरा प्रभाव बना लिया है। इनके जरिए ईरान को इराक की आंतरिक नीति और क्षेत्रीय रणनीति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव बनाए रखने का अवसर मिलता है।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान का प्रॉक्सी नेटवर्क आज पश्चिम एशिया की भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण घटक बन चुका है। यह प्रॉक्सी रणनीति कई कारणों से प्रभावी साबित हुई है। पहला, यह रणनीति उसे सीधे सैन्य टकराव से बचाती है और सीमित संसाधनों के साथ भी क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का मौका देती है। दूसरा, इन संगठनों के माध्यम से ईरान अपने वैचारिक और रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाता है। तीसरा, इससे उसके प्रतिद्वंद्वी देशों, विशेष रूप से इस्राएल और खाड़ी देशों के लिए नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा होती हैं। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस रणनीति के कारण पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ी है। छद्म संघर्षों ने कई देशों में युद्ध को लंबा खींचा है और मानवीय संकट को गहरा किया है। यमन, गाजा और इराक जैसे क्षेत्रों में जारी हिंसा इसका उदाहरण है।

आतंक के मुखौटे और ईरान की क्षेत्रीय रणनीति
पश्चिम एशिया की राजनीति में नॉन-स्टेट एक्टर्स यानी आतंक के मुखौटों का उदय आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। नॉन-स्टेट एक्टर्स वे संगठन होते हैं, जो किसी राज्य की औपचारिक संरचना का हिस्सा नहीं होते, लेकिन राजनीतिक, सैन्य या वैचारिक प्रभाव रखते हैं। इनमें मिलिशिया, वैचारिक आंदोलन, अर्धसैनिक संगठन और सशस्त्र समूह शामिल हो सकते हैं। इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की राजनीतिक और सामाजिक संरचना में तेजी से बदलाव आया। पश्चिम एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए उसने जो प्रॉक्सी नेटवर्क खड़ा किया, वह अब प्रमुख मिलिशिया समूह बन चुका है। यही मिलिशिया, जिसे एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस कहा जाता है, विशेषकर इस्राएल के लिए सैन्य और वैचारिक चुनौती पेश करती है।
इनमें फिलिस्तीन में हमास, लेबनान में हिज्बुल्लाह, यमन में हूती और इराक-सीरिया के आतंकी संगठन आते हैं। इन्हें रॉकेट, मिसाइलें, ड्रोन जैसे उन्नत हथियार और सैन्य प्रशिक्षण ईरान उपलब्ध कराता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कुद्स फोर्स और आईआरजीसी के कर्ताधर्ता कई बार सीधे प्रशिक्षण शिविरों में शामिल रहते हैं। उदाहरण के लिए, हूती आतंकियों को ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल व समुद्री हमलों की तकनीक उपलब्ध कराने में ईरानी विशेषज्ञों की भूमिका जगजाहिर है। हमास, हूती व हिज्बुल्लाह लाल सागर में भी स्वतंत्र आवाजाही में बाधाएं खड़ी करते हैं।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के अनुसार, 2020 तक हिज्बुल्लाह के पास कम से कम 1,30,000 रॉकेट और मिसाइलों का जखीरा था। दूसरीओर, इस्राएल से लगभग 2500 किलोमीटर दूर यमन के सना शहर में बैठे हूती आतंकी, जो अभी युद्ध में बाहर से ईरान की मदद कर रहे हैं। हूती इतिहास का पहला ऐसा आतंकी समूह है, जिसके पास बैलिस्टिक मिसाइलों का जखीरा है। ईरान में बनी ये मिसाइलें, ईरानीड्रोनोंके साथ मिलकर अरब प्रायद्वीप में 1,000 मील से अधिक की दूरी तय कर सकती हैं। ईरान ने आईआरजीसी, आर्म्ड फोर्स और हूती आतंकियों की बदौलत शिया आंदोलन के जरिए यमन के गृहयुद्ध में हिंसा फैलाई।
विभिन्न रपटों के अनुसार, ईरान फिलिस्तीनी कटृटरपंथी संगठनों को प्रतिवर्ष बड़ी धनराशि उपलब्ध कराता है, ताकि वे इस्राएल से लड़ते रहें। अनुमान है कि हमास सहित फिलिस्तीनी समूहों को ईरान लगभग 100 से 300 मिलियन डॉलर से अधिक तक की सहायता दे चुका है। इसी प्रकार, ईरान इस हिज्बुल्लाह को हर वर्ष सैकड़ों मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता देता है। धन हस्तांतरण के लिए छद्म कंपनियों, अनौपचारिक बैंकिंग नेटवर्क और सहयोगी संगठनों का भी उपयोग किया जाता है, जिससे प्रतिबंधों के बावजूद वित्तीय प्रवाह जारी रखा जा सके।विश्लेषकों के अनुसार, तेहरान ऐसे संगठनों के बीच ‘प्रतिरोध’की विचारधारा को बढ़ावा देता है, जिसमें पश्चिमी शक्तियों और इस्राएल के विरुद्ध आक्रोश की भावना पनपती रहे। इस कार्य के लिए मजहबी संस्थानों, मीडिया प्लेटफॉर्म और शैक्षणिक कार्यक्रमों की आड़ ली जाती है। हालांकि, ईरान के समर्थक विश्लेषकों का तर्क है कि इन संगठनों का समर्थन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखने और बाहरी हस्तक्षेप का प्रतिरोध करने के लिए किया गया। इसके विपरीत, आलोचकों का मानना है कि इस प्रकार की रणनीतियों ने पश्चिम एशिया में संघर्षों को लंबा और अधिक जटिल बना दिया है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम और वैश्विक विवाद
