अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की सीमाओं और कमजोरियों को उजागर करती है। आधुनिक विश्व व्यवस्था का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, नियमों और कूटनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से बड़े सैन्य संघर्षों को रोकना तथा विवादों का शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित रहा है। लेकिन जब दो प्रभावशाली सैन्य टकराव की स्थिति में पहुंच जाते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि माैजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल करने में अभी भी सफल नहीं हो पाई है।

सबसे पहले, यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है। वैश्विक शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन संस्थाओं पर आधारित मानी जाती है, उनकी भूमिका अक्सर शक्तिशाली देशों के राजनीतिक हितों से प्रभावित हो जाती है। परिणामस्वरूप, जब बड़े देश अपने सामरिक हितों के आधार पर सैन्य कार्रवाई का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें रोकने के लिए प्रभावी संस्थागत तंत्र दिखाई नहीं देता। यह स्थिति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था आज भी शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय हितों की राजनीति से गहराई से प्रभावित है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा व्यवस्था से जुड़ा है। पश्चिम एशिया विश्व ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है, इसलिए इस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाला कोई भी सैन्य संकट तुरंत वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण समुद्री व्यापार मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा पर भी असर पड़ता है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता यह संकेत देती है कि अत्यधिक परस्पर निर्भर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था क्षेत्रीय संघर्षों के प्रति अत्यंत संवेदनशील है।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक मानदंडों से जुड़ा है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक प्रमुख आधार यह है कि सभी राज्य संप्रभुता के सिद्धांत और मानवीय कानूनों का सम्मान करें। लेकिन युद्ध जैसी परिस्थितियों में इन सिद्धांतों की व्याख्या अक्सर शक्तिशाली देशों के रणनीतिक हितों के अनुसार की जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों की प्रभावशीलता काफी हद तक राज्यों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है और कई बार व्यवहार में ये नियम कमजोर पड़ जाते हैं।
इन सभी पहलुओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष केवल दो देशों के बीच का सैन्य टकराव नहीं है, यह वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर करता है। वैश्विक संस्थाओं की सीमित क्षमता, परस्पर आर्थिक निर्भरता की संवेदनशीलता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के कमजोर अनुपालन से यह संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय हित अभी भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस लिहाज से यह संघर्ष वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विफलताओं को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

निष्ठा और डर के बीच ईरानी
ईरान की वर्तमान सामाजिक स्थिति को समझने के लिए यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि समाज या तो पूरी तरह शासन के साथ है या पूरी तरह खिलाफ। वास्तविक परिदृश्य कहीं अधिक जटिल है, जिसे चार प्रमुख सामाजिक प्रतिक्रियाओं के मिश्रण के रूप में देखा जा सकता है। पहला समूह वे लोग हैं जो वैचारिक रूप से शासन के समर्थक हैं। इसमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड, बसिज मिलिशिया, मजहबी प्रतिष्ठान से जुड़े लोग और उन संस्थाओं से लाभ पाने वाला सामाजिक वर्ग शामिल है। साथ ही, उनके परिवार और समर्थक भी इसमें शामिल होते हैं। यह समूह न केवल शासन के प्रति वफादार रहता है, बल्कि सार्वजनिक प्रदर्शनों, रैलियों और लामबंदी में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। इसी कारण कई बार जो बड़ी भीड़ दिखाई देती है, उसका एक संगठित हिस्सा इसी नेटवर्क से आता है।
दूसरा समूह, जो शासन से असंतुष्ट है और पिछले वर्षों में हुए विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से दिखाई दिया है। इस वर्ग में बड़ी संख्या में युवा, छात्र, शहरी मध्यम वर्ग और वे लोग शामिल हैं जो सामाजिक स्वतंत्रता, आर्थिक अवसर और राजनीतिक सुधार की मांग करते हैं। इन लोगों में शासन के प्रति असंतोष बना रहता है, लेकिन युद्ध और दमन की परिस्थितियों में इनकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है।
तीसरा समूह , उनका है, जो शासन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते, लेकिन बाहरी हमले या राष्ट्रीय संकट की स्थिति में देश के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। यह भावना अक्सर राष्ट्रीय पहचान, संप्रभुता और सुरक्षा की चिंता से पैदा होती है। ऐसे लोग सरकार का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि देश को बाहरी खतरे से बचाने की भावना से एकजुट दिखाई देते हैं। इसलिए युद्ध के समय कई समाजों में अस्थायी राष्ट्रीय एकता दिखाई देती है।
चौथा समूह , जो भय व असुरक्षा के कारण सार्वजनिक रूप से शासन के अनुरूप व्यवहार करता है। दमन, निगरानी, गिरफ्तारी के खतरे और सूचना नियंत्रण जैसी परिस्थितियों में कई लोग खुलकर वास्तविक राय व्यक्त नहीं कर पाते। वे सार्वजनिक रूप से तटस्थ या अनुकूल दिखाई दे सकते हैं, जबकि निजी तौर पर उनके विचार अलग हो सकते हैं।
इन समूहों को एक साथ देखने पर ईरान में दिखने वाली एकजुटता को समझना आसान होता है। इसका एक हिस्सा वास्तव में संगठित वैचारिक समर्थन का है, कुछ राष्ट्रीय संकट या बाहरी खतरे के समय उत्पन्न स्वतःस्फूर्त भावनाओं का परिणाम है और कुछ भय या राजनीतिक दबाव के कारण उत्पन्न सार्वजनिक अनुरूपता का नतीजा है। इसलिए जो एकजुटता दिखाई देती है, वह किसी एक कारण से नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक कारकों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है।

