नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट (2018-23) ने मध्य प्रदेश में सरकारी संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 फरवरी को मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के 20 जिलों में लगभग 77 करोड़ रुपए मूल्य की 33 ऐसी संपत्तियां वक्फ बोर्ड के नाम पंजीकृत पाई गई हैं, जो राजस्व अभिलेखों में सरकारी भूमि के रूप में दर्ज थीं। जिन 81 वक्फ संपत्तियों का परीक्षण किया गया, उनमें से 33 संपत्तियां कुल 2,09,639.48 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के साथ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थीं। इनमें कई जमीन सामुदायिक प्रयोजन के लिए आरक्षित हैं। इसके बावजूद उन्हें वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर लिया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों ने पंजीकरण की प्रक्रियाओं को रोकने या निरस्त करने के लिए प्रभावी दिशा-निर्देश जारी नहीं किए। कुछ मामलों में आपत्तियां दर्ज की गईं, फिर भी पंजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी और संपत्तियां वक्फ बोर्ड के नाम दर्ज हो गईं। राज्य सरकार ने इसे तकनीकी गलती बताया है। सरकार का तर्क है कि वक्फ अधिनियम 1995 में जिला प्रशासन से एन.ओ.सी. लेने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि राजस्व रिकॉर्ड के कंप्यूटरीकरण के दौरान स्वामित्व खाने में सरकारी दर्ज हुआ, लेकिन कैग ने इस स्पष्टीकरण को अस्वीकार कर दिया।
रिपोर्ट में भोपाल के हुजूर क्षेत्र में मस्जिद हिनोतिया, मदीना मस्जिद महावड़िया, कब्रिस्तान कमलानगर और कब्रिस्तान कानासेया का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है। इसी तरह बुरहानपुर की मदीना मस्जिद मदरसा, छतरपुर की वक्फ ईदगाह और दरगाह हजरत सैयद वली कब्रिस्तान व कुआं, देवास और टीकमगढ़ के कब्रिस्तान भी सूची में शामिल हैं। इनमें से कई संपत्तियां सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि बताई गई हैं, जिससे विवाद और गहरा हो जाता है।
रिपोर्ट में मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। बजट अनियमितता, नियमित ऑडिट का अभाव और कर्मचारियों की कमी जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
प्रशासनिक लापरवाही
हालांकि वक्फ के मामले केवल मध्य प्रदेश तक ही सीमित नहीं हैं। पूरे देश में वक्फ बोर्ड की मनमानी चल रही है। इसे देखते हुए ही केंद्र सरकार ने नए सिरे से वक्फ कानून बनाया है। मध्य प्रदेश के संदर्भ में मूल प्रश्न यही है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि सरकारी थी तब वक्फ के नाम पंजीकरण की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई! यदि आपत्तियों के बावजूद पंजीकरण हुआ है तो इसका अर्थ है कि यह सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, पूरा मामला योजनाबद्ध षड्यंत्र का है।
इस संबंध में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल कहते हैं, “कैग रिपोर्ट ने वक्फ बोर्ड के कुकर्मों का पर्दाफाश किया है। वक्फ बोर्ड सरकारी संपत्तियों पर अपनी नजरे गढ़ाए बैठा है। मध्य प्रदेश सरकार अविलम्ब इसकी जांच कराए। इस षड्यंत्र में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही वक्फ से जुड़ी इसके पूर्व की संपत्तियों की भी जांच हो, ताकि आगे इस तरह की घटनाएं न हो सकें।”
दूसरी ओर जब उक्त प्रकरण में मध्य प्रदेश राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल से संपर्क करने का प्रयास किया तो उनका मोबाइल नंबर लगातार बंद पाया जाता रहा। वहीं अधिवक्ता आशुतोष कुमार झा का कहना है, “मध्य प्रदेश की जिन सरकारी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड ने अपनी सूची में डाला है, उन्हें राज्य सरकार को हर हाल में वापस लेना चाहिए।”
