ईरान का परमाणु कार्यक्रम पश्चिम एशिया की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विषयों में से एक है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, जब अमेरिका के ‘एटम्स फॉर पीस’ कार्यक्रम के तहत ईरान सहित कई देशों को परमाणु तकनीक विकसित करने में सहायता दी गई थी। उस समय ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी पश्चिमी देशों के सहयोग से अपने देश को आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र बनाना चाहते थे। तब परमाणु ऊर्जा को भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन माना गया। लेकिन1979 की क्रांति के बाद परिस्थितियां बदल गईं। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए और परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय संदेह बढ़ गया।
पश्चिमी देशों ने आशंका जताई कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर कई निरीक्षण और प्रतिबंध लगाए गए। लेकिन ईरान तर्क देता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे ऊर्जा सुरक्षा तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए इसकी आवश्यकता है। यह विवाद 2015 के परमाणु समझौते तक पहुंचा, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) कहा गया। इस समझौते के अंतर्गत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कुछ सीमाएं स्वीकार कीं और बदले में आर्थिक प्रतिबंधों में राहत का आश्वासन दिया गया। फिर भी यह प्रश्न आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विवाद का विषय बना हुआ है कि ईरान की परमाणु नीति का अंतिम उद्देश्य क्या है और पश्चिम की आशंकाएं किस हद तक उचित थीं?
जेसीपीओए समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक सीमित रखा, लेकिन 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया। इसके बाद ईरान ने संवर्धन बढ़ाया। आईएईए प्रमुख राफेल ग्रॉसीका कहना है कि ईरान की अमद परियोजना 2003 तक चली, जिसमें हथियार डिजाइन शामिल था। उनके अनुसार, ईरान ने 60 प्रतिशत यूरेनियम संवर्धन किया, जो चिंताजनक है। जिनेवा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर अरियत हिर्किस ने ईरान के परमाणु विवाद पर स्पष्ट चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जेसीपीओए को पुनर्जीवित करना ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है, जिसमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज को सख्ती से सीमित किया जाए। वरना 1-2 सप्ताह में हथियार बनाना संभव है।
वैसे पश्चिम की आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं। ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता 2,000 किमी से अधिक है, जो यूरोप और इस्राएल को निशाना बना सकती हैं। हिर्किस के अनुसार, ये मिसाइलें वास्तव में परमाणु डिलीवरी सिस्टम हैं। इसलिए इनकी रेंज 300 किमी तक सीमित होनीचाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 में यह शर्त थी, लेकिन ईरान ने उसका उल्लंघन किया। सीआईए रपटों के अनुसार, जून 2025 में अमेरिका-इस्राएल के हमलों के बाद भी परमाणु ठिकानों तक आईएईए को पहुंच नहीं मिली, जिससे संवर्धन सत्यापन असंभव हो गया। इन हमलों में उसके यूरेनियम भंडार सुरक्षित रहे, जिससे 3-5 बम बनाए जा सकते हैं। 2026 में जिनेवा में अमेरिका-ईरान वार्ताएं चलीं, लेकिन जब ईरान परमाणु कार्यक्रम रोकने के लिए तैयार नहीं हुआ तो ट्रंप ने उसे अंजाम भुगतने की धमकी दे दी। वास्तवमें ईरान को संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (जेसीपीओए) जैसा सौदा चाहिए था, लेकिन अमेरिका इस बात पर अड़ा रहा कि वह अपनी मिसाइलें सीमित करे। ईरान इसे अपनी संप्रभुता का हनन मानता है। हिर्किस भी कहते हैं कि सीमाएं लागू होंगी तो जेसीपीओए टिकेगा, अन्यथा क्षेत्रीय होड़ बढ़ेगी।
विज्ञान का सैन्यीकरण और विकास की प्राथमिकताएं
किसी भी राष्ट्र की वैज्ञानिक क्षमता उसके आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी विकास का महत्वपूर्ण आधार होती है। लेकिन इतिहास में कई उदाहरण ऐसे रहे हैं, जहां वैज्ञानिक अनुसंधान का बड़ा हिस्सा सैन्य उद्देश्यों के लिए केंद्रित हो गया। इस प्रवृत्तिको ‘विज्ञान का सैन्यीकरण’ कहा जाता है। यह प्रश्न लंबे समय से बहस का विषय रहा है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विज्ञान का सैन्य उपयोग आवश्यक है या विकास के लिए वैज्ञानिक संसाधनों का संतुलित उपयोग अधिक महत्वपूर्ण है?