दर्द या दिखावा?
भारतीय राष्ट्रभावना का केंद्र हमेशा संप्रभुता, सामाजिक शांति और राष्ट्रीय हित होना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में देश के कुछ हिस्सों में ईरान से जुड़े घटनाक्रम पर आयोजित प्रदर्शन और शोक सभाओं ने चिंता पैदा कर दी है। इन आयोजनों में मजहबी प्रतीक, मातम, नारों और विदेशी नेताओं के चित्रों के माध्यम से भावनात्मक माहौल बनाया गया। कुछ जगहों पर अमेरिका और इस्राएल विरोधी नारे लगाए गए, पुतले जलाए गए और विदेशी झंडों का प्रतीकात्मक अपमान किया गया। यह सब उस धरती पर हुआ, जिसका इन घटनाओं से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। ऐसे प्रदर्शन न केवल सामाजिक सौहार्द को चुनौती देते हैं, बल्कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा पर भी सवाल उठाते हैं।
किसी भी समाज में सहानुभूति या अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति संवेदना स्वाभाविक है, परंतु प्रश्न है कि क्या भारत की सार्वजनिक ऊर्जा बाहरी संघर्षों में लगनी चाहिए या इसे अपने देश की चुनौतियों-गरीबी, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और सामाजिक समरसता के समाधान पर केंद्रित करना चाहिए। जब नागरिक अपने देश की वास्तविक समस्याओं की उपेक्षा कर विदेशों में होने वाली घटनाओं के लिए सामूहिक शोक प्रदर्शन करते हैं, तो यह असंगत प्राथमिकता दर्शाता है। साथ ही, यह संकेत देता है कि कभी-कभी वैश्विक मजहबी या वैचारिक पहचान, स्थानीय राष्ट्रीय पहचान पर हावी हो सकती है।
इस परिस्थिति का दूसरा पहलू राजनीतिक है। भारत की कुछ पार्टियां ऐसे अवसरों को वैचारिक एजेंडे के लिए भुनाती रही हैं। हाल में कांग्रेस नेतृत्व के लेखों-बयानों में अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को आंतरिक विमर्श में घसीटने का प्रयास इसी का उदाहरण है। भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के पीछे राजनीतिक गणना झलकती है, जो समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ाती है।
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में है, जहां लोग विभिन्न मुद्दों पर संवेदना व्यक्त कर सकते हैं। किंतु राष्ट्रभावना का संतुलन भी अपरिहार्य है। भारतीयों की प्राथमिक निष्ठा राष्ट्र व समाज के प्रति होनी चाहिए। विदेशी संघर्षों पर आक्रोश यदि सार्वजनिक विमर्श भ्रमित करे, तो इसे सामाजिक प्राथमिकताओं व राजनीतिक उपयोग के संदर्भ में गंभीरता से समझें।
अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक घटनाओं का परिप्रेक्ष्य तभी सार्थक और स्थिर हो सकता है, जब राष्ट्र की प्राथमिक निष्ठा अपनी भूमि, समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति बनी रहे।

















