“जैसा बोओगे वैसा काटोगे” – यह एक ऐसी कहावत है जिसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में अक्सर सुनते या दोहराते हैं। हिंदी और भारतीय दार्शनिक परंपरा में इसी विचार को जिस एक शब्द में व्यक्त किया गया है वह है- कर्म।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चल रहा वर्तमान तनाव और संघर्ष इस सिद्धांत का एक अत्यंत सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। विडंबना यह है कि जिन शक्तियों को कभी रणनीतिक उद्देश्यों के लिए पैदा किया गया, पाला-पोसा गया और हथियारों से लैस किया गया, वही शक्तियां आज अपने ही निर्माताओं के खिलाफ खड़ी दिखाई दे रही हैं।
कट्टरपंथ की साझा जड़ें
यह कोई रहस्य नहीं है कि अफगानिस्तान में वर्तमान तालिबान शासन काफी हद तक पाकिस्तान की सेना की ही उपज रहा है। तालिबान के वैचारिक, सैन्य और रणनीतिक पोषण का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की धरती पर ही हुआ। दशकों तक पाकिस्तान ने खुद को ऐसे आतंकवादी नेटवर्क के केंद्र के रूप में स्थापित किया जो पूरे क्षेत्र में सक्रिय रहे। जब भी कहीं कट्टरपंथ और आतंकवाद के पदचिह्न दिखाई दिए, विश्लेषकों की नजरें अक्सर इसी भूभाग की ओर जाती थीं।
हालांकि पिछले कुछ दशकों में इस कट्टरपंथी पारिस्थितिकी तंत्र में पाकिस्तान की “बादशाहत” को उसके पड़ोसी देश ईरान ने भी चुनौती दी है। वहां के अयातुल्लाहों के शासन ने अपनी विचारधारा के प्रयोगों के माध्यम से न केवल अपनी ही जनता को बल्कि पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया है। इन प्रयोगों के परिणाम पड़ोसी देशों सऊदी अरब और मध्य-पूर्व के एकमात्र यहूदी राष्ट्र इजरायल के साथ तनाव के रूप में भी दिखाई देते हैं।
राजनीतिक रंगमंच की समानताएं
एक भारतीय के रूप में इन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को देखते हुए कभी-कभी अपने देश की राजनीतिक परिस्थितियों की भी याद आ जाती है। राजनीति में अक्सर ऐसे संघर्ष दिखाई देते हैं, जहां स्वयंभू नेता अपने प्रभाव और विशेषकर अल्पसंख्यक वोट-बैंक पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए आपस में टकराते रहते हैं।
ऐसी प्रतिस्पर्धाएं कई बार किसी सामंती सत्ता संघर्ष जैसी प्रतीत होती हैं, जहां हर पक्ष नैतिक श्रेष्ठता का दावा करता है लेकिन वास्तविकता में अपने राजनीतिक प्रभुत्व की रक्षा में लगा रहता है।
तालिबान का जन्म
तालिबान की उत्पत्ति 1980 के दशक के सोवियत-अफगान युद्ध से जुड़ी हुई है। उस समय पाकिस्तान की सैन्य प्रतिष्ठान और उसके अधीन काम करने वाली नागरिक सरकारों ने अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ लड़ने के लिए कई उग्रवादी समूहों को संगठित, प्रशिक्षित और सशस्त्र किया।
यह सब उस समय के शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति का हिस्सा था। संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों ने भी इस संघर्ष को साम्यवाद के प्रसार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण मोर्चा माना। इसी कारण पाकिस्तान को भारी आर्थिक सहायता, हथियार और रणनीतिक समर्थन दिया गया। इसी वातावरण में मुल्ला उमर के नेतृत्व में तालिबान एक शक्तिशाली ताकत के रूप में उभरा।
रणनीतिक साधन से वैश्विक खतरे तक