ईरान के बारे में कहा जाता है कि उसने वैज्ञानिक क्षमता का बड़ा हिस्सा मिसाइल तकनीक, ड्रोन तकनीक और रक्षा अनुसंधान में लगाया। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ स्टीफन वॉल्ट का मानना है कि जिन देशों को बाहरी सुरक्षा खतरे का अनुभव होता है, वे अक्सर अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता को रक्षा क्षेत्र में प्राथमिकता देते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता कई बार विकास की अन्य प्राथमिकताओं पर भारी पड़ जाती है। ईरान के मामले में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परमाणु नीति विशेषज्ञ केनेथ एन. वाल्ट्ज कहते हैं कि जब किसी देश पर बाहरी दबाव और प्रतिबंध बढ़ते हैं, तो वह आत्मनिर्भरता की दिशा में वैज्ञानिक और तकनीकी विकास को तेज करने की कोशिश करता है।
इसी कारण ईरान ने स्वदेशी मिसाइल और ड्रोन तकनीक के विकास पर अधिक जोर दिया। हालांकि, कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि वैज्ञानिक संसाधनों का अत्यधिक सैन्य उपयोग विकास की गति को प्रभावित कर सकता है। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के शब्दों में, किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक अवसरों के विस्तार से मापी जानी चाहिए। यदि संसाधनों का बड़ा हिस्सा सैन्य क्षेत्र में केंद्रित हो जाता है, तो मानव विकास के महत्वपूर्ण क्षेत्र पीछे रह सकते हैं।
विज्ञान और समाज के संबंधों पर काम करने वाले विद्वान जे. डी. बर्नल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The Social Function of Science’में यह तर्क दिया है कि विज्ञान का उद्देश्य केवल सैन्य शक्ति बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे समाज के व्यापक कल्याण के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। विज्ञान तब सबसे अधिक प्रभावी होता है जब वह उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में योगदान देता है। फिर भी, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि रक्षा अनुसंधान पूरी तरह नकारात्मक नहीं होता। तकनीकी इतिहासकार पॉल एन. एडवर्ड्स के अनुसार कई आधुनिक तकनीकों, जैसे-इंटरनेट, उपग्रह प्रणाली और जीपीएसकी प्रारंभिक प्रेरणा सैन्य अनुसंधान से ही आई थी, जो बाद में नागरिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुईं। वैज्ञानिक क्षमता का संतुलित और दूरदर्शी उपयोग ही किसी राष्ट्र को सुरक्षित, समृद्ध और दीर्घकालिक रूप से विकसित बना सकता है।
आर्थिक संसाधन और सामाजिक लागत
ईरान की अर्थव्यवस्था पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, तेल बाजार की अस्थिरता और आंतरिक आर्थिक नीतियों के कारण दबाव में रही है। इन परिस्थितियों में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया गया और इसका समाज तथा अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य रणनीतियों और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने के प्रयासों ने आर्थिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाला है। दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और आर्थिक कठिनाइयों का मुख्य कारण वही है। ईरानकेआर्थिक विश्लेषण में विशेष रूप से चार पहलू प्रमुख हैं-रक्षा व्यय का अनुपात, सैन्य संस्थानों की आर्थिक भूमिका, गरीबी-बेरोजगारी की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का प्रभाव।
राष्ट्रीय बजट में रक्षा व्यय का अनुपात :अंतरराष्ट्रीय रक्षा अनुसंधान संस्थान स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, ईरान का रक्षा व्यय पिछले दो दशकों में सामान्यतः सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3-5 प्रतिशत के बीच रहा है। उदाहरण के लिए, 2019 में ईरान का अनुमानित रक्षा खर्च लगभग 18-20 अरब डॉलर के बीच था। पश्चिम एशिया के कई देशों की तुलना में यह अनुपात बहुत अधिक नहीं माना जाता, पर सीमित आर्थिक संसाधनों के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण हिस्सा है। हाल के वर्षों में ईरान ने बजट दस्तावेजों में सुरक्षा और सैन्य संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण संसाधन आवंटित किए गए हैं। कुछ आकलनों के अनुसार सामान्य सरकारी बजट का लगभग 16 प्रतिशत तक हिस्सा सैन्य और सुरक्षा संस्थाओं को दिया गया है।
