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ईरान प्रकरण: वैश्विक इस्लामी विमर्श और राष्ट्रीय हितों की कसौटी

ईरान स्वयं भी एक जटिल और बहुस्तरीय समाज है। पिछले कई दशकों से वहां का एक बड़ा वर्ग मजहबी शासन, नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध और आर्थिक समस्याओं की आलोचना करता रहा है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Mar 4, 2026, 06:20 pm IST
in विश्व
अयातुल्ला अली खामेनेई (फाइल फोटो)

अयातुल्ला अली खामेनेई (फाइल फोटो)

इस्लामी जगत के इतिहास में आंतरिक संघर्ष, सांप्रदायिक विभाजन और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाएं लंबे समय से मौजूद रही हैं। समकालीन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करते समय अक्सर एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। यह स्थिति स्कॉटिश लेखक रॉबर्ट लुई स्टीवेन्सन की प्रसिद्ध रचना डॉ. जेकिल एंड मिस्टर हाइड की याद दिलाती है, जिसमें एक ही व्यक्तित्व के भीतर दो विपरीत प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। आज की राजनीति में भी नैतिक आक्रोश और रणनीतिक चयनात्मकता का ऐसा ही द्वंद्व देखने को मिलता है।

भारतीय उपमहाद्वीप की सांप्रदायिक वास्तविकताएं

भारतीय उपमहाद्वीप में सुन्नी और शिया समुदायों के बीच ऐतिहासिक मतभेद कभी-कभी हिंसक घटनाओं के रूप में भी सामने आए हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय लंबे समय तक चरमपंथी सुन्नी संगठनों के हमलों का शिकार रहा है।

भारत में भी कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में मुहर्रम के जुलूसों के दौरान शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रशासन को विशेष व्यवस्था करनी पड़ी है। फिर भी जब ईरान के नेतृत्व से जुड़ी कोई घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आती है, तो दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में अचानक व्यापक भावनात्मक एकजुटता दिखाई देती है। यह परिवर्तन स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठाता है कि क्या यह पूरी तरह मजहबी एकजुटता है या इसके पीछे व्यापक राजनीतिक संदेश, पश्चिम-विरोधी भावनाएं या घरेलू असंतोष भी भूमिका निभाते हैं।

ईरान के भीतर की वास्तविकता

ईरान स्वयं भी एक जटिल और बहुस्तरीय समाज है। पिछले कई दशकों से वहां का एक बड़ा वर्ग मजहबी शासन, नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध और आर्थिक समस्याओं की आलोचना करता रहा है। छात्र आंदोलनों, महिलाओं के अधिकारों से जुड़े अभियानों और सुधारवादी राजनीतिक समूहों ने समय-समय पर मजहबी सत्ता के वर्चस्व को चुनौती दी है।
इसी कारण बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर ईरान के भीतर प्रतिक्रियाएं अक्सर विभाजित रही हैं। कुछ लोग मौजूदा व्यवस्था के प्रति निष्ठा व्यक्त कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे परिवर्तन के अवसर के रूप में देख रहे हैं।

समर्थन और विरोध दोनों दिखे

विदेशों में बसे ईरानी समुदायों में भी समर्थन और विरोध दोनों प्रकार के प्रदर्शन देखने को मिले हैं। यह विविधता ईरान की वास्तविकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ वर्गों में इस जटिलता को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है और ईरान को एकसमान मजहबी भावना से संचालित समाज के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

मजहबी भावना से अधिक महत्व राष्ट्रीय हित का

ईरान और इजरायल के बीच हुए पूर्व संघर्षों में अनेक मुस्लिम-बहुल देशों ने केवल औपचारिक बयान जारी किए, प्रत्यक्ष समर्थन नहीं दिया। उनके निर्णय आर्थिक हितों, सुरक्षा साझेदारियों और क्षेत्रीय संतुलन से प्रभावित थे। आज भी कई देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। यह स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मजहबी भावना से अधिक महत्व राष्ट्रीय हित का होता है।

भारत-ईरान संबंध और रणनीतिक व्यवहार

भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक रूप से व्यावहारिक रहे हैं। ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं दोनों देशों के संबंधों में महत्वपूर्ण रही हैं। फिर भी कुछ अवसरों पर ईरान ने कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान-समर्थक रुख अपनाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र अपने रणनीतिक हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं।

राष्ट्रीय हित और लोकतांत्रिक अपेक्षाएं

लोकतांत्रिक समाजों में यह स्वाभाविक है कि विभिन्न समुदाय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करें। लेकिन यदि सरकार पर यह दबाव डाला जाए कि वह विदेश नीति केवल भावनात्मक या वैचारिक आग्रहों के आधार पर तय करे, तो यह चिंता का विषय बन सकता है। एक संप्रभु राष्ट्र को अपनी नीतियां व्यापक राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही निर्धारित करनी होती हैं।

यदि किसी समुदाय की मांगें राष्ट्रीय हित से ऊपर दिखाई देने लगें, तो इससे यह धारणा बन सकती है कि सामुदायिक प्राथमिकताएं राष्ट्रीय एकता से अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। समय के साथ ऐसी धारणाएं सामाजिक दूरी और अलगाव को जन्म दे सकती हैं।

लोकतंत्र, पहचान और राष्ट्रीय जिम्मेदारी

बहुलतावादी लोकतंत्र तभी मजबूत होते हैं जब सभी समुदाय संविधान और राष्ट्रीय हित के ढांचे के भीतर सक्रिय भागीदारी करें। विरोध, आलोचना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन वैश्विक घटनाओं की जटिलताओं को समझे बिना केवल भावनात्मक प्रतिक्रियाएं देना सार्वजनिक विमर्श को कमजोर कर सकता है। अंततः भू-राजनीति यथार्थवाद और स्थिरता को महत्व देती है। सच्ची लोकतांत्रिक परिपक्वता इसी में है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को समझते समय भावनाओं और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

 

Topics: राष्ट्रीय हितईरान प्रकरणवैश्विक इस्लामी विमर्शईरान प्रतिक्रियाईरान इजरायल अमेरिका संघर्ष
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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