लेकिन शीत युद्ध के दौर में लिए गए इन फैसलों के परिणाम जल्द ही सामने आने लगे। जिन नेटवर्कों को शुरू में केवल रणनीतिक साधन समझा गया था, वे धीरे-धीरे वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए। इसका सबसे भयावह उदाहरण 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले थे, जिन्होंने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। इन हमलों के बाद अमेरिका और नाटो के नेतृत्व में अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप हुआ, जिसका उद्देश्य तालिबान शासन को हटाना और आतंकवादी नेटवर्कों को समाप्त करना था। विडंबना यह थी कि वही तालिबान, जिसे कभी सोवियत विरोधी संघर्ष के दौरान अप्रत्यक्ष समर्थन मिला था, अब पश्चिमी सैन्य अभियानों का मुख्य लक्ष्य बन गया।
एक अंतहीन युद्ध
लगभग दो दशकों तक अफगानिस्तान में सैन्य मौजूदगी के बावजूद अमेरिका और उसके सहयोगी अंततः देश से वापस लौट गए। पश्चिम समर्थित अफगान सरकार, जिसका नेतृत्व पहले हामिद करजई और बाद में अन्य नेताओं ने किया, वह तेजी से ढह गई। इसके तुरंत बाद तालिबान फिर से सत्ता में लौट आया। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच कई सवाल खड़े किए। कई विश्लेषकों का मानना है कि आतंकवाद के गहरे संरचनात्मक स्रोतों को कभी पूरी तरह संबोधित नहीं किया गया।
पाकिस्तान के भीतर प्रतिक्रिया
समय के साथ पाकिस्तान की अपनी नीतियों का प्रभाव उसके ही भीतर दिखाई देने लगा। जिन नेटवर्कों को कभी “रणनीतिक संपत्ति” माना जाता था, वही देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए। आतंकी हिंसा का दायरा बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा से लेकर सिंध और यहाँ तक कि पंजाब के शहरी इलाकों तक फैलने लगा। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर देखने वाली उस घटना का उदाहरण है जिसे ब्लोबैक कहा जाता है-जब किसी नीति के अप्रत्याशित परिणाम अंततः उसी देश को नुकसान पहुंचाने लगते हैं जिसने उसे शुरू किया था।
अफगानिस्तान के साथ बदलते संबंध
हाल के वर्षों में पाकिस्तान और तालिबान शासित अफगानिस्तान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। विडंबना यह है कि जिस समूह को कभी पाकिस्तान का सबसे करीबी वैचारिक सहयोगी माना जाता था, वही अब इस्लामाबाद की रणनीतिक अपेक्षाओं के आगे झुकने को तैयार नहीं दिखता। अफगानिस्तान ने अपनी नीतियों में अधिक स्वतंत्रता दिखाने की कोशिश की है और अपने बुनियादी ढाँचे के विकास तथा अन्य देशों के साथ संबंधों को भी आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके जवाब में पाकिस्तान ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार बाहरी शक्तियों विशेषकर भारत पर आरोप लगाने शुरू कर दिए।
सबसे बड़ा रणनीतिक सबक
आखिरकार पाकिस्तान और तालिबान के बीच मौजूदा संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कर्म के सिद्धांत का एक सशक्त उदाहरण कहा जा सकता है। जब कोई देश अपने रणनीतिक हितों के लिए उग्रवादी नेटवर्कों को बढ़ावा देता है, तो वे हमेशा उसके नियंत्रण में नहीं रहते। समय के साथ वे अपने स्वयं के एजेंडे के अनुसार विकसित होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि अगर केवल आतंकवाद के लक्षणों से लड़ाई लड़ी जाए और उन संरचनाओं को अनदेखा किया जाए जो उसे जन्म देती हैं, तो स्थायी समाधान कभी नहीं मिल सकता। शायद भविष्य में दुनिया इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आतंकवाद के उत्पादों को बार-बार नष्ट करने से बेहतर है उन नर्सरियों और कारखानों को समाप्त करना जहां से वे पैदा होते हैं।