पश्चिम एशिया के सुरक्षा विशेषज्ञ केनेथ काट्जमैन, जो अमेरिकी कांग्रेस की शोध सेवा से जुड़े विश्लेषक हैं, का कहना है किईरान ने अपनी रक्षा नीति में मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क पर विशेष ध्यान दिया है। ईरान की रणनीति पारंपरिक बड़े सैन्य खर्च की बजाय ‘असमान सुरक्षा रणनीति’पर आधारित रही है, जिसमें मिसाइल, ड्रोन और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों पर अपेक्षाकृत अधिक निवेश किया गया है। हालांकि, क्षेत्रीय तनाव, मिसाइल कार्यक्रम और सुरक्षा चुनौतियों के कारण इस निवेश को आवश्यक बताता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि सीमित आर्थिक संसाधनों वाले देश के लिए इतना बड़ा सैन्य व्यय सामाजिक क्षेत्र के निवेश को प्रभावित कर सकता है।
सैन्य संस्थानों की आर्थिक भूमिका :ईरान की अर्थव्यवस्था का एक विशिष्ट पहलू यह है कि कुछ सैन्य संस्थान आर्थिक गतिविधियों में भी सक्रिय हैं। विशेष रूप से आईआरजीसी का निर्माण, ऊर्जा, दूरसंचार और बुनियादी ढांचेसे जुड़े कई क्षेत्रों में प्रभाव है। ईरानी मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री और वर्जिनिया टेक विश्वविद्यालय के जवाद सालेही इस्फहानी के अनुसार, 1990 के दशक के बाद पुनर्निर्माण परियोजनाओं में आईआरजीसी से जुड़ी कंपनियों, जैसे-इंजीनियरिंग समूह खातम अल-अंबिया को बड़े सरकारी ठेके मिलने लगे। इससे एक प्रकार की ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’विकसित हुई, जिसमें सैन्य संस्थानों का आर्थिक प्रभाव बढ़ गया।
इससे राज्य-नियंत्रित आर्थिक ढांचा मजबूत हुआ, जिससे निजी क्षेत्र के विकास की गति धीमी पड़ सकती है। वहीं, सरकार समर्थक दृष्टिकोण यह मानता है कि इन संस्थानों ने बुनियादी ढांचा निर्माण और रणनीतिक परियोजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ईरान के आर्थिक ढांचे पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ता एस्फंदयार बतमंगेलिद्ज का तर्क है कि प्रतिबंधों और सीमित विदेशी निवेश के कारण राज्य-संबंधित संस्थाएं कई क्षेत्रों में प्रमुख आर्थिक शक्ति बन गईं। यह स्थिति आंशिक रूप से बाहरी दबावों का परिणाम भी है।
गरीबी और बेरोजगारी की स्थिति :ईरान की आर्थिक चुनौतियों का सीधा प्रभाव सामाजिक स्तर पर दिखाई देता है। विश्व बैंक और विभिन्न आर्थिक अध्ययनों के अनुसार, 2011 से 2020 के बीच लगभग एक दशक में आर्थिक वृद्धि लगभग ठहराव की स्थिति में रही और प्रति व्यक्ति आय में गिरावट आई। इसी अवधि में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का अनुपात लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर 28 प्रतिशत तक पहुंच गया। महिलाओं की श्रम भागीदारी भी अपेक्षाकृत कम है। इसके अलावा, लगभग 40 प्रतिशत आबादी ऐसी स्थिति में है, जो आर्थिक झटकों के कारण आसानी से गरीबी में जा सकती है।
इन परिस्थितियों में महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन और जीवनयापन की बढ़ती लागत ने मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर अतिरिक्त दबाव डाला है। सालेही इस्फहानी के अनुसार, प्रतिबंधों और महंगाई के कारण ईरान का मध्यम वर्ग विशेष रूप से प्रभावित हुआ है। देश में युवा बेरोजगारी प्रमुख चुनौती है, क्योंकि उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते। विशेषज्ञ वली नस्र भी कहते हैं कि ईरान की सामाजिक संरचना में शिक्षित युवा आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन आर्थिक अवसर उसी गति से नहीं बढ़ पाए। इससे बेरोजगारी और आर्थिक असंतोष की स्थिति उत्पन्न हुई।
आर्थिक प्रतिबंधों का प्रभाव :ईरान की अर्थव्यवस्था को समझने में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। खासकर परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों के बाद लगे अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने तेल निर्यात, बैंकिंग प्रणाली और विदेशी निवेश को प्रभावित किया। वली नस्र की मानें तो प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला, विशेष रूप से वित्तीय लेन-देन और ऊर्जा क्षेत्र में। इसके कारण विदेशी निवेश में कमी और मुद्रा अवमूल्यन जैसी समस्याएं सामने आईं।
इसी प्रकार,एस्फंदयार बतमंगेलिद्ज भी मानते हैं कि प्रतिबंधों ने व्यापार और बैंकिंग चैनलों को सीमित कर दिया, जिससे आयात-निर्यात और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित हुआ। नतीजा, महंगाई और बेरोजगारी जैसी सामाजिक समस्याएं बढ़ीं। ईरान की अर्थव्यवस्था का विश्लेषण यह दर्शाता है कि आर्थिक चुनौतियांकेवल एक कारण से उत्पन्न नहीं हुई हैं। रक्षा व्यय, सैन्य संस्थानों की आर्थिक भूमिका, संरचनात्मक आर्थिक समस्याएं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधइन सभी ने मिलकर वर्तमान आर्थिक परिस्थिति को प्रभावित किया है।

महिलाओं के अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता
ईरान में महिलाओं के अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं का प्रश्न पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण विषय रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक विरोध और महिलाओं की सामाजिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर समय-समय पर बहस होती रही है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट वाच की रपटों के अनुसार, ईरान सरकार सार्वजनिक प्रदर्शनों, मीडिया अभिव्यक्ति और कुछ सामाजिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए कड़े कानूनों का उपयोग करती है। विशेष रूप से महिलाओं के पहनावे, सार्वजनिक आचरण और सामाजिक भूमिकाओं से जुड़े नियमों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है।
वली नस्र के अनुसार ईरान का सामाजिक ढांचा जटिल है। एक ओर राज्य की वैचारिक व मजहबी संरचना है, तो दूसरी ओर शिक्षित और शहरी समाज में सामाजिक परिवर्तन की मांग भी लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि महिलाओं और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे समय-समय पर सार्वजनिक आंदोलनों का रूप ले लेते हैं। विशेष रूप से 2022 में महसा अमिनी की मृत्यु के बाद देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
इनमें बड़ी संख्या में महिलाओं व युवाओं ने भाग लिया और सामाजिक नियंत्रण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता व नागरिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न उठाए। ईरान की महिला अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार मसीह अलीनेजाद लंबे समय से महिलाओं की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाती रही हैं। उनका तर्क है कि ईरान में कई महिलाएं अधिक सामाजिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग कर रही हैं। दूसरी ओर, कुछ ईरानी विशेषज्ञ कहते हैं कि महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक भागीदारी के कई क्षेत्रों में प्रगति भी हुई है, जिसे अंतरराष्ट्रीय विमर्श में कभी-कभी पर्याप्त महत्व नहीं मिलता।
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और ईरान अध्ययन की विशेषज्ञ शिरीन एबादी ने अपने लेख में कहा है कि ईरान में महिलाओं के अधिकारों का संघर्ष केवल कानूनी परिवर्तन का नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का भी प्रश्न है। उनके अनुसार शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के माध्यम से महिलाओं की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। इसके साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि मानवाधिकार से जुड़ा विमर्श केवल घरेलू राजनीति का विषय नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ शिबली तेल्हामी के अनुसार मानवाधिकार मुद्दे कई बार अंतरराष्ट्रीय मीडिया, कूटनीति और वैश्विक शक्ति राजनीति से भी प्रभावित होते हैं। किसी भी देश की आंतरिक सामाजिक बहसें अक्सर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भ में प्रस्तुत की जाती हैं, जिससे उनका वैश्विक प्रभाव और बढ़ जाता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि ईरान में महिलाओं के अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं का प्रश्न बहुआयामी है। इसमें सामाजिक परिवर्तन की मांग, राज्य की राजनीतिक संरचना, मानवाधिकार संगठनों की रपटेंऔर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिसभी कारक भूमिका निभाते हैं। इसलिए इस विषय का अध्ययन करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें घरेलू सामाजिक वास्तविकताओं और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ दोनों को ध्यान में रखा जाए।
भारत के लिए संभलने का समय
युद्ध में केवल बारूद ही विनाशकारी नहीं होते, उच्च तकनीक भी तबाही का कारण बन सकती है। जब एल्गोरिद्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सबसे प्रभावशाली हथियार बन जाते हैं, तो नियंत्रण और जवाबदेही की चुनौतियां बढ़ जाती हैं। भारत के संदर्भ में यह चिंता और गहन हो जाती है, क्योंकि देश में डिजिटल अवसंरचना तेजी से बढ़ रही है, मोबाइल और इंटरनेट उपयोग बड़े पैमाने पर फैला है और इन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स जैसे व्हाट्सऐप और टेलीग्राम व्यापक रूप से इस्तेमाल होते हैं। ऐसे डिजिटल प्लेटफाॅर्म्स सूचना युद्ध और साइबर ऑपरेशंस में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, इसलिए तकनीक के प्रयोग में नीति, सुरक्षा और नियामक उपायों की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत को सतर्क रहने की आवश्यकता है। यह सिर्फ तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि सुरक्षा, आर्थिक और रणनीतिक जरूरत भी बन गई है। भारत के लिए कुछ प्रमुख आयामों पर ध्यान देना आवश्यक है।
डेटा संप्रभुता और डिजिटल स्वायत्तता : भारत में करोड़ों इंटरनेट उपयोगर्ताओं के डेटा गूगल, फेसबुक, ट्विटर और अन्य वैश्विक प्लेटफॉर्म के पास जाता है, जो वैश्विक कंपनियों के एआई मॉडल और व्यावसायिक निर्णयों में इस्तेमाल होता है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर डेटा संप्रभुता को सुदृढ़ करना होगा ताकि नागरिकों का डेटा भारतीय नियंत्रण में रहे।
घरेलू एआई और सर्च इंजन प्लेटफॉर्म : भारत के पास कोई गूगल या चैटजीपीटी जैसी वैश्विक स्तर की एआई सेवा नहीं है। इसलिए घरेलू सर्च इंजन, एआई‑चैटबॉट जैसी सुविधाएं विकसित करने की आवश्यकता है, जो भारतीय भाषाओं, स्थानीय संदर्भ और नागरिक आवश्यकताओं को समझ सके। इससे न सिर्फ डेटा स्थानीय रहेगा, बल्कि आर्थिक अवसर और एआई आधारित रोजगार भी बढ़ेंगे।
सुरक्षा और राष्ट्रीय हित : वैश्विक एआई प्लेटफॉर्म पर बड़ी मात्रा में डेटा नियंत्रण होने का मतलब है सुरक्षा और गोपनीयता जोखिम बढ़ना। जैसे-परमाणु हथियारों और वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत को सतर्क रहना पड़ता है, उसी तरह डिजिटल और एआई क्षेत्र में भी रक्षा और साइबर सुरक्षा रणनीति अपनाना अनिवार्य है।
भाषा और सांस्कृतिक विविधता : भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता दुनिया में अद्वितीय है। वैश्विक प्लेटफॉर्म मुख्यतया अंग्रेजी और कुछ अंतरराष्ट्रीय भाषाओं पर केंद्रित हैं। एआई व सर्च इंजन में बहुभाषी समर्थन व स्थानीय संदर्भ की समझ भारत की डिजिटल संप्रभुता का मूल है।
आर्थिक और तकनीकी अवसर : घरेलू एआई और प्लेटफॉर्म बनने से भारत वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा कर सकता है। डेटा पर नियंत्रण और स्थानीय एआई विकास से स्टार्टअप इकोसिस्टम, रोजगार और निवेश बढ़ेंगे। उचीन की तरह भारत का अपना सर्च इंजन और एआई‑चैटबॉट वैश्विक कंपनियों के विकल्प के रूप में उभर सकते हैं।
वैश्विक रणनीतिक दृष्टिकोण : जैसे परमाणु हथियारों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में स्वतंत्र नीति और रणनीतिक निर्णय महत्वपूर्ण हैं, वैसे ही डिजिटल और एआई क्षेत्र में आत्मनिर्भरता आवश्यक है। भारत को राष्ट्रीय एआई नीति, डेटा कानून और नवाचार विकास पहल को तेज करना होगा। इसमें शिक्षा, अनुसंधान, स्टार्टअप सहयोग और सरकारी डिजिटल पहलों को एकीकृत किया जाना चाहिए।
पश्चिमी शक्तियां और सत्ता-केंद्रित वैश्विक राजनीति
मानवाधिकार विमर्श वैश्विक नैतिकता का प्रतीक है, लेकिन महाशक्तियों की सत्ता-केंद्रित नीतियां इसे अक्सर औजार बना देती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (यूडीएचआर, 1948) ने इन्हें सार्वभौमिक बनाया, किंतु शक्तिशाली राष्ट्र इन्हें संप्रभुता हनन के लिए इस्तेमाल करते हैं। महाशक्तियां मानवाधिकारों को चुनिंदा रूप से लागू करती हैं।
इस अध्ययन का अंतिम भाग पश्चिमी शक्तियों की नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के यथार्थवादी सिद्धांत के अनुसार हर राष्ट्र अपनी विदेश नीति मुख्यत: अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है। पश्चिमी शक्तियां अक्सर मानवाधिकार, लोकतंत्र व महिलाओं की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को वैश्विक राजनीति में प्रमुखता से उठाती हैं। लेकिन कई विश्लेषकों का कहना है कि व्यवहारिक राजनीति में इन सिद्धांतों का प्रयोग कई बार चयनात्मक रूप से किया जाता है। ऐसे उदाहरण मिलते हैं,जहां कुछ देशों में मानवाधिकार उल्लंघनों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी जाती है, जबकि अन्य मामलों में अपेक्षाकृत मौन बना रहता है। इसके पीछे ऊर्जा संसाधनों, रणनीतिक गठबंधनों, व्यापारिक हितों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की भूमिका देखी जाती है।
पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस दूसरे देशों के परमाणु कार्यक्रमों और मिसाइलों पर नजरें ही नहीं गड़ाए रखते हैं, बल्कि उस पर प्रतिबंध भी लगातेहैं। 2003 में बुश प्रशासन ने इराक पर सामूहिक विनाशक हथियार इकट्ठा करने का आरोप लगाकर उस पर हमला किया, सद्दाम हुसैन की हत्या कर दी, लाखों नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया और इराक को तबाह कर दिया। लेकिन बाद में संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों ने कहा कि इराक के पास ऐसा कोई हथियार नहीं था। इसी तरह, सऊदी अरब के यमन बमबारी, जिसमें 8 7,000 लोग मारे गए थे, पर पश्चिम चुप रहा। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने प्रतिबंध लगाया। पश्चिमी देश चीन द्वारा 10 लाख से अधिक उइगरों पर अत्याचार की निंदा तो करते हैं, लेकिन उसके साथ सालाना 700 अरब डॉलर का कारोबार भी कर तेहैं। नोम चॉम्स्की जैसे विशेषज्ञ इसे ‘रणनीतिक हिपोक्रेसी’ करार देते हैं।
सचाई यह है किअमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है, जिसकी2020-2024 के बीच वैश्विक हथियार निर्यात में लगभग 43 हिस्सेदारी थी। वह100 से अधिक देशों को हथियार आपूर्ति करता है। मीडिया रपट के अनुसार, अमेरिका का रक्षा निर्यात 100 अरब डॉलर से अधिक है। इसी तरह, अमीर देश कार्बन उत्सर्जन कर जलवायु को प्रभावित करते रहे, जिसका नतीजा विकासशील और गरीब देश भुगतते हैं। विशेषज्ञ सैमुअल हंटिंगटन कहते हैं, ‘यह सभ्यताओं का संघर्ष है, जहां पश्चिम अपनी श्रेष्ठता थोपता है।’ वहीं, विकासशील देश इसे नव-औपनिवेशिक मानते हैं।
पश्चिमी देश एनपीटी का उल्लंघन करते हैं, लेकिन इसका हवाला देकर ईरान को दबाते रहे। यह दोहरा मानदंड भारत द्वारा पोकरण में हुए परमाणु परीक्षण के बाद भी दिखा। अमेरिका अकेले 1,000 से अधिक परमाणु परीक्षण कर चुका है, लेकिन भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो उस पर सैकड़ों पाबंदियां थोप दीं। वह भी तब, जब भारत ने स्पष्ट कहा कि उसका परमाणु परीक्षण शांतिप्रिय उद्देश्य के लिए है। इसीतरह, उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाया। एनपीटी विशेषज्ञ जोसेफ सिरिनसियोने केअनुसार, ‘‘पश्चिम आधुनिकीकरण करता है, लेकिन ईरान को दबाता है।’’
आईएईए के प्रमुख ग्रॉसी चेताते हैं कि एनपीटी का उल्लंघन सबके लिए खतरा है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वैश्विक राजनीति में आदर्शवादी सिद्धांत और वास्तविक शक्ति राजनीति अक्सर एक दूसरे के साथ जटिल संबंध में होते हैं।

ऐतिहासिक समुदाय, सांस्कृतिक विरासत और पारसी प्रश्न
पश्चिम एशिया का इतिहास अत्यंत समृद्ध और बहु-स्तरीय रहा है। प्राचीन ईरान में जरथुस्त्र की आस्था पर आधारित सभ्यता ने लंबे समय तक इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया। सासानी साम्राज्य के समय यह आस्था और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं व्यापक रूप से प्रचलित थीं। सातवीं सदी में अरब विजय के बाद क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। समय के साथ कई समुदायों ने नई मजहबी और सांस्कृतिक पहचानें अपनाईं, जबकि कुछ समूहों ने अपनी पारंपरिक आस्थाओं को बनाए रखा। इन्हीं समुदायों में से एक पारसी समुदाय है, जिनमें से कई लोग बाद में भारत सहित अन्य क्षेत्रों में प्रवास कर गए। भारत में पारसी समुदाय ने व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन यह समझने में सहायता करता है कि सांस्कृतिक विरासत, आस्थागत पहचान और राजनीतिक परिवर्तन किस प्रकार समाजों को प्रभावित करते हैं।
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने के लिए केवल एक देश या एक घटना का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। यह क्षेत्र इतिहास, आस्था, संसाधनों, वैचारिक संघर्षों और वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा के जटिल संबंधों से निर्मित हुआ है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ईरान की क्षेत्रीय रणनीतियां, उसका परमाणु कार्यक्रम और उसकी आंतरिक नीतियां अंतरराष्ट्रीय बहस और आलोचना का विषय बनी हुई हैं। साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वैश्विक शक्तियों की नीतियां भी पूरी तरह निष्पक्ष या आदर्शवादी नहीं होतीं। वे अक्सर सत्ता, रणनीतिक प्रभुत्व और आर्थिक हितों से प्रभावित होती हैं। इसलिए पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने के लिए एक संतुलित और बहु-आयामी दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें क्षेत्रीय नीतियों और वैश्विक शक्ति राजनीति दोनों का आलोचनात्मक अध्ययन शामिल हो।

बढ़ेगी परमाणु हथियारों की होड़

दुनिया में उथल-पुथल के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परमाणु अस्थिरता और हथियारों की होड़ बढ़ रही है। हाल के दिनों में कई बयान और घटनाओं ने यह संकेत दिए हैं कि परमाणु हथियार कार्यक्रमों को लेकर दुनिया में तनाव बढ़ रहा है और अपनी‑अपनी रणनीति के अनुसार देश कदम उठा रहे हैं। अमेरिका ने हाल ही में चीन पर आरोप लगाया है कि उसने 22 जून, 2020 को चुपके से परमाणु परीक्षण किया। इसमें उसने गुप्त तकनीक (डिकपलिंग तकनीक) का उपयोग किया, ताकि वह अपनी गतिविधियों को सेमीस्मिक निगरानी से छुपा सके। अमेरिका का कहना है कि इस तकनीक से परीक्षण के दौरान उत्पन्न भूकंपीय संकेत कम महसूस होते हैं। हालांकि, चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह से निराधार व झूठा बताया है और कहा है कि वह परमाणु परीक्षण प्रतिबंधों का सम्मान करता है तथा व्यापक परमाणु परीक्षण वर्जन संधि के मूलभूत उद्देश्यों का पालन करता है।
वहीं, ईरान पर हमले के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अन्य देशों के परीक्षण कार्यक्रमों के कारण उन्होंने अमेरिका के युद्ध विभाग को समान आधार पर अपने परमाणु हथियारों का परीक्षण शुरू करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक परमाणु हथियार हैं, रूस दूसरे स्थान पर है और चीन काफी पीछे तीसरे स्थान पर है। अमेरिका ने 1992 के बाद से कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया था। ट्रंप ने दक्षिण कोरिया में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिन से मुलाकात से ठीक पहले सोशल मीडिया पर यह लिखा। उनका यह बयान वैश्विक परमाणु नीति और सामरिक संतुलन को लेकर है। कुछ दिनों पहले ट्रंप ने रूस के नए परमाणु मिसाइल परीक्षण की निंदा की थी, जबकि रूस ने दावा किया कि उसके परीक्षण ‘परमाणु नहीं’ थे।
यह सिर्फ अभ्यास था। हालांकि, इस बयान से वैश्विक सुरक्षा रूपरेखा में अस्थिरता बढ़ी है, क्योंकि रूस और अमेरिका के बीच परमाणु नियंत्रण समझौतों का प्रभाव कम होता दिख रहा है। यूक्रेन‑रूस संघर्ष और वैश्विक तनाव को देखते हुए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि फ्रांस अपने परमाणु हथियारों को विस्तारित करेगा और यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलकर मजबूत परमाणु प्रत्यावर्तन नीति अपनाएगा। मैक्रों के अनुसार, उन्होंने यह कदम रूस और चीन को ध्यान में रखते हुए यूरोप की सुरक्षा के लिए उठाया है। नाटो के जनरल सेक्रेटरी ने इस नीति का समर्थन करते हुए कहा कि यह यूरोपीय सुरक्षा को मजबूत करेगा। हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि अमेरिका की ‘परमाणु छतरी’ अभी भी अनिवार्य सुरक्षा गारंटी है।
इन सभी बयानबाजियों और आरोपों से संकेत मिलता है कि दुनिया में परमाणु हथियारों की होड़ फिर से बढ़ रही है। अमेरिका, रूस, चीन जैसे परमाणु शक्तियों के बीच आरोप‑प्रत्यारोप और परीक्षण‑संबंधित अनिश्चितता से वैश्विक अप्रसार प्रयास और हथियार नियंत्रण समझौतों पर दबाव बढ़ा है। कई सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता भी बढ़ सकती है।

